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EXCLUSIVE: सोशल मीडिया पर ऊल-जलूल बोलने से पहले सावधान! सुप्रीम कोर्ट के वकील से समझिए कानून और संविधान की मर्यादा की एक-एक बात

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Jun 16, 2026 03:29 pm IST,  Updated : Jun 16, 2026 03:37 pm IST

वायरल होने का जुनून आपको रातों-रात सोशल मीडिया पर पहचान तो दिला सकता है, लेकिन आपकी एक अभद्र टिप्पणी या मानहानि वाला कंटेंट कानूनी मुसीबत को दावत भी दे सकता है। इससे आपके खिलाफ FIR हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के वकील संदीप मिश्रा से जानिए अभिव्यक्ति की आजादी की संवैधानिक सीमाएं क्या हैं।

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पढ़िए सुप्रीम कोर्ट के वकील संदीप मिश्रा का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू। Image Source : PEXELS/PTI

Sandeep Mishra Exclusive Interview: रातों-रात वायरल होने की दौड़ में लगे लोग अक्सर भूल जाते हैं कि सोशल मीडिया पर कुछ भी बोला या लिखा नहीं जा सकता है। हमारा संविधान हमें बोलने और लिखने की आजादी देता है लेकिन इसमें कुछ बंधन भी हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील संदीप मिश्रा ने INDIA TV से एक्सक्लूसिव बातचीत में बताया कि कैसे वायरल होने का जुनून आपको जेल की सलाखों के पीछे भी पहुंचा सकता है। आपकी पढ़ाई-लिखाई खतरे में डाल सकता है। जानिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कानूनी दायरे, रोस्टिंग बनाम मानहानि और देश के नए आपराधिक कानूनों के तहत कड़े प्रावधान को लेकर एडवोकेट संदीप मिश्रा ने क्या-क्या बताया।

सवाल: अक्सर लोग बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल दे रहे हैं। ऐसे माहौल में जब हर किसी को वायरल होना है क्योंकि उससे पैसे भी कमाए जा सकते हैं, तो ऐसे में आप कानूनी विशेषज्ञ के तौर पर वायरल होने के चक्कर में कानूनी और सामाजिक मर्यादाओं को टूटते हुए कैसे देखते हैं?

जवाब: संदीप मिश्रा ने कहा कि हमारे संविधान में हर व्यक्ति को यह अधिकार मिला हुआ है कि वह अपने विचार अभिव्यक्त करे। लेकिन विचार अभिव्यक्त करने की कुछ मर्यादाएं हैं। लोग संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का हवाला देते हैं लेकिन इसमें 'Reasonable Restrictions' भी हैं। जब लोग विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं, तो एक दूसरा पैरा पढ़ना भूल जाते हैं। आपको स्वतंत्रता है, लेकिन उस पर 'रीजनेबल रिस्ट्रिक्शंस' लगाए जा सकते हैं- पब्लिक ऑर्डर, Morality, हेल्थ, ऑर्डर और दूसरे देशों के साथ हमारे संप्रभु संबंधों को लेकर।

आप कुछ भी बोलिए लेकिन दूसरे के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। अगर हमारे खिलाफ कोई डिफेमेटरी वर्ड बोला गया है, तो हम कानून का रुख कर सकते हैं: एडवोकेट संदीप मिश्रा

संदीप मिश्रा ने कहा, 'आपको कुछ भी बोलने या एक्सप्रेस करने का अधिकार है, लेकिन आप किसी की खिड़की के अंदर नहीं झांक सकते। इसलिए, फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशन अपने आप में पूर्ण अधिकार नहीं है कि आप कुछ भी बोलें; इसके साथ निर्बंधन जुड़े हुए हैं।'

संदीप मिश्रा के मुताबिक, सोशल मीडिया पर व्यूज आने से धन मिलता है, लेकिन इसके साथ ही आपके ऊपर एक लायबिलिटी आती है कि आप जिम्मेदारी से पोस्ट करें। अगर जिम्मेदारी से पोस्ट नहीं करते हैं, तो याद रखिए यह डिजिटल युग है। डिजिटल युग में अगर आप कुछ गलत करेंगे तो किसी गवाह या एविडेंस की जरूरत नहीं पड़ेगी। आप जांच एजेंसियों को धोखा देने के लिए भले ही कंटेंट एडिट कर लें, लेकिन जो आपका ऑरिजिनल कंटेंट है, जांच एजेंसियां उसे अदालत के सामने रख देंगी। ऐसे में आपके द्वारा किया गया गलत काम आपके गले की हड्डी बनेगा और आपको कोई बचा नहीं सकता।

सवाल: युवा और उसमें भी खासकर Gen-Z, जो कानून के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं, उनको किस बात का ध्यान रखना चाहिए? वो बारीक लाइन या 'लक्ष्मण रेखा' क्या है जिससे उनका बोलना अपराध की श्रेणी में ना आए?

जवाब: संदीप मिश्रा ने कहा कि आत्म-चिंतन करें कि जो बात आप अपने लिए पसंद नहीं करते, वह दूसरे के लिए बोलने से परहेज करें। क्या आप चाहेंगे कि आपके घर की बातें पब्लिक में डिस्कस हों? बिल्कुल भी नहीं। तो दूसरों के साथ भी ऐसा ना करें। क्या आप चाहेंगे कि आपकी या आपके परिवार की नकारात्मक छवि आपके मित्र सार्वजनिक मंच पर रखें? नहीं। इसलिए दूसरों की छवि भी धूमिल न करें।

आज Gen-Z के ऊपर यह बड़ी जिम्मेदारी है, खासकर उन राज्यों में जो बॉर्डर या तटीय इलाके हैं, जैसे- पश्चिम बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु, केरल, हम कोई ऐसी टिप्पणी ना करें जो हमारी संप्रभुता या देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चैलेंज पैदा करे। हम अनजाने में कुछ पोस्ट कर देते हैं, लेकिन विरोधी राष्ट्र उसका दुरुपयोग कर सकते हैं: एडवोकेट संदीप मिश्रा

संदीप मिश्रा के अनुसार, Gen-Z के लिए सबसे बड़ा प्रिकॉशन है कि अगर कोई भी इंफॉर्मेशन आए, तो उसे वेरिफाई करें। अब कोई न्यूज़ अगर इंडिया टीवी से आ रही है, तो निश्चित ही वो एक बड़ा और जिम्मेदार चैनल है। वहां लोग चीजों को वेरिफाई करते हैं। ऐसे फैक्ट शेयर करने में कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन किसी अनजान वेबसाइट या यूट्यूबर के कंटेंट की सत्यता की पुष्टि नहीं होती। जब तक बात कन्फर्म ना हो, तब तक उसे लाइक, शेयर या फॉरवर्ड ना करें। अगर आपने कोई ऐसा कंटेंट शेयर कर दिया जिसमें क्रिमिनल पॉइंट बन रहा है, तो पुलिस एफआईआर दर्ज करेगी।

सवाल: वायरल होने की चाहत में कई बार लोग मजाक में ही सही, गैरकानूनी काम कबूल कर बैठते हैं या अभद्र टिप्पणी कर देते हैं। जब वो रिकॉर्ड होकर सोशल मीडिया पर चला जाता है, तो ऐसे मामलों में क्या एफआईआर हो सकती है? क्या कोर्ट या पुलिस खुद इसका संज्ञान ले सकते हैं?

जवाब: संदीप मिश्रा ने कहा, 'निचली अदालतें जैसे- जिला अदालत, सीजेएम, सू-मोटो कॉग्निजेंस नहीं लेती हैं क्योंकि उनके पास पहले से काम बहुत ज्यादा है। लेकिन हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के पास पर्याप्त शक्तियां हैं और वे इसका प्रयोग भी करते हैं। हां, अगर कंप्लेंट होती है, तो कार्यवाही जरूर होती है। और कंप्लेंट होने के बाद आपको मुकदमे झेलने पड़ेंगे। अगर डिजिटल एविडेंस एस्टेब्लिश कर देता है कि आपने डिफेमेटरी वर्ड्स शेयर किए हैं, तो कोई भी डिफेंस नहीं चलता है।'

सवाल: अगर किसी युवा से अज्ञानतावश भी ऐसी गलती हो जाती है और मुकदमा दर्ज हो जाता है, तो उसके भविष्य यानी पढ़ाई, करियर, सरकारी नौकरी या पासपोर्ट के लिए क्या खतरा पैदा हो जाता है? और बचाव के क्या विकल्प हैं?

जवाब: संदीप मिश्रा ने कहा कि पहली बार जाने-अनजाने में हुए क्राइम पर अदालत का रुख थोड़ा नरम हो सकता है। लेकिन अगर आपकी हिस्ट्री बन जाती है, तो बचाना मुश्किल है। 'Prevention is better than cure.'

जब तक आपके खिलाफ मुकदमा चलेगा, आपको विदेश यात्रा की परमिशन नहीं मिलेगी। पासपोर्ट भी जब्त हो सकता है। रोजगार की बात करें तो किसी भी सरकारी या प्राइवेट नौकरी में पुलिस वेरिफिकेशन होता है। जब तक आप मुकदमे से बरी नहीं हो जाते, आपको नौकरी मिलना बहुत मुश्किल है: एडवोकेट संदीप मिश्रा

संदीप मिश्रा के मुताबिक, वायरल होने से आप 2-4 दिन का फेम पाएंगे लेकिन जिंदगी में शॉर्टकट नहीं है। आपको मेहनत करनी ही पड़ेगी। शॉर्टकट से वायरल होने के बजाय शुभांशु शुक्ला, मैरी कॉम या वैभव सूर्यवंशी की तरह अपने काम से नाम कमाएं। कुछ ऐसा गंभीर और सकारात्मक काम करें कि आपको खुद वायरल होने की जरूरत ना पड़े, लोग आपके काम को वायरल करें।

सवाल: एक तरफ मेहनत से नाम कमाने वाले उदाहरण हैं और दूसरी तरफ कई इन्फ्लुएंसर्स हैं जो अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, करोड़ों कमाते हैं और विवादों के बाद उनका फेम और बढ़ जाता है। ऐसे में युवा पीढ़ी जो पैसे और फेम से प्रभावित होती है, वो इस कन्फ्यूजन से कैसे बचे?

जवाब: संदीप मिश्रा ने कहा कि दूसरों की गलतियों से सबक लो, नहीं तो आपकी गलतियों से लोग सबक लेंगे। एक दिन के लिए भी अगर जेल जाना पड़े, तब आजादी की कीमत समझ आ जाती है। आप ऐसा कुछ ना करें जिससे आपकी Liberty Curtail हो। करोड़ों रुपये कमाकर भी उनके पास 'पीस ऑफ माइंड' नहीं है। बोलने में सावधानी बरतें।

अगर आप दूसरों के सम्मान की रक्षा नहीं करेंगे और देश के संवैधानिक स्ट्रक्चर या आम लोगों को ठेस पहुंचाएंगे, तो आप परेशानी में पड़ेंगे। बहन-बेटियों के खिलाफ बोलने पर पुलिस सख्ती से निपटती है। युवाओं को नेगेटिविटी से दूर रहकर अपनी पॉजिटिव एनर्जी पर फोकस करना चाहिए: एडवोकेट संदीप मिश्रा

सवाल: आजकल सरेआम बेइज्जती करने या 'रोस्ट' करने का नया ट्रेंड बन गया है। अगर कोई रोस्टिंग के नाम पर किसी की छवि खराब करता है, तो पीड़ित के पास क्या कानूनी विकल्प हैं? और मजाक व मानहानि के बीच की बारीक लकीर क्या है?

जवाब: संदीप मिश्रा ने कहा कि ह्यूमर और डिफेमेशन के बीच बहुत थिन लाइन है। अगर कोई बात पहले से पब्लिक डोमेन में है और आप उसे 'गुड फेथ' में कह रहे हैं, तो आप बच सकते हैं। लेकिन अगर आप किसी की एक्सक्लूसिव और नकारात्मक जानकारी सार्वजनिक कर रहे हैं जिससे उसकी छवि धूमिल हो, तो आपके ऊपर कानून का हथौड़ा आ सकता है।

पीड़ित के पास विकल्प है कि वह अपने वकील के माध्यम से लीगल नोटिस भेजे और कारण पूछे। अगर सामने वाला बिना शर्त माफी मांग लेता है, तो बात खत्म हो सकती है। लेकिन अगर वो इसे जस्टिफाई करने की कोशिश करता है, तो आप उसके खिलाफ सिविल या क्रिमिनल डिफेमेशन का मुकदमा कर सकते हैं: एडवोकेट संदीप मिश्रा

सवाल: भारतीय न्याय संहिता लागू हो चुकी है। अगर कोई पब्लिक प्लेस पर या सोशल मीडिया पर किसी की छवि खराब करता है, तो BNS में इसके लिए सजा के क्या कड़े प्रावधान हैं?

जवाब: संदीप मिश्रा ने कहा कि BNS में कोई खास तब्दीली नहीं है; पुराना डिफेमेशन का कानून ही इसमें शामिल है। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव एविडेंस रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया में है। अब चीजें डिजिटल हो गई हैं, जिससे मुकदमों की सुनवाई जल्दी होगी और फैसले त्वरित आएंगे। मुकदमे को लंबा खींचना अब मुश्किल है। ऐसे मामलों में अधिकतम दो साल की सजा है।

जहां तक क्रिमिनल डिफेमेशन और सजा की बात है, ऐसे मामलों में 'सत्य' ही आपका सबसे बड़ा बचाव है। अगर आपने गलती की है और आप अदालत में एफिडेविट देकर बिना शर्त माफी मांग लेते हैं, तो कई बार अदालतें जुर्माना लगाकर छोड़ देती है: एडवोकेट संदीप मिश्रा

सवाल: देश के करोड़ों युवाओं और Gen-Z को सोशल मीडिया पर पोस्ट करते समय किन खास बातों का ध्यान रखना चाहिए जिससे वो कभी मुश्किल में ना फंसे?

जवाब: संदीप मिश्रा ने कहा कि महिलाओं के चरित्र या पवित्रता को लेकर कोई कमेंट ना करें। देश की कोई भी कॉन्फिडेंशियल जानकारी शेयर ना करें जिसका विदेशी ताकतें फायदा उठा सकें। जो आईडी या अकाउंट्स देश विरोधी माहौल बना रहे हैं, उन्हें भारत सरकार के साइबर क्राइम पोर्टल पर रिपोर्ट करें। युवा पहाड़ों पर जा रहे हैं, राफ्टिंग कर रहे हैं, अच्छे काम कर रहे हैं। आप भारत के ब्रांड एंबेसडर हैं। रील बनाने का मकसद देश की खूबसूरती और सकारात्मकता को दुनिया को दिखाना होना चाहिए। जब आप पॉजिटिव एनर्जी के साथ काम करेंगे, तो लोग खुद ही आपके काम को एप्रिशिएट करेंगे।

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