नई दिल्ली: कहने को तो बिहार में सुशासन बाबू का शासन है लेकिन अच्छे खासे सरकारी तंत्र की नाक के नीचे राजधानी पटना का सिस्टम नाले में पड़े कचरे की तरह ही सड़ गया है। एक मासूम की ज़िंदगी को बचाने की जद्दोजहद शुरू हुई तो खत्म होने का नाम नही ले रही है। 72 घंटे का वक्त बीत गया है और सीवर में गिरे दीपक का अब तक पता नहीं चल पाया है।
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दीपक के पिता पुनाईचक में ही फल की दुकान लगाते हैं। शनिवार को दीपक अपने पिता को खाना देकर लौट रहा था तभी संप हाउस के पास से गुजरते वक्त उसका पांव फिसला और वो इस नाले में गिर गया। जैसे ही दीपक के इस नाले में गिऱने की खबर फैली पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई।
स्थानीय लोग कुछ नहीं कर पाए तो पुलिस बुलाई गई, नगर निगम की टीम पहुंची। उसके बाद एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीम को भी बुलाया गया। इसके बाद शुरू हुआ दीपक को खोजने का मैराथन ऑपरेशन लेकिन नगर निगम की सुपर सकर मशीन और एनडीआरएफ व एसडीआरएफ के डीप डाइवर भी बच्चे को ढूंढ़ने में असफल रहे।
नाला कहां से शुरू होता है, कहां जाता है, किसी को पता नहीं। नाले के कितने रास्ते हैं नगर निगम के पास इसका कोई नक्शा ही नहीं है। गोताखोर और सफाई वाले मौके पर पहुंच तो गए थे लेकिन नाले में दीपक को खोजे कहां, सब चुप्पी साध कर खड़े थे। किसी के पास जानकारी नहीं थी, नाले का रास्ता कहां शुरू होता है और कहां खत्म।
जब बच्चा सीवर में गिरा तब एक हैरान करने वाला सच उजागर हुआ। पुनाईचक के इस नाले का निर्माण 1969 में हुआ था। 1969 के बाद से एक बार भी इस नाले की सफाई नहीं हुई। यानि पिछले 50 साल से उस सीवर लाइन की किसी ने कोई सुध नही ली। ना इसकी देखरेख की गई ना इसकी साफ सफाई हुई। नाले को बनाने वाली नगर निगम की टीम रिटायर हो चुकी है। 1969 में इस सीवर को बनाने वाले अधिकारी और इंजीनियर में से कुछ अब इस दुनिया में भी नहीं हैं।