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दिल्ली में क्लाउड सीडिंग से क्यों नहीं हुई बारिश? IIT दिल्ली ने रिपोर्ट जारी कर बताई अहम वजह

 Published : Oct 31, 2025 09:37 pm IST,  Updated : Oct 31, 2025 09:43 pm IST

दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने के लिए क्लाउड सीडिंग कराई गई थी। ये क्लाउड सीडिंग आईआईटी कानपुर की मदद से की गई। क्लाउड सीडिंग के बाद भी दिल्ली में आर्टीफीशियल बारिश नहीं हुई।

दिल्ली में की गई क्लाउड सीडिंग- India TV Hindi
दिल्ली में की गई क्लाउड सीडिंग Image Source : REPORTER INPUT

दिल्ली में क्लाउड सीडिंग के बाद भी आर्टिफीशियल बारिश न होने के बाद IIT-दिल्ली ने एक रिपोर्ट जारी की है। आईआईटी दिल्ली ने क्लाउड सीडिंग के बाद बारिश न होने की वजह बताई है। रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली का शीतकालीन वातावरण, विशेष रूप से दिसंबर और जनवरी के चरम प्रदूषण वाले महीनों के दौरान, पर्याप्त नमी और संतृप्तता के अभाव के कारण सुसंगत क्लाउड सीडिंग के लिए जलवायु विज्ञान के लिहाज से अनुपयुक्त है। आईआईटी के वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र द्वारा जलवायु संबंधी आंकड़ों (2011-2021) को एकीकृत करके किए गए एक व्यापक विश्लेषण पर आधारित यह रिपोर्ट, ऐसे समय में आई है, जब दिल्ली सरकार ने आईआईटी-कानपुर के सहयोग से बुराड़ी, उत्तरी करोल बाग और मयूर विहार में दो क्लाउड-सीडिंग परीक्षण किए, लेकिन बारिश नहीं हुई। 

दिल्ली-NCR में इस तरह का पहला प्रयोग

संस्थान ने इससे पहले 2017-18 में कानपुर में सफल परीक्षण किए थे, लेकिन दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में यह इस तरह का पहला प्रयोग था। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘हालांकि दिल्ली की सर्दियों के दौरान विशिष्ट वायुमंडलीय परिस्थितियों में क्लाउड सीडिंग सैद्धांतिक रूप से संभव है, लेकिन एक सुसंगत और विश्वसनीय वायु-गुणवत्ता हस्तक्षेप के रूप में इसकी व्यावहारिक उपयोगिता सीमित है। आवश्यक वायुमंडलीय परिस्थितियां दुर्लभ हैं और अक्सर प्राकृतिक वर्षा के साथ मेल खाती हैं, जिससे संभावित सीमांत लाभ सीमित हो जाता है।’ 

एरोसोल युक्त वातावरण

इसमें कहा गया है, ‘सफल होने पर भी प्रेरित बारिश प्रदूषण के स्तर में उछाल आने से पहले केवल एक संक्षिप्त राहत (आमतौर पर एक से तीन दिन) प्रदान कर सकती है। उच्च परिचालन लागत, एरोसोल युक्त वातावरण में निहित वैज्ञानिक अनिश्चितताएं और अंतर्निहित उत्सर्जन स्रोतों पर किसी भी प्रभाव की अनुपस्थिति को देखते हुए, दिल्ली के प्रदूषण प्रबंधन के लिए क्लाउड सीडिंग को प्राथमिक या रणनीतिक उपाय के रूप में अनुशंसित नहीं किया जा सकता है।’ 

पूर्वानुमान पर भी करता है निर्भर

रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिक से अधिक, यह घोषित वायु-गुणवत्ता आपात स्थितियों के दौरान एक उच्च-लागत वाले, रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में काम कर सकता है, जो कड़े एमएसआई-आधारित उपयुक्तता मानदंडों को पूरा करने वाले पूर्वानुमान पर निर्भर करता है। इसमें कहा गया है कि अंततः, अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि उत्सर्जन में निरंतर कमी दिल्ली में लंबे समय से जारी वायु प्रदूषण संकट का सबसे व्यवहार्य और टिकाऊ समाधान है। दशकीय विश्लेषण (2011-2021) इंगित करता है कि दिसंबर और जनवरी जैसे सर्दियों के मुख्य महीने सबसे गंभीर प्रदूषण प्रकरणों और सबसे शुष्क जलवायु परिस्थितियों के साथ आते हैं। 

गहन नमी और वायुमंडलीय उत्थान का रखना होता है ध्यान

इसमें कहा गया है, ‘प्रदूषण के चरम महीनों (दिसंबर-जनवरी) के दौरान पर्याप्त नमी का मूलभूत अभाव और संतृप्ति की स्थिति होती है, लेकिन यह हालात ठीक उसी समय होते हैं जब हस्तक्षेप की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। जबकि पश्चिमी विक्षोभ संभावित सीड़िग स्थितियों के प्राथमिक चालक हैं, व्यवहार्य मौके दुर्लभ हैं, जो विशिष्ट असामान्य घटनाओं तक ही सीमित हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘यहां तक कि संभावित रूप से आशाजनक माने जाने वाले दिनों (जैसे बिना बारिश वाले बादल युक्त पश्चिमी विक्षोभ के दिन) पर भी, बहु-मानदंड नमी उपयुक्तता सूचकांक (एमएसआई) इंगित करता है कि उनमें अक्सर सफल सीडिंग के लिए आवश्यक गहन नमी, संतृप्ति और वायुमंडलीय उत्थान के आवश्यक संयोजन का अभाव होता है।’ 

सीडिंग का संभावित अतिरिक्त लाभ सीमित

अध्ययन में दिल्ली के उच्च एरोसोल वातावरण से उत्पन्न जटिलताओं पर प्रकाश डाला गया है। उच्च एरोसोल लोडिंग (उच्च एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ द्वारा चिह्नित) बादल के विस्तार में बढ़ोतरी और उच्च तरल/बर्फीले पानी की मात्रा से जुड़ी है, खासकर बरसात के दौरान। अनुकूल सूक्ष्मभौतिक परिस्थितियां (निम्न मेघ आधार, उच्च जल सामग्री) अक्सर प्राकृतिक रूप से होने वाली बारिश के साथ मेल खाती हैं, जिससे सीडिंग का संभावित अतिरिक्त लाभ सीमित हो जाता है। एरोसोल परत की कम ऊंचाई (दो किमी से नीचे) और विशिष्ट सीडिंग योग्य बादल परतों (2-5 किमी) के बीच ऊर्ध्वाधर पृथक्करण भी महत्वपूर्ण चुनौतियां प्रस्तुत करता है। 

हल्की बारिश डालती है न्यूनत प्रभाव

प्रदूषण निवारण के संबंध में, विश्लेषण इस बात की पुष्टि करता है कि भारी प्राकृतिक बारिश अत्यधिक प्रभावी होती है (80-95 फीसदी से अधिक पीएम2.5, पीएम 10, एरनओएक्स बह जाता है), जबकि हल्की बारिश न्यूनतम प्रभाव डालती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि महत्वपूर्ण बहाव के बाद भी वायु गुणवत्ता में सुधार अल्पकालिक होता है और लगातार उत्सर्जन के कारण प्रदूषक कणों की सांद्रता आमतौर पर एक से पांच दिनों के भीतर घटना के पूर्व स्तर पर पहुंच जाती है। 

आपातकालीन अल्पकालिक उपाय 

बारिश के बाद ओजोन सांद्रता अक्सर बढ़ जाती है। हालांकि शुष्क पश्चिमी विक्षोभ कुछ सीमित वायु-संचार प्रदान करते हैं, फिर भी सिल्वर आयोडाइड जैसे सीडिंग एजेंटों के पर्यावरणीय/स्वास्थ्य प्रभावों, उच्च परिचालन लागत और वैज्ञानिक अनिश्चितताओं के संबंध में गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है,‘इन बाधाओं को देखते हुए, दिल्ली के शीतकालीन वायु प्रदूषण प्रबंधन के लिए क्लाउड सीडिंग को प्राथमिक या विश्वसनीय रणनीति के रूप में अनुशंसित नहीं किया जा सकता है। इसे अधिक से अधिक, एक संभावित उच्च-लागत वाले, आपातकालीन अल्पकालिक उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए, जो कड़े पूर्वानुमान मानदंडों पर निर्भर हो। (भाषा के इनपुट के साथ)

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