Bihar Election Results 2025: बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने गर्दा उड़ा दिया है। एनडीए की आंधी में महागठबंधन तिनके की तरह बिखर गया। 38 फीसदी वोट लाने के बाद भी महागठबंधन के खाते में केवल 35 सीटें आई हैं। एनडीए की इस प्रचंड कामयाबी के कई फैक्टर बताए जा रहे हैं। जहां नीतीश का सुशासन, जनकल्याणकारी योजनाएं और हाल की कुछ योजनाएं गेम चेंजर साबित हुईं वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि एनडीए ने अति पिछड़ा वोटों की एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी जिसे महागठबंधन भेद नहीं पाया। लिहाजा महिलाओं और ईबीसी के वोटों ने एनडीए को प्रचंड बहुमत दिला दी।
अति पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के वोट से आई 'सुनामी'
नीतीश कुमार की सरकार ने महिलाओं और अति पिछड़े वर्ग के परिवारों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाईं। उनमें 10 हजार रुपये नकद मदद और जीविका दीदी कार्यक्रम से नारी सशक्तिकरण की भावना मजबूत हुई और वह वोटों में तब्दील हो गई। अति पिछड़ा वर्ग और महिलाओं का यह गठजोड़ एनडीए के लिए वरदान साबित हुआ। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ NDA की रणनीति का मुख्य स्तंभ बना, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां महिलाएं परिवार की फैसलों में बड़ी भूमिका निभाती हैं।
अति पिछड़ों के 36 फीसदी वोट बने गेम चेंजर
दरअसल, एनडीए के घटक दलों ने जहां बेहतर तालमेल के साथ चुनाव लड़ा। इसने जातीय समीकरणओं को इतनी कुशलता से संभाला कि विपक्ष का कोई भी गणित काम नहीं आया। जहां सवर्ण वोट एनडीए के साथ इंटैक्ट रहे वहीं ओबीसी, अति पिछड़ों और दलितों का एक बड़ा हिस्सा भी इससे जुड़ा। इसमें सबसे अहम रहे अति पिछड़ा वोटर्स, जो करीब 36 प्रतिशत हैं। यह बिहार में सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली वोट बैंक है। बिहार की सियासत में यह माना जाता है कि अति पिछड़ा समुदाय जिसे अपना समर्थन दे देता है, उसकी सरकार बनने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। इस वर्ग में करीब 100 से ज्यादा जातियां शामिल हैं।
एनडीए के संकल्प पत्र में अति पिछड़ों के लिए कमेटी
एनडीए ने अपने संकल्प पत्र में जहां एक करोड़ सरकारी नौकरी और रोजगार देने का वादा किया तो साथ ही अति पिछड़ा वर्ग को साधने के लिए एक समिति बनाने का भरोसा दिलाया। सम्राट चौधरी ने कहा कि एनडीए की सरकार बनेगी तो अति पिछड़ा वर्ग को 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देगा। इसके अलावा, अति पिछड़ा वर्ग (EBC) के सामाजिक समरसता और आर्थिक उत्थान के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जाएगा। इस समिति की सिफारिशों पर सरकार अति पिछड़ा वर्ग के कल्याण के लिए काम करेगी।
कितनी सीटों पर अति पिछड़ा वोट अहम
उधर, महागठबंधन ने भी अति पिछड़ी जातियों को लुभाने की कोशिश की। लेकिन चुनाव परिणामों से ऐसा लगता है कि अति पिछड़ा वर्ग ने महागठबंधन की जगह एनडीए के संकल्प पत्र पर ज्यादा भरोसा जताया। राज्य में विधानसभा की 141 ऐसी सीटें हैं जहां अति पिछड़ा वर्ग के वोट गेम चेंजर साबित होते हैं। इनमें से अधिकांश सीटों पर एनडीए ने अपनी बढ़त बनाई। वहीं महागठबंधन की हालत इन सीटों पर बेहद खऱाब रही। इससे पहले इन सीटों पर महागठबंधन और एनडीए के बीच लगभग बराबरी का मामला था। लेकिन इस बार गेम चेंज हो गया और महागठबंधन की जड़ें हिल गईं।
महागठबंधन में आपसी तालमेल का अभाव
अगर महागठबंधन के दल आपसी तालमेल के साथ इस चुनाव को लड़ते तो अति पिछड़ों के वोटों की मजबूत दीवार को भेदकर इस रिजल्ट को सुनामी में बदलने से रोक सकते थे। वे बेहतर रणनीति बना कर अपने प्रत्याशियों का चयन नहीं कर पाए। यही वजह रही कि मतदाताओं के बीच न तो उनकी कोई पहचान बनी और न ही उन्हें स्वीकार ही किया गया। इससे असंतोष भी पैदा हुआ और बागी उम्मीदवार भी खड़े हुए। यही वजह रही कि मतदाताओं ने एनडीए में ज्यादा भरोसा जताया।