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प्रथम विश्वयुद्ध के सैनिकों के संदेश 100 साल बाद ऑस्ट्रेलियाई समुद्र तट की बोतलों से हुए बरामद, जानें पूरा मामला

 Edited By: Dharmendra Kumar Mishra
 Published : Oct 29, 2025 11:52 pm IST,  Updated : Oct 29, 2025 11:52 pm IST

प्रथम विश्व युद्ध के सैनिकों के संदेश पत्रों से भरी यह बोतल समय की सीमाओं को पार कर पीढ़ियों को जोड़ती है और हमें सिखाती है कि इतिहास कभी मरता नहीं, बल्कि लहरों में तैरता रहता है।

प्रतीकात्मक फोटो- India TV Hindi
प्रतीकात्मक फोटो Image Source : AP

मेलबर्न: प्रथम विश्व युद्ध की भयावहता के बीच फ्रांस के खूनी युद्धक्षेत्रों की यात्रा के महज कुछ दिनों बाद दो ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों ने एक साधारण बोतल में अपनी भावनाओं को कागज पर उकेरा था। यह संदेश समय की धूल में दबा रह गया, अब एक शताब्दी से अधिक बीतने के बाद ऑस्ट्रेलिया के तट पर प्रकट हो गया है। यह खोज न केवल इतिहास की एक अनोखी कड़ी जोड़ती है, बल्कि उन सैनिकों की साहसिकता और मानवीय संवेदनाओं को भी जीवंत कर देती है। 

समुद्र तट पर बोतल में मिले संदेश

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के एस्परेंस क्षेत्र के व्हार्टन बीच पर समुद्र की लहरों से ब्राउन परिवार ने 9 अक्टूबर को यह रहस्यमयी बोतल प्राप्त की। डेब ब्राउन परिवार की एक सदस्य ने मंगलवार को बताया कि उनके पति पीटर और बेटी समुद्र तट की सफाई के दौरान पानी की सतह पर तैरती हुई यह श्वेप्स ब्रांड की मोटी शीशे की बोतल पर नजर पड़ी। उत्सुकता से बोतल खोली गई, तो अंदर एक पीली पड़ चुकी कागज की चिट्ठी मिली, जो पेंसिल से लिखी गई थी। यह पत्र 15 अगस्त, 1916 का था, जिसमें 27 वर्षीय प्राइवेट मैल्कम नेविल और 37 वर्षीय विलियम हार्ले ने अपनी खुशी और उत्साह व्यक्त किया था। 

सैनिकों ने क्या लिखा था संदेश में

सैनिकों ने लिखा था कि वे फ्रांस के युद्धक्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं, जहां वे सहयोगी सेनाओं के साथ जर्मनों का मुकाबला करेंगे। पत्र में हल्का-फुल्का हास्य भी झलकता है, जो युद्ध की कठोरता के बीच एक सकारात्मक स्पर्श देता है। ये दोनों सैनिक ऑस्ट्रेलियाई इम्पीरियल फोर्स का हिस्सा थे। उनका जहाज एचएमएटी ए70 बैलारेट, 12 अगस्त 1916 को दक्षिण ऑस्ट्रेलिया की राजधानी एडिलेड से रवाना हुआ था। यह लंबी समुद्री यात्रा यूरोप के पश्चिमी मोर्चे तक थी, जहां 48वीं ऑस्ट्रेलियाई इन्फैंट्री बटालियन को मजबूती मिलनी थी। बैलारेट जहाज ने प्रशांत महासागर से होकर गुजरते हुए हजारों किलोमीटर की दूरी तय की। नेविल और हार्ले जैसे युवा सैनिकों के लिए यह यात्रा नई उम्मीदों और अनिश्चितताओं से भरी थी। दुर्भाग्य से, मैल्कम नेविल का जीवन युद्ध की भेंट चढ़ गया। 

परिवारजन संदेश से हुए भावुक 

मात्र एक वर्ष बाद 1917 में वे फ्रांस के सोम्मे की लड़ाई में शहीद हो गए। उनकी उम्र महज 28 वर्ष थी। वहीं, विलियम हार्ले भाग्यशाली रहे। वे दो बार पहले गोलाबारी में और दूसरी बार खाइयों में गैस हमले से बुरी तरह घायल हुए, लेकिन युद्ध समाप्त होने तक जीवित रहे। युद्धोत्तर जीवन में भी उनका संघर्ष जारी रहा। 1934 में एडिलेड में कैंसर से उनकी मौत हो गई। उनके परिवार के अनुसार यह कैंसर जर्मन सेना के जहरीली गैस के हमलों का परिणाम था, जो खाइयों में सैनिकों की सेहत को धीरे-धीरे नष्ट कर देती थी। हार्ले के वंशज आज भी इस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि यह बोतल उनके पूर्वज की स्मृति को अमर कर देती है। यह खोज ब्राउन परिवार के लिए एक साधारण सफाई अभियान से कहीं अधिक साबित हुई। डेब ब्राउन ने कहा, "यह बोतल हमें इतिहास के पन्नों से जोड़ती है।


समुद्र के कचरे से मिला मूल्यवान रत्न

उन्होंने कहा कि हमने सोचा भी नहीं था कि कचरे में इतना मूल्यवान रत्न छिपा होगा।" विशेषज्ञों का मानना है कि बोतल समुद्र की धाराओं के साथ यात्रा करती रही, शायद दक्षिणी महासागर की लहरों ने इसे ऑस्ट्रेलिया लौटा दिया। ऑस्ट्रेलियाई युद्ध स्मृति संस्थान (एडब्ल्यूएम) ने इसकी जांच शुरू कर दी है, ताकि इसे संरक्षित किया जा सके। यह घटना प्रथम विश्व युद्ध की भयंकरता को याद दिलाती है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया ने 4 लाख से अधिक सैनिक भेजे, जिनमें से 60,000 शहीद हुए। नेविल और हार्ले जैसे सैनिकों की कहानी न केवल वीरता की है, बल्कि मानवीय भावनाओं की भी – वे युद्ध जाते हुए भी पत्र लिख रहे थे, जो आज भी प्रेरणा देता है।  (एपी)  

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