इरफान खान का नाम सुनते ही हमारे चेहरे पर एक मुस्कान और एक उदासी, दोनों एक साथ आ जाती है। इरफान मतलब एक ऐसी शख्सियत जो जिंदादिल होने के साथ-साथ हौसलामंद भी थे। हौसले की बात इसलिए क्योंकि इरफान ने अपने शुरुआती करिअर में भी वो ही फिल्में या सीरियल्स करने चाहे जिनमें उन्हें कुछ अलग हट के करने का मौका मिला और करिअर के पीक पर भी इरफान ने अपने रोल से कभी कॉम्परोमाइज़ नहीं किया। इरफान की फिल्में भी ऐसी हैं कि जिन्हें हम गौर से देखें तो पायेंगे कि इनमें सीखने के लिए कितना कुछ है। ऐसी ही पांच फिल्मों के बारे में हम आज आपको बता रहे हैं। ये सिर्फ फिल्में नहीं लाइफ मंत्र हैं।
तिग्मांशु धूलिया की इस फिल्म में इरफान का रोल बहुत छोटा और यूनीक है। इसमें इरफान ने एक स्टूडेंट यूनियन लीडर का रोल प्ले किया था जो एक से बढ़कर एक जिंदगी से जुड़ी चीजें शेयर करते थे। हासिल में सारा मसला जिमी शेरगिल और इरफान के बीच लव ट्रायंगल का है, लेकिन इरफान ने अपने रोल को इतने अच्छे से प्ले किया है कि हमें यह किसी वॉर फिल्म से कम नहीं लगती। हासिल हमें सिखाती है कि प्यार ज़बरदस्ती, छीनकर या खरीदकर नहीं कमाया जा सकता। उसके लिए समर्पण और त्याग की जरूरत है।
विशाल भारद्वाज की फिल्म मकबूल में इरफान का नाम ही मकबूल है। मकबूल अपने नाम के अनुसार ही मकबूल यानी मशहूर है। लेकिन मकबूल के जीवन में तब्बू के आ जाने से,वह सब कुछ पा लेने की कोशिश में जुट जाता है, लेकिन इस कोशिश में, उसके पास जो था, वो उससे भी हाथ धो बैठता है। मकबूल देखकर बहुत आसानी से ये एहसास हो सकता है कि सबको सबकुछ नहीं मिल सकता और जो हमारे पास है, उसकी कीमत हमारी चाहतों से कहीं ज्यादा है।
लाइफ ऑफ पाई में इरफान का रोल बहुत छोटा है। वह बस कहानी सुना रहे हैं। इस फिल्म को देखकर आप एक एडवेंचर राइड से गुजरेंगे और अंत में इरफान के साथ ही ये कहते मिलेंगे कि “दुख इस बात का नहीं हुआ कि वो चला गया, बल्कि इस बात का हुआ कि मुझे उसे अलविदा कहने का मौका भी नहीं मिला” लाइफ ऑफ पाई हमें सिखाती है कि जो है बस इसी पल में है, इसके आगे कुछ नहीं है। जो भी हम कर सकते हैं, करना चाहते हैं वो अभी इसी पल में कर सकते हैं।
मीरा नायर की फिल्म द नेमसेक में सारी कहानी ही नेम की है। इसमें इरफान एक बंगाली व्यक्ति के रोल में नजर आए थे जिसे अमेरिका में सैटल होने में परेशानी हो रही थी। यहां उनका बेटा गोगोल टीनएज में ही नशा करने लगता है। पर धीरे-धीरे उसे अपना कल्चर, अपनी सभ्यता में रुचि बढ़ने लगती है। यह फिल्म हमें हमारी जड़ों की कीमत समझाती है।
आकर्ष खुराना की फिल्म कारवां अपने आप में अनोखी फिल्म है। इसमें इरफान का कैरेक्टर शौकत बहुत ही सिम्पल, व्यंग्यात्मक और ज़िंदादिल है। यह फिल्म खूब हंसाती है पर साथ ही सीखने के लिए बहुत कुछ छोड़ जाती है। कारवां देखने वाला यह आसानी से समझ सकता है कि जिंदगी खुद एक सफर है, इस सफर की शुरुआत भले ही हम अकेले करते हैं पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कोई न कोई साथी मिलता चला जाता है और कारवां आगे बढ़ता जाता है।
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