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Explainer: देवदासी प्रथा का इतिहास क्या है? कर्नाटक में यह आज भी क्यों जारी है? समझें पूरी बात

 Published : Sep 25, 2025 08:53 am IST,  Updated : Sep 25, 2025 08:53 am IST

कर्नाटक में सदियों पुरानी देवदासी प्रथा आज भी जारी है, जिसमें बच्चियों को देवताओं को समर्पित किया जाता है। यह परंपरा अब शोषण का रूप ले चुकी है। सरकार और NGOs इस प्रथा को खत्म करने के लिए कानून, शिक्षा और पुनर्वास योजनाओं के जरिए काम कर रहे हैं, पर चुनौतियां बनी हुई हैं।

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2 देवदासियों की तस्वीर। Image Source : PUBLIC DOMAIN

कर्नाटक विधानसभा ने पिछले महीने एक विधेयक को मंजूरी दी थी जिसका उद्देश्य उत्पीड़ित देवदासी महिलाओं को सभी प्रकार के शोषण से और उनके बच्चों को सामाजिक वर्जनाओं से मुक्ति दिलाना था। दरअसल, सदियों पुरानी देवदासी प्रथा आज भी देश के कुछ इलाकों में जिंदा है। इस प्रथा के तहत छोटी बच्चियों को मंदिरों या देवताओं को समर्पित कर दिया जाता है। एक वक्त ऐसा था जब इस प्रथा को एक सम्मानजनक धार्मिक और सांस्कृतिक रिवाज के तौर पर जाना जाता था, लेकिन आज यह शोषण का प्रतीक बन चुकी है। आइए, समझते हैं कि यह प्रथा क्या है, यह क्यों बनी हुई है, और इसे खत्म करने के लिए क्या किया जा रहा है।

देवदासी प्रथा क्या है?

देवदासी का मतलब है 'देव की दासी' यानी देवताओं की सेवा करने वाली। इस प्रथा में छोटी बच्चियों को मंदिरों में किसी देवता से 'शादी' कर दी जाती है। ये बच्चियां मंदिरों में पूजा-पाठ, नृत्य (जैसे भरतनाट्यम), और दूसरी धार्मिक सेवाएं करती हैं। 6वीं से 12वीं सदी में यह प्रथा दक्षिण भारत, खासकर कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में बहुत प्रचलित थी। उस समय देवदासियों को समाज में सम्मान मिलता था। वे मंदिरों की कला और संस्कृति की रक्षक थीं, और राजा-महाराजा उनकी आर्थिक मदद करते थे।

वक्त के साथ कैसे बदली यह प्रथा?

समय के साथ, खासकर मध्यकाल में सल्तनत, मुगल और फिर ब्रिटिश राज के दौरान, मंदिरों की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई। मंदिरों को मिलने वाली राजसी मदद खत्म हो गई, जिससे देवदासियों की हालत खराब होने लगी। जो प्रथा कभी सम्मानजनक थी, वह धीरे-धीरे शोषण और देह व्यापार का रूप लेने लगी। कई देवदासियां अमीर लोगों की रखैल बन गईं, और उनकी बेटियों को भी उसी रास्ते पर धकेल दिया गया। ब्रिटिश सरकार ने 1934 में बॉम्बे देवदासी संरक्षण अधिनियम बनाया, लेकिन इसे लागू करने में कमी रह गई।

आज भी क्यों जिंदा है यह प्रथा?

कर्नाटक में यह प्रथा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसके पीछे कई वजहें हैं:

धर्म और अंधविश्वास: कुछ परिवारों का मानना है कि बेटी को देवता को समर्पित करने से परिवार को आशीर्वाद मिलता है और सम्मान बना रहता है।

गरीबी और मजबूरी: गरीब परिवार, खासकर अनपढ़ और कमजोर तबके, अपनी बेटियों को इस प्रथा में धकेलते हैं क्योंकि उनके पास और कोई रास्ता नहीं होता।
सामाजिक रुतबा: पहले देवदासियों को समाज में ऊंचा दर्जा मिलता था। कुछ परिवार आज भी इसे सम्मान बढ़ाने का जरिया मानते हैं।
कानून का कमजोर अमल: कर्नाटक में देवदासी प्रथा को रोकने के लिए कानून (कर्नाटक देवदासी (निषेध) अधिनियम) है, लेकिन इसे लागू करने में ढिलाई बरती जाती है।
पुरानी रवायतें: कुछ समुदायों में यह प्रथा एक परंपरा के रूप में बनी हुई है, जिसे तोड़ना मुश्किल है।

इसे खत्म करने के लिए क्या हो रहा है?

कर्नाटक सरकार और कई गैर-सरकारी संगठन (NGOs) इस प्रथा को खत्म करने के लिए काम कर रहे हैं। सरकार ने देवदासियों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं, जैसे मकान देना, स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम, और शिक्षा की सुविधा। NGO भी जागरूकता फैलाने और प्रभावित महिलाओं को समाज में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा है कि यह प्रथा गैरकानूनी है और यह बच्चियों के अधिकारों का हनन करती है। लेकिन इसके बावजूद कई चुनौतियां हैं। समाज में भेदभाव, जेंडर असमानता, और गरीबी इस प्रथा को खत्म करने में सबसे बड़ी रुकावट हैं। कुछ जगहों पर लोग अभी भी इसे धार्मिक परंपरा मानते हैं, जिससे बदलाव लाना मुश्किल हो रहा है।

पूरी तरह कैसे खत्म होगी यह प्रथा?

देवदासी प्रथा को पूरी तरह खत्म करने के लिए सख्त कानून लागू करने के साथ-साथ शिक्षा, आर्थिक मदद, और सामाजिक जागरूकता बहुत जरूरी है। सरकार और समाज को मिलकर उन परिवारों को सपोर्ट करना होगा जो गरीबी और मजबूरी की वजह से इस प्रथा को अपनाते हैं। साथ ही, लोगों को यह समझाना होगा कि यह प्रथा न सिर्फ गैरकानूनी है, बल्कि बच्चियों के भविष्य को भी बर्बाद करती है। कर्नाटक में देवदासी प्रथा एक ऐसी पुरानी रवायत है जो समय के साथ शोषण का रूप ले चुकी है। यह प्रथा न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि इंसानियत के खिलाफ भी है। इसे खत्म करने के लिए समाज को एकजुट होकर काम करना होगा।

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