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World Sanskrit Day: ग्रंथों से निकलकर कैसे विदेशों तक पहुंची संस्कृत भाषा? तमाम देशों में है सिलेबस का हिस्सा

Written By: Rituraj Tripathi @riturajfbd Published : Aug 09, 2025 05:40 pm IST, Updated : Aug 09, 2025 05:40 pm IST

संस्कृत के महत्व और उसके प्रति जागरुकता फैलाने के लिए विश्व संस्कृत दिवस मनाया जाता है। ये दुनिया की प्राचीन भाषाओं में से एक है, जिसका विस्तार भारत के जरिए दुनियाभर में हुआ।

World Sanskrit Day- India TV Hindi
Image Source : FREEPIK विश्व संस्कृत दिवस

नई दिल्ली: संस्कृत एक प्राचीन भाषा है, जिसे देवताओं की भाषा भी कहा जाता है। भारत में इस भाषा का महत्व बहुत ज्यादा है क्योंकि वैदिक काल में जो भी महान रचनाएं हुईं, वह इसी भाषा में की जाती थीं। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में इसी भाषा में ज्ञान दिया गया है। रामायण और महाभारत में भी इसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है। माना जाता है कि आर्यों की भाषा भी संस्कृत ही थी। 

क्यों मनाया जाता है विश्व संस्कृत दिवस, क्या है महत्व?

आज यानी 9 अगस्त को विश्व संस्कृत दिवस मनाया जा रहा है। इसे हर साल श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण माह  में पूर्णिमा का दिन होता है। पहला विश्व संस्कृत दिवस साल 1969 में मनाया गया था। इस दिन को संस्कृत भाषा के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए और लोगों को इस भाषा के प्रति जागरुक करने के लिए मनाया जाता है, जिससे दुनिया को ये याद रहे कि इस भाषा का महत्व कितना ज्यादा है।

संस्कृत भाषा के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि ये भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक है। इसे तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड़ और ओडिया के साथ भारत की 6 शास्त्रीय भाषाओं में से एक माना जाता है।

विदेशों तक कैसे पहुंची संस्कृत भाषा?

  • प्राचीन काल से ही संस्कृत भाषा का प्रसार विदेशों में होता रहा है। विभिन्न सांस्कृतिक, धार्मिक, व्यापारिक और बौद्धिक आदान-प्रदान की वजह से ये भाषा विदेशों में भी पहुंची। प्राचीन भारत में जब बौद्ध और जैन धर्म का प्रसार हुई तो उसके साथ संस्कृत ग्रंथ भी मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, जापान, कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम) तक पहुंचे। 
  • बौद्ध भिक्षुओं ने संस्कृत में लिखे गए सूत्रों और शास्त्रों का अनुवाद किया और इसे विदेशों में ले गए। माना जाता है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाहियान ने संस्कृत ग्रंथों को चीन में प्रचारित किया।
  • इसके अलावा प्राचीन भारत के व्यापारी और नाविक दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया, बाली) में गए, जिसकी वजह से उन्होंने हिंदू धर्म और संस्कृत साहित्य को इन देशों में प्रसारित किया। 
  • रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ पूरी दुनिया को प्रभावित करते हैं। ये मूल रूप से संस्कृत में ही थे, जिन्हें दुनियाभर में मान्यता मिली। जैसे इंडोनेशिया में काकाविन रामायण और खमेर साम्राज्य (कंबोडिया) में अंगकोर वाट जैसे मंदिरों में संस्कृत शिलालेख मिलते हैं।
  • तिब्बत में बौद्ध धर्म के साथ संस्कृत ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद हुआ। इसके अलावा श्रीलंका, नेपाल, भूटान और तिब्बत में संस्कृत का प्रसार धार्मिक और साहित्यिक आदान-प्रदान के माध्यम से हुआ। 
  • प्राचीन काल में नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्र पढ़ने आते थे। इन छात्रों के माध्यम से भी संस्कृत भाषा विदेशों में पहुंची। उदाहरण के लिए, चीनी यात्री यी-जिंग ने नालंदा में संस्कृत सीखी।

विदेशों में पढ़ाई जा रही संस्कृत भाषा

संस्कृत भाषा का प्राचीन काल से ही इतना प्रचार-प्रसार हुआ है कि वह दुनिया के तमाम देशों में पहुंच चुकी है। विश्व के कई देशों में इसे पढ़ाया जाता है और इसे पढ़ने वालों की दिलचस्पी इसमें बनी हुई है। ये उन देशों में विशेष रूप से पढ़ाई जाती है, जहां दक्षिण एशियाई अध्ययन, इंडोलॉजी, भाषा विज्ञान, या हिंदू और बौद्ध धर्म से संबंधित शैक्षिक कार्यक्रम हैं। 

संस्कृत भाषा विशेष रूप से जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान, चीन, भूटान, इजरायल, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन, और स्विट्जरलैंड में पढ़ाई जाती है।

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