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लगातार रहता है रीढ़ की हड्डी में दर्द, तो हो सकती है यह बड़ी वजह

ये लेख रीढ़ की हड्डी में दर्द की बीमारी के बारे में है। इस लेख में आप रीढ़ की हड्डी में दर्द का इलाज एवं लक्षण के साथ रीढ़ की हड्डी में दर्द की दवा, उपचार और निदान के बारे में जान सकते हैं

India TV Lifestyle Desk India TV Lifestyle Desk
Updated on: April 19, 2020 12:08 IST
रीढ़ की हड्डी में...- India TV Hindi
रीढ़ की हड्डी में दर्द

नई दिल्ली: कोई भी दर्द बड़ा या छोटा नहीं होता लेकिन अगर इसका सही समय पर इलाज नहीं किया गया तो यह भयंकर रुप ले सकता है इसलिए वक्त रहते ही दर्द का इलाज कराना चाहिए। कई रिसर्च् में यह साबित हुई है कि लगातार रीढ़ की हड्डी में दर्द होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन अगर सही समय पर इलाज मिल जाए तो ठीक हो सकते है लेकिन अगर सही से इलाज नहीं किया गया तो यह भयंकर रूप ले सकती है। इस आर्टीकल में रीढ़ की हड्डी में दर्द की बीमारी के बारे में है। इस लेख में आप रीढ़ की हड्डी में दर्द का इलाज एवं लक्षण के साथ रीढ़ की हड्डी में दर्द की दवा, उपचार और निदान के बारे में जान सकते हैं

कम्प्रेसिव मायलोपैथी नामक बीमारी रीढ़ (स्पाइन) की हड्डियों को संकुचित कर उन्हें विकारग्रस्त कर देती है, लेकिन अब इस समस्या का इलाज संभव है... कम्प्रेसिव मायलोपैथी नामक बीमारी आमतौर पर पचास साल की उम्र के बाद शुरू होती है परंतु कई कारण ऐसे भी हैं जिनकी वजह से यह कम उम्र में भी परेशानी का कारण बन सकती है। कमर से लेकर सिर तक जाने वाली रीढ़ की हड्डी के दर्द को ही स्पॉन्डिलाइटिस कहते हैं। यह ऐसा दर्द है जो कभी नीचे से ऊपर और कभी ऊपर से नीचे की ओर बढ़ता है।

कारणों पर नजर

सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस आदि रीढ़ से संबंधित समस्याओं के कारण जब स्पाइनल कैनाल सिकुड़ जाता है, तब स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव बढ़ जाता है। इसके अलावा अन्य कई कारण हैं। जैसे रूमैटिक गठिया के कारण गर्दन के जोड़ों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे गंभीर जकड़न और दर्द पैदा हो सकता है। रूमैटिक गठिया आमतौर पर गर्दन के ऊपरी भाग में होता है। स्पाइनल टीबी,स्पाइनल ट्यूमर, स्पाइनल संक्रमण भी इस रोग के प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा कई बार खेलकूद, डाइविंग या किसी दुर्घटना के कारण रीढ़ की हड्डी के बीच स्थित डिस्क (जो हड्डियों के शॉक एब्जॉर्वर के रूप में कार्य करती है) अपने स्थान से हटकर स्पाइनल कैनाल की ओर बढ़ जाती है, तब भी संकुचन की स्थिति बन जाती है।

जांच
इस बीमारी का सबसे सटीक विवरण देता है एमआरआई। इस जांच के द्वारा रीढ़ की हड्डी में संकुचन और इसके कारण स्पाइनल कॉर्ड पर पड़ने वाले दबाव की गंभीरता को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसके अलावा कई बार रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर होने पर कंप्यूटर टोमोग्राफी (सीटी) स्कैन, एक्स-रे आदि से भी जांच की जा सकती है।

ऑपरेशन के बगैर उपचार
रोग के प्रारंभिक मामलों में दर्द और सूजन कम करने वाली दवाओं और गैर-ऑपरेशन तकनीकों से इलाज किया जाता है। गंभीर दर्द का भी कॉर्टिकोस्टेरॉयड से इलाज किया जा सकता है, जो पीठ के निचले हिस्से में इंजेक्ट की जाती है। रीढ़ की हड्डी को मजबूती और स्थिरता देने के लिए फिजियोथेरेपी की जाती है। अगर इन गैर-ऑपरेशन विधियों से लाभ नहीं होता तो हम सर्जरी कराने का सुझाव दे सकते हैं। ऐसी अनेक सर्जिकल तकनीकें हैं जिनका इस रोग के इलाज में इस्तेमाल किया जा सकता है।

सर्जिकल उपचार 
कम्प्रेसिव मायलोपैथी की समस्या के स्थायी इलाज के लिए प्रभावित स्पाइन की वर्टिब्रा की डिकम्प्रेसिव लैमिनेक्टॅमी (एक तरह की सर्जरी) की जाती है ताकि स्पाइनल कैनाल में तंत्रिकाओं के लिए ज्यादा जगह बन सके और तंत्रिकाओं पर से दबाव दूर हो सके।

यदि डिस्क हर्नियेटेड या बाहर की ओर निकली हुई होती हैं तो स्पाइनल कैनाल में जगह बढ़ाने के लिए उन्हें भी हटाया जा सकता है, जिसे डिस्केक्टॅमी कहते हैं।
कभी-कभी उस जगह को भी चौड़ा करने की जरूरत पड़ती है, जहां तंत्रिकाएं मूल स्पाइनल कैनाल से बाहर निकलती हैं। इस स्थान को फोरामेन कहते हैं। इस सर्जिकल प्रक्रिया को फोरामिनोटॅमी कहा जाता है।
जानें लक्षणों को

रीढ़ की हड्डी नसों की केबल पाइप जैसी होती है। जब यह पाइप संकुचित हो जाती है, तो नसों पर दबाव से ये लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं ...

सुन्नपन या झुनझुनी का अहसास होना
गर्दन, पीठ व कमर में दर्द और जकड़न
लिखने, बटन लगाने और भोजन करने में समस्या
गंभीर मामलों में मल-मूत्र संबंधी समस्याएं उत्पन्न होना
चलने में कठिनाई यानी शरीर को संतुलित रखने में परेशानी
कमजोरी के कारण वस्तुओं को उठाने या छोड़ने में परेशानी
बचाव व रोग का उपचार

व्यायाम इस रोग से बचाव के लिए आवश्यक है।
देर तक गाड़ी चलाने की स्थिति में पीठ को सहारा देने के लिए तकिया लगाएं।
कंप्यूटर पर अधिक देर तक काम करने वालों को कम्प्यूटर का मॉनीटर सीधा रखना चाहिए।
कुर्सी की बैक पर अपनी पीठ सटा कर रखना चाहिए। थोड़े-थोड़े अंतराल पर उठते रहना चाहिए। उठते-बैठते समय पैरों के बल उठना चाहिए।
दर्द अधिक होने पर चिकित्सक की सलाह से दर्द निवारक दवाओं का प्रयोग किया जा सकता है। फिजियथेरेपी द्वारा गर्दन का ट्रैक्शन व गर्दन के व्यायाम से आराम मिल सकता है।

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