AI यानी आर्टफिशियल इंटेलिजेंस पर फिर से सवाल उठने लगे हैं। हाल में आई MIT की रिपोर्ट में एआई की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है। अगर, दुनिया की टॉप इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट सच मान लें तो एआई पर दांव लगाने वाली बड़ी टेक कंपनियां डूब सकती हैं। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनियों द्वारा एआई पर लगाए गए बड़े दांव विफल रहे हैं। एआई वाले 95% पायलट प्रोजेक्ट्स फेल हो गए हैं। महज 5 प्रतिशत प्रोजेक्ट ही ऐसे रहे हैं, जो अपने मकसद में कामयाब हुए हैं।
एआई पर कंपनियों ने किया बड़ा निवेश
2022 में ChatGPT के लॉन्च के बाद से ही दुनिया भर की टेक कंपनियां जेनरेटिव एआई की रेस में भागने लगी। Google से लेकर Meta तक ने अपने जेनरेटिव एआई वाले मॉडल लॉन्च कर दिए। ये कंपनियां इन मॉडल्स पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं और उन्हें बेहतर बनाने में लगे हुए हैं लेकिन एआई मॉडल्स की विश्वसनीयता अभी भी सवालों के दायरे में हैं।

MIT ने The GenAI Divide: State of AI in Business 2025 की रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के जारी होने के बाद एक बार फिर से एआई पर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जिन कंपनियों ने एआई पर बड़ा दांव लगाया है उनके रेवेन्यू बढ़ाने वाला प्लान शुरुआत में सफल होता नहीं दिख रहा है। कई पावरफुल नए मॉडल्स को इंटिग्रेट करने के बाद भी महज 5% पायलट प्रोजेक्ट्स ही सफल हुए हैं। टेक कंपनियों ने एआई को एडॉप्ट करने में जितनी तेजी दिखाई उसका लाभ नहीं मिला है। 95% पायलट प्रोजेक्ट्स फेल हो गए हैं।
AI इंटिग्रेशन क्यों नहीं हुआ सफल?
रिपोर्ट के मुताबिक, टेक कंपनियों के अनरियल एक्सपेक्टेशन, खराब इंटिग्रेशन और स्पेशल एडॉप्शन की कमी एआई इंडस्ट्री के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। रिपोर्ट के आने के बाद ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या एआई इंडस्ट्री का हाल भी एक बुलबुले जैसा होगा? जेनरेटिव एआई के आने के बाद इंडस्ट्री को लगा था कि ChatGPT, Google Gemini, Claude, Perplexity जैसे टूल्स वर्कप्लेस पर काम करने के तरीके बदल सकते हैं। हालांकि, ये सफल होता नहीं दिखाई दे रहा है।
कई टेक कंपनियों ने एआई इंटिग्रेशन के बाद से बड़ी जॉब कटौती की है। खास तौर से ऑटोमैटेड कंटेंट क्रिएशन से लेकर कस्टमर सर्विस चैटबॉट के आने से लगा था कि इंडस्ट्री की प्रोडक्टिविटी बढ़ जाएगी लेकिन MIT की रिसर्च ने लोगों की सोचने पर मजबूर कर दिया है। इस रिसर्च के मुताबिक, एआई को लेकर किए गए अनुमान और आउटकम में काफी अंतर है।

एआई मॉडल नहीं हैं भरोसेमंद
MIT की रिसर्च में एआई की प्रोडक्टिविटी को टेस्ट किया गया, जिसमें महज 30 प्रतिशत एआई मॉडल ही ऑफिस टास्क को भरोसे के साथ संभाल सकते हैं। हालांकि, इंडिविजुअल लेवल पर एआई फायदेमंद साबित हो सकता है। इस स्टडी में पाया गया कि एंटरप्राइज लेवल पर एआई इंडिग्रेशन सफल नहीं रहा है। इसकी मुख्य वजह लर्निंग गैप है।
कंपनियां तेजी से एआई को इंटिग्रेट करने में लगी है लेकिन इन टूल्स को अपने हिसाब से बनाने में इन्वेस्ट नहीं किया है। ये एआई टूल्स बड़े-बड़े LLM (लार्ज लैंग्वेज मॉडल) पर तैयार किए गए हैं, जो खास जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते हैं। इसकी वजह से कंपनियों के एआई में किए गए निवेश का फायदा मिलता हुआ नहीं दिख रहा है।

AI इंसानों के लिए बड़ा खतरा
पिछले दिनों एआई के गॉडफादर कहे जाने वाले जेफरी हिंटन ने भी टेक कंपनियों द्वारा एआई के इंटिग्रेशन वाले अप्रोच पर सवाल उठाए थे। अमेरिका के लास वेगस में आयोजित एक इवेंट में उन्होंने कहा था कि टेक्नोलॉजी कंपनियां चाहती हैं कि एआई का दबदबा इंसानों पर बने। अगर, ऐसा हो गया तो आने वाले कुछ सालों में एआई हमारे लिए बड़ा खतरा बन जाएगा। ये इंसानों से अपनी बात मनावने में सफल भी हो सकता है।
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