नई दिल्ली: लालू प्रसाद के लिए 1974 के छात्र आंदोलन ने जहां राजनीति में प्रवेश का रास्ता खोला वहीं 1990 में वे बिहार के सियासी क्षितिज पर पूरी ताकत के साथ उभरे। हालांकि उनकी राजनीतिक पारी की शुरुआत 1977 के लोकसभा चुनाव में हुई जब छपरा लोकसभा सीट से प्रचंड जीत दर्ज कर वह सदन में पहुंचे। 1980 से 1989 के बीच वे दो बार बिहार बिहार विधानसभा के सदस्य रहे। इसी दौरान जननायक कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद वे नेता विपक्ष भी रहे।
1990 के चुनाव में जनता दल को बिहार में बहुमत हासिल हुआ। इससे पहले जगन्नाथ मिश्रा के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार सत्ता में थी। लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठित जनता दल की हवा में कांग्रेस का किला ढह गया। बिहार विधानसभा की कुल 324 सीटों पर हुए चुनाव में जनता दल 122 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी जबकि कांग्रेस केवल 71 सीटों तक सिमट गई। बीजेपी ने 237 सीटों पर चुनाव लड़ा था और केवल 39 सीटें जीत पाई थी। वहीं सीपीआई 23, सीपीएम-6, और जेएनपी (जेपी) को तीन सीटें मिली थी।
चुनाव परिणाम आने के बाद सबकी निगाहें जनता दल विधायक दल की बैठक पर टिकी थी। क्योंकि मुख्यमंत्री पद के लिए राम सुंदर दास का नाम आगे चल रहा था। राम सुंदर दास दलित तबके से आते थे और उनकी बेहद ईमानदार नेता की थी। वे पहले भी बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके थे। उस वक्त केंद्र में जनता दल की अगुवाई वाली संयुक्त मोर्चा की सरकार थी और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री थे। जनता दल के गठन में उनकी अहम भूमिका थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह की पहली पसंद रामसुंदर दास थे। रामसुंदर दास जैसे सीनियर और अनुभवी नेता के सामने लालू का पलड़ा कमजोर था। लेकिन उन्होंने तत्कालीन डिप्टी सीएम देवीलाल का समर्थन हासिल कर लिया था। उधर, नीतीश कुमार भी लालू के पक्ष खड़े थे।
उस समय केंद्र की राजनीति में वीपी सिंह और चंद्रशेखर दो प्रमुख केंद्र थे। दोनों में बनती नहीं थी। बताया जाता है कि इसी का फायदा उठाते हुए नीतीश कुमार ने चाल चली और चंद्रशेखर से कहा कि वीपी सिंह को रोकिए नहीं तो वे अपने मन का सीएम बना देंगे। ऐसे में चंद्रशेखर ने अपना दबदबा बनाए रखने के लिए रघुनाथ झा को आगे कर दिया। अब सीएम के लिए तीन-तीन उम्मीदवार मैदान में उतर पड़े। तय हुआ कि वोटिंग के जरिए मुख्यमंत्री तय होगा। यूं तो सीधी लड़ाई राम सुंदर दास लालू प्रसाद के बीच थी लेकिन रघुनाथ झा की एंट्री ने इसे दिलचस्प बना दिया। करीब 7 विधायकों ने रघुनाथ झा के पक्ष में मतदान कर दिया। लालू केवल तीन वोटों के मामूली अंतर से जीत दर्ज कर विधायक दल के नेता निर्वाचित हुए। 46 साल की उम्र में 10 मार्च 1990 को उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
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