Wednesday, January 21, 2026
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Gupt Navaratri Katha: गुप्त नवरात्रि क्यों माना जाता है साधना का विशेष पर्व?, यहां पढ़ें गुप्त नवरात्रि की पौराणिक कथा

Gupt Navaratri Katha: गुप्त नवरात्रि के दौरान जगत जननी मां दुर्गा की विशेष आराधना के साथ ही व्रत रखने और कथा का पाठ करने से साधक के जीवन के कष्ट दूर होते हैं। आज हम आपको बताएंगे गुप्त नवरात्रि की कथा क्या है।

Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
Published : Jan 21, 2026 07:58 pm IST, Updated : Jan 21, 2026 07:58 pm IST
Gupt Navaratri Katha गुप्त नवरात्रि कथा- India TV Hindi
Image Source : PEXELS गुप्त नवरात्रि की पौराणिक कथा

Gupt Navaratri Katha in Hindi: साल 2026 की पहली गुप्त नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) और शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) में जहां नवदुर्गा की पूजा होती है। वहीं आषाढ़ और माघ गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्या की साधना-आराधना करने का विधान है। शक्ति की साधना के लिए माघ महीने में पड़ने वाली गुप्त नवरात्रि के नौ दिन बहुत ही फलदायी माने गए हैं। 

गुप्त नवरात्रि का महापर्व 19 जनवरी 2026 से प्रारंभ हो चुका है, जो 27 जनवरी 2026 को समाप्त होगा। इन दिनों में मां दुर्गा की उपासना करने, व्रत रखने और विशेष साधना करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस दौरान गुप्त नवरात्रि का जरूर करना चाहिए। आज हम आपको गुप्त नवरात्र की पौराणिक कथा बताने जा रहे हैं। 

गुप्त नवरात्र की पौराणिक कथा (Gupt Navaratri Katha)

गुप्त नवरात्रि को तांत्रिक साधना, शक्ति उपासना और रहस्यमयी साधनाओं का विशेष पर्व माना जाता है। यह नवरात्रि विशेष रूप से उन साधकों के लिए महत्वपूर्ण होती है, जो मां शक्ति के गूढ़ स्वरूपों की आराधना करते हैं। गुप्त नवरात्रि के दौरान मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा-अर्चना की जाती है।

गुप्त नवरात्रि से जुड़ी यह कथा अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक मानी जाती है। इस कथा का पाठ नवरात्रि के दौरान कभी भी किया जा सकता है, लेकिन परंपरानुसार इसका वाचन और श्रवण प्रथम दिन विशेष फलदायी माना गया है।

कथा के अनुसार, एक समय ऋषि शृंगी भक्तों को दर्शन और उपदेश दे रहे थे। उसी दौरान भीड़ में से एक स्त्री आगे आई। उसने हाथ जोड़कर ऋषि से निवेदन किया कि उसके पति दुर्व्यसनों में लिप्त रहते हैं, जिसके कारण वह स्वयं पूजा-पाठ और धर्म-कर्म नहीं कर पाती। न तो वह धार्मिक अनुष्ठान कर पाती है और न ही ऋषियों को अन्न अर्पित कर पाती है।

उस स्त्री ने बताया कि उसका पति मांसाहारी और जुआरी है, फिर भी वह मां दुर्गा की सेवा करना चाहती है। उसका उद्देश्य माता की भक्ति-साधना के माध्यम से अपने और अपने परिवार के जीवन को सार्थक बनाना था। स्त्री के सच्चे भक्ति भाव को देखकर ऋषि शृंगी अत्यंत प्रसन्न हुए।

ऋषि ने उसे आदरपूर्वक समझाते हुए कहा कि वासंतिक और शारदीय नवरात्र तो सभी जानते हैं, लेकिन इनके अतिरिक्त वर्ष में दो और नवरात्र होते हैं, जिन्हें गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। उन्होंने बताया कि प्रकट नवरात्रों में नौ देवियों की उपासना की जाती है, जबकि गुप्त नवरात्रों में दस महा विद्याओं की साधना का विशेष महत्व होता है। इन नवरात्रों की प्रमुख देवी सर्वैश्वर्यकारिणी कही जाती हैं।

ऋषि शृंगी ने आगे कहा कि अगर गुप्त नवरात्रि में कोई भी भक्त सच्चे मन से माता दुर्गा की पूजा करता है, तो मां उसका जीवन सफल बना देती हैं। चाहे व्यक्ति लोभी हो, कामी हो, व्यसनी हो, मांसाहारी हो या पूजा-पाठ करने में असमर्थ ही क्यों न हो, गुप्त नवरात्रि में माता की आराधना करने से उसे जीवन में और किसी साधना की आवश्यकता नहीं रहती।

ऋषि शृंगी के वचनों पर पूर्ण विश्वास कर उस स्त्री ने गुप्त नवरात्रि की पूजा की। माता उसकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगे। उसके घर में सुख-शांति का वास हो गया और उसका पति भी गलत मार्ग छोड़कर सही रास्ते पर आ गया। इस प्रकार गुप्त नवरात्रि में देवी मां की आराधना करके उस स्त्री का जीवन फिर से आनंद और आशा से भर उठा।

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