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कोर्ट में दिन पर दिन उलझता जा रहा संजय कपूर की संपत्ति का मामला, मुश्किलों में दिख रहीं प्रिया?

 Written By: Shyamoo Pathak
 Published : Nov 22, 2025 09:42 pm IST,  Updated : Nov 22, 2025 09:42 pm IST

संजय कपूर की संपत्ति को लेकर चल रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसको लेकर बीते रोज सुनवाई हुई जिसमें कुछ तथ्य गलत साबित हुए हैं।

Sunjay Kapur- India TV Hindi
संजय कपूर Image Source : INSTAGRAM@SUNJAYKAPUR

बिजनेसमैन संजय कपूर की संपत्ति का मामला विवादों में लगातार घिरता जा रहा है। कोर्ट में उनकी संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर उनकी पत्नी प्रिया सचदेवा और एक्स वाइफ करिश्मा कपूर के बीच विवाद चल रहा है। इस मामले को लेकर कोर्ट में सुनवाई चल रही है। बीते रोज दिल्ली उच्च न्यायालय में 21 नवंबर को लगातार दूसरे दिन की सुनवाई ने मूल मुद्दे को और तीखा कर दिया। प्रिया कपूर के पक्ष के पास दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की कथित वसीयत में मूलभूत त्रुटियों और न ही अपनी ही कहानी में विरोधाभासों के लिए अभी भी कोई स्पष्टीकरण नहीं है। शुक्रवार की कार्यवाही के दौरान, गलत वर्तनी, गलत लिंग, गलत पते, चुनिंदा लाभार्थियों और संपत्तियों की सूची न होने को सही ठहराने के अपने जबरदस्त बहाने दोहराते हुए, प्रिया के वकील कोई नया तर्क, तथ्यात्मक औचित्य या ऐसा कोई सबूत पेश करने में विफल रहे जिससे पता चले कि संजय ने कभी वसीयत की समीक्षा की, उसे मंजूरी दी या उसे देखा भी था।

वसीयत में सामने आईं गलतियां?

यह गुरुवार की सुनवाई के तुरंत बाद हुआ, जहां वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव नायर ने अब बदनाम हो चुके "टेम्पलेट सिद्धांत" का हवाला देकर त्रुटियों का बचाव करने की कोशिश की थी, यह दावा करते हुए कि वसीयत में संजय की मां रानी कपूर की वसीयत के कुछ तत्व कॉपी किए गए हैं। लेकिन यहां सवाल यह है कि एक अरबपति अपनी वसीयत का मसौदा तैयार करने के लिए अपनी बुज़ुर्ग मां की वसीयत पर निर्भर क्यों रहेगा, और फिर भी अपने बच्चों, संपत्तियों और अपने लिंग के बारे में बुनियादी तथ्यों को सही करने में विफल क्यों रहेगा? आज की सुनवाई ने इस अविश्वसनीयता को और पुख्ता कर दिया। बचाव पक्ष अभी भी यह नहीं बता पाया कि रानी की वसीयत नोटरीकृत और प्रक्रियात्मक रूप से सही क्यों थी, जबकि संजय की वसीयत—जिसमें कहीं ज्यादा संपत्ति शामिल है—न तो नोटरीकृत है और न ही पंजीकृत। न ही वे दस्तावेज के बारे में संजय की ओर से एक भी ईमेल, संदेश, नोट या निर्देश न होने की व्याख्या कर पाए। डिजिटल ट्रेल अब भी यही दिखा रहा है कि फाइल एक ऐसे उपकरण से आई है जिसका दिवंगत उद्योगपति से कोई संबंध नहीं था।

2000 करोड़ रुपयों को लेकर बढ़ा विवाद

इस विसंगति को और बढ़ाने वाली बात यह थी कि बचाव पक्ष ने दो बिल्कुल अलग मुद्दों, यानी तलाक के आदेश के तहत किए गए भुगतान और आरके फैमिली ट्रस्ट के मूल्य, को एक साथ जोड़ने की कोशिश की। सबसे पहले, प्रिया द्वारा बच्चों के खर्चों के लिए किए गए भुगतान सहमति की शर्तों के तहत दायित्व थे और अब संपत्ति के दायित्व हैं। दूसरे, 2,000 करोड़ रुपये के लाभ दिए जाने के दावों के बावजूद, बच्चों को ट्रस्ट से एक भी रुपया नहीं मिला है। फिर भी प्रिया का पक्ष दोनों को एक दूसरे के स्थान पर रखने वाला बताता रहा, जो एक भ्रामक और तथ्यात्मक रूप से गलत तर्क है। शुक्रवार की दलीलों ने वसीयत के विलंबित प्रकटीकरण, उसे साझा करने से पहले हस्ताक्षर प्राप्त करने के प्रयास और तथ्यात्मक गलतियों के मुद्दों के बारे में कल की अनुत्तरित चिंताओं को फिर से जीवित कर दिया, जिनका प्रिया के वकील फिर से खंडन करने में विफल रहे। 

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