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Explainer: दलाई लामा को क्यों भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी? क्या है तिब्बत के लोगों पर चीन के जुल्म की कहानी

हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहने वाले दलाई लामा का आज जन्मदिन है और वह 90 साल के हो गए हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दलाई लामा को क्यों तिब्बत छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी और चीन ने तिब्बत के लोगों पर क्या जुल्म किए?

Written By: Rituraj Tripathi @riturajfbd
Published : Jul 06, 2025 09:29 am IST, Updated : Jul 06, 2025 09:29 am IST
Dalai Lama- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV दलाई लामा

नई दिल्ली: भारत में दलाई लामा को काफी सम्मान दिया जाता है। वे तिब्बत की धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान के प्रतीक हैं। दरअसल "दलाई लामा" एक उपाधि है, जिसका अर्थ है "ज्ञान का सागर"। जबकि दलाई लामा का असली नाम तेनज़िन ग्यात्सो है। आज उनका जन्मदिन है और वह 90 साल के हो गए हैं।

दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहते हैं। वे शांति, करुणा और अहिंसा के प्रबल समर्थक हैं। उन्होंने तिब्बत की स्वायत्तता के लिए मध्यम मार्ग की नीति अपनाई, जिसमें पूर्ण स्वतंत्रता के बजाय वास्तविक स्वायत्तता की मांग की जाती है। साल 1989 में उन्हें शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

वर्तमान में, धर्मशाला में रहते हुए भी दलाई लामा तिब्बती संस्कृति को संरक्षित करने और वैश्विक मंच पर तिब्बत के मुद्दे को उठाने का काम करते हैं। उनकी शिक्षाएं बौद्ध दर्शन के साथ-साथ मानवीय मूल्यों पर केंद्रित हैं, जो उन्हें विश्वभर में सम्मानित बनाती हैं।

Dalai Lama

Image Source : PTI
दलाई लामा

क्यों भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी?

तिब्बत पर चीन के सख्त रवैये की वजह से दलाई लामा को साल 1959 में भारत में शरण लेनी पड़ी। चीन ने अपनी आक्रामक नीतियों से न केवल दलाई लामा को निर्वासित होने पर मजबूर किया बल्कि तिब्बत के लोगों का भी दमन किया और उनकी सांस्कृतिक पहचान को मिटाने की कोशिशें कीं।

20वीं सदी की शुरुआत तक तिब्बत अपनी स्वतंत्रता को बनाए हुए था। लेकिन 1949 में जब माओ ज़ेडॉन्ग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट चीन का उदय हुआ, तब तिब्बत को खतरा हुआ। साल 1950 में, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया। 1951 में, तिब्बत को मजबूरन "17-सूत्रीय समझौते" पर हस्ताक्षर करना पड़ा, जिसके तहत तिब्बत को चीनी संप्रभुता स्वीकार करनी पड़ी, हालांकि उसे कुछ हद तक स्वायत्तता का वादा किया गया।

जिस समय चीन ने तिब्बत पर अपना अधिकार स्थापित किया, उस समय 14वें दलाई लामा, तेनज़िन ग्यात्सो मात्र 15 साल के थे। उन्हें तिब्बत की बागडोर संभालनी पड़ी। शुरू में, उन्होंने चीनी अधिकारियों के साथ सहयोग करने की कोशिश की, लेकिन चीनी शासन ने तिब्बत की संस्कृति, धर्म और जीवनशैली पर हमला शुरू कर दिया। मठों को नष्ट किया गया, भिक्षुओं को प्रताड़ित किया गया, और तिब्बती लोगों पर कम्युनिस्ट विचारधारा थोपी गई। 

साल 1959 में, ल्हासा में चीनी दमन के खिलाफ एक बड़ा विद्रोह हुआ। इस विद्रोह को कुचलने के लिए चीन ने सैन्य बल का इस्तेमाल किया, जिसमें हजारों तिब्बती मारे गए। स्थिति बिगड़ने पर दलाई लामा की जान को खतरा बढ़ गया। मार्च 1959 में, वे गुप्त रूप से ल्हासा से भागे और हिमालय पार कर भारत में शरण ली। भारत सरकार ने उन्हें और उनके अनुयायियों को धर्मशाला में शरण दी, जहां आज भी निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय है।

Tibet

Image Source : PTI/FILE
चीन ने तिब्बत के लोगों पर किए जुल्म

तिब्बत के लोगों पर चीन ने क्या जुल्म किया?

चीन ने साल 1950 से लेकर अब तक तिब्बत में तिब्बती संस्कृति और पहचान को कुचलने की कोशिश की है। इस दौरान मठों और धार्मिक स्थलों को नष्ट किया गया और बौद्ध धर्म को कमजोर करने की कोशिश की गई। चीन ने न केवल तिब्बती भाषा और परंपराओं पर प्रतिबंध लगाए बल्कि स्कूलों में चीनी भाषा को अनिवार्य कर दिया।

चीन की नीतियों की वजह से तिब्बत में चीनी आबादी बढ़ाई गई। इसका असर ये हुआ कि तिब्बत में तिब्बती लोग अपनी ही भूमि पर अल्पसंख्यक बन गए। अक्सर ये खबरें सामने आती हैं कि चीन, तिब्बती लोगों की निगरानी कर उन्हें गिरफ्तार करता है। इस दौरान उन्हें यातनाएं भी दी जाती हैं और जबरन श्रम भी करवाया जाता है। चीन द्वारा तिब्बत के लोगों के विरोध प्रदर्शनों को क्रूरता से दबाया जाता है, जिसकी वजह से कई तिब्बती भिक्षुओं और नागरिकों ने आत्मदाह जैसे कठोर कदम उठाए हैं।

 

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