26 जनवरी 2024 को भारत अपना 75वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। आज के ही दिन साल 1950 में हमारे देश का संविधान लागू हुआ था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 21 तोपों की सलामी के साथ ध्वजारोहण किया और भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया। किया था। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हमारा का संविधान अपने नागरिकों को हर प्रकार से आजादी और अधिकार देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों के साथ ही मौलिक कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं। इन मौलिक अधिकारों का पालन न करने पर आपको सजा भी हो सकती है। आइए जानते हैं क्या है ये मौलिक अधिकार और इन्हें न मानने पर दंड का प्रावधान।
भारत के संविधान में मौलिक कर्तव्यों का विचार रूस के संविधान (तत्कालीन सोवियत संघ) से प्रेरित है। मौलिक कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों द्वारा 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 में जोड़ा गया था। मूल रूप से मौलिक कर्त्तव्यों की संख्या 10 थी, बाद में 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के माध्यम से एक और मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया। मौलिक कर्तव्य संविधान के अनुच्छेद 51-ए (भाग- IV-ए) में सूचीबद्ध हैं।
भारत के संविधान में मौलिक कर्तव्यों को शामिल करने का उद्देश्य नागरिकों के गिल में देश-हित की भावना को जागृत करना है। इन कर्तव्यों का पालन न करने पर सीधे तौर पर किसी दंड का प्रावझान नहीं किया गया है। नागरिकों से ये अपेक्षित है कि वे कर्तव्यों का पालन करें। हालांकि, कई मौलिक कर्तव्य विशेष कानून से संरक्षित भी है। उदाहरण के लिए राष्ट्रध्वज भारतीय झंडा संहिता कानून के तहत संरक्षित है। इसका अपमान करने पर 3 साल की जेल, जुर्माना या फिर दोनों ही हो सकते हैं।
राष्ट्रध्वज के अपमान के अलावा कई अन्य मौलिक कर्तव्य भी कानून द्वारा संरक्षित किए गए हैं। उदाहरण के लिए अगर आप देश की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं तो आप जेल और जुर्माना दोनों से दंडित किए जा सकते हैं। उसी तरह राष्ट्र की अक्षुण्णता बनाए रखने के लिए भा कानून है। देशविरोधी कार्यों के लिए आप पर देशद्रोह का मुकदमा दायर किया जा सकता है।
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