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'धुरंधर' से तगड़ा था इस फिल्म का क्रेज, टिकट खरीदने के लिए सड़क पर सो जाते थे लोग, लगती थी 5 km लंबी लाइन

Written By: Jaya Dwivedie @JDwivedie Published : Jan 02, 2026 04:08 pm IST, Updated : Jan 02, 2026 04:09 pm IST

बॉलीवुड में कई फिल्मों ने इतिहास रचा है। कुछ फिल्म कल्ट, कलासिक और आइकॉनिक कहलाई, लेकिन आज हम ऐसी फिल्म के बारे में बता रहे हैं जिसका दर्जा इन सबसे ऊपर है। सालों पहले आई इस फिल्म की आज भी दीवानगी है और ये 'धुरंधर' से काफी ज्यादा है।

mughal e azam dhurandhar- India TV Hindi
Image Source : STILL FROM FILMS मुगल ए आजम और धुरंधर

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिर्फ पर्दे पर नहीं चलतीं, बल्कि समय को पार कर एक मिसाल बन जाती हैं। मुगल-ए-आजम ऐसी ही एक फिल्म है, जिसे आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे कल्ट और भव्य फिल्मों में गिना जाता है। के आसिफ के निर्देशन में बनी यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं थी, बल्कि वह सिनेमाई अनुभव था जिसने दर्शकों को थिएटर तक खींच लाने की ताकत रखी। प्यार, त्याग, सत्ता और विद्रोह की यह कहानी उस दौर में आई, जब सिनेमा लोगों के लिए किसी जादू से कम नहीं था।

फिल्म ने रचा था इतिहाज

1944 में शुरू हुई 'मुगल-ए-आजम' की शूटिंग 16 साल बाद 1960 में पूरी हुई। इतने लंबे समय में बनी यह फिल्म अपने साथ अनगिनत किस्से, संघर्ष और भव्यता लेकर आई। कहा जाता है कि फिल्म के निर्माण में पानी की तरह पैसा बहाया गया, जिसकी वजह से के आसिफ आर्थिक तंगी तक झेलते रहे। लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई तो इसने ऐसा इतिहास रचा जो आज भी सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। फिल्म ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर सालों तक राज किया, बल्कि राष्ट्रीय पुरस्कार समेत कई बड़े सम्मान भी अपने नाम किए।

5 किलोमीटर लंबी लगती थी लाइन

'मुगल-ए-आजम' की दीवानगी का आलम यह था कि लोग टिकट पाने के लिए थिएटर के बाहर सड़क पर ही रात गुजार देते थे। लोग घर से खाना लेकर आते, सड़क पर सोते और अगली सुबह सबसे पहले टिकट लेने की कोशिश करते। कई शहरों में टिकट खिड़कियों पर 5 किलोमीटर तक लंबी लाइनें लगती थीं। आज के डिजिटल युग में यह कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन उस दौर में यही सिनेमा का जादू था।

इन सीन को ऐसे बनाया गया था भव्य

फिल्म की भव्यता आज भी मिसाल है। सलीम और अकबर के युद्ध सीन के लिए 2000 ऊंट, 4000 घोड़े और करीब 8000 सैनिकों का इस्तेमाल किया गया था, जिनमें से कुछ भारतीय सेना से भी लिए गए थे। यहां तक कि फिल्म में दिखने वाली भगवान कृष्ण की मूर्ति शुद्ध सोने की बनी थी। बाद में मुगल-ए-आजम पहली ऐसी हिंदी फिल्म बनी जिसे ब्लैक एंड व्हाइट रिलीज के कई साल बाद, 2004 में डिजिटल रूप से कलर करके दोबारा रिलीज किया गया।

'धुरंधर' से तुलना

अगर आज के दौर की बात करें तो हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘धुरंधर’ को भी वैसी ही चर्चा और दर्शकों की दीवानगी मिलती दिखी है। हालांकि स्वरूप और माध्यम बदल चुका है। 'धुरंधर' ने अपनी मजबूत कहानी, बड़े पैमाने और दमदार परफॉर्मेंस के दम पर यह साबित किया कि आज भी दर्शक भव्य सिनेमा देखने के लिए तैयार हैं। फर्क बस इतना है कि जहां 'मुगल-ए-आजम' के लिए लोग सड़कों पर सोते थे, वहीं धुरंधर के लिए एडवांस बुकिंग, सोशल मीडिया ट्रेंड्स और डिजिटल रिकॉर्ड्स बनते हैं।'मुगल-ए-आजम' ने अपने समय में सिनेमा की सीमाएं तोड़ी थीं, ठीक उसी तरह 'धुरंधर'आज के दौर में बड़े कैनवस और स्केल की फिल्मों की भूख को दिखाती है। दोनों ही फिल्में अपने-अपने समय की पहचान हैं, एक ने इतिहास रचा, दूसरी इतिहास से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ रही है। यही सिनेमा की खूबसूरती है, जो हर दौर में अपना जादू कायम रखता है।

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