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असम भारतीय सभ्यता की शिक्षा देने वाला पहला राज्य होगा, मदरसे और संस्कृत स्कूल बंद होंगे: हेमंत बिस्व शर्मा

 Edited By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Dec 15, 2020 08:07 pm IST,  Updated : Dec 15, 2020 08:07 pm IST

असम के शिक्षा मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने पहले कहा था कि राज्य सरकार मदरसों को चलाने के लिए सालाना 260 करोड़ रुपये खर्च कर रही है और ‘सरकार धार्मिक शिक्षा के लिए सार्वजनिक धन खर्च नहीं कर सकती।’

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असम के शिक्षा मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने कहा कि सरकारी खजाने की कीमत पर कुरान पढ़ाना जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। Image Source : AP REPRESENTATIONAL

गुवाहाटी: असम के शिक्षा मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने सोमवार को कहा कि उनका सूबा भारत का पहला राज्य होगा, जहां कई सरकारी मदरसों और संस्कृत विद्यालयों के बंद होने के बाद धर्म से परे भारतीय सभ्यता के बारे में पढ़ाया जाएगा। उन्होंने कहा कि असम कैबिनेट ने रविवार को मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल की अध्यक्षता में अपनी बैठक में सभी सरकारी मदरसों और संस्कृत स्कूलों को बंद करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, और इस संबंध में एक विधेयक शीतकालीन सत्र के दौरान विधानसभा में पेश किया जाएगा, जो 28 दिसंबर से शुरू हो रहा है।

‘असम में निजी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे मदरसे बंद नहीं होंगे’

शर्मा ने कहा, ‘सरकार द्वारा संचालित सभी 683 मदरसों को सामान्य विद्यालयों में परिवर्तित किया जाएगा और 97 संस्कृत टोल कुमार भास्करवर्मा संस्कृत विश्वविद्यालय को सौंप दिए जाएंगे। इन संस्कृत टोल को शिक्षा और अनुसंधान के केंद्रों में परिवर्तित किया जाएगा जहां धर्म से परे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्रीयता की श्क्षिा दी जाएगी, जो ऐसा करने वाला असम को पहला भारतीय राज्य बनाया जाएगा।’ शर्मा, जिनेक पास वित्त और स्वास्थ्य विभाग का भी प्रभार है, ने कहा कि असम में निजी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे मदरसे बंद नहीं होंगे।

‘सरकारी खजाने की कीमत पर कुरान पढ़ाने की इजाजत नहीं दे सकते’
शर्मा ने पहले कहा था कि राज्य सरकार मदरसों को चलाने के लिए सालाना 260 करोड़ रुपये खर्च कर रही है और ‘सरकार धार्मिक शिक्षा के लिए सार्वजनिक धन खर्च नहीं कर सकती।’ उन्होंने कहा था कि यूनिफॉर्मिटी लाने के लिए सरकारी खजाने की कीमत पर कुरान पढ़ाना जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। शिक्षा मंत्री ने सोमवार को कहा कि मदरसा शिक्षा की शुरुआत 1934 में हुई थी, जब सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला ब्रिटिश शासन के दौरान असम के प्रधानमंत्री थे।

‘बच्चों और मां-बाप को भी नहीं पता कि मदरसे नियमित स्कूल नहीं हैं’
उन्होंने कहा कि वर्तमान में राज्य मदरसा बोर्ड के तहत 4 अरबी कॉलेज भी हैं और इन कॉलेजों और मदरसों में 2 पाठ्यक्रम थे, एक विशुद्ध रूप से इस्लाम पर धार्मिक विषय है, और दूसरा सामान्य माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा निर्धारित सामान्य पाठ्यक्रम है। उन्होंने दावा किया कि अभिभावकों और माता-पिता के अलावा, मदरसों में नामांकित अधिकांश छात्र डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहते हैं और इस तथ्य से अवगत नहीं हैं कि ये नियमित स्कूल नहीं हैं। गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर द्वारा एक सर्वेक्षण में पाया गया कि मदरसों के अधिकांश छात्रों के माता-पिता और अभिभावक इस तथ्य से अवगत नहीं हैं कि उनके बच्चों को नियमित विषय नहीं पढ़ाए जा रहे हैं। (IANS)

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