रायपुर: छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में 2 दशकों से चली आ रही नक्सली हिंसा को एक बड़ा झटका लगा है। मंगलवार को आंध्र प्रदेश के मारेदुमिल्ली जंगल में सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के टॉप कमांडर माडवी हिडमा को उसकी पत्नी राजे उर्फ राजक्का और 4 अन्य नक्सलियों के साथ मार गिराया। छत्तीसगढ़ पुलिस ने इसे नक्सलवाद की 'ताबूत में आखिरी कील' करार दिया है। हिडमा नक्सली संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का सबसे युवा सेंट्रल कमिटी मेंबर था, और उसने लंबे समय से सुरक्षा बलों की नाक में दम कर रखा था। माना जा रहा है कि उसके मारे जाने से नक्सलियों की कमर टूट गई है।
90 के दशक के अंत में नक्सली बना हिडमा
माडवी हिडमा का जन्म 1984 के आसपास छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुर्वर्ति गांव में हुआ था। दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई के बाद 1990 के दशक के अंत में वह नक्सली संगठन में शामिल हो गया। शुरू में एक साधारण ग्राउंड-लेवल ऑर्गनाइजर के रूप में काम करने वाला हिडमा जल्द ही 'गुरिल्ला युद्ध' का मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट बन गया। उसे 'हिडमालु' या 'संतोष' के नाम से भी जाना जाता था। बस्तर के जंगलों में वह नक्सलियों का चेहरा था, और बेहद चालाक और बेरहम माना जाता था। उसकी उम्र और चेहरा सालों तक रहस्य बना रहा, लेकिन इस साल उसकी तस्वीर सामने आने के बाद उसकी पहचान पक्की हो गई।
एके-47 लटकाए जंगलों में घूमता था हिडमा
हिडमा पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी यानी कि PLGA के बटालियन नंबर 1 का कमांडर था, जो दंडकारण्य क्षेत्र (छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना और महाराष्ट्र के हिस्सों में फैला) की सबसे ताकतवर यूनिट थी। 2024 में उसे सेंट्रल कमिटी में प्रमोट किया गया, जहां वह सबसे युवा मेंबर था। NIA की मोस्ट वांटेड लिस्ट में शामिल हिडमा पर 1 करोड़ रुपये से ज्यादा का इनाम था। हिडमा एके-47 रायफल लटकाए जंगलों में घूमता, जबकि उसके सैकड़ों साथी आधुनिक हथियारों से लैस होते। वह अपनी 4 लेयर के सुरक्षा कवच के कारण सालों तक पकड़ से बाहर रहा। लेकिन पिछले 2 सालों में सुरक्षाबलों की लगातार कार्रवाइयों ने उसके कवच को तोड़ा, और वह छत्तीसगढ़-तेलंगाना व आंध्र प्रदेश बॉर्डर पर छिपने को मजबूर हो गया।
झीरम घाटी हमले का मास्टरमाइंड था हिडमा
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हिडमा ने 26 बड़े हमलों की साजिश रची, जिनमें सैकड़ों जवान शहीद हुए। हिडमा का नाम पहली बार 2010 के ताड़मेटला हमले में आया, जहां 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। यहां उसने सीनियर कमांडर पापा राव की मदद की थी। उसके बाद बस्तर में हर बड़े हमले में उसका हाथ रहा। 2013 का झीरम घाटी या दरभा वैली का हमला इसका सबसे कुख्यात उदाहरण है। दरभा वैली में कांग्रेस के काफिले पर नक्सलियों ने हमला किया था, जिसमें तत्कालीन राज्य कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 27 लोग मारे गए थे। हिडमा को इस हमले का मास्टरमाइंड बताया गया था।

बुरकापाल हमले में भी था हिडमा का हाथ
2017 के बुरकापाल हमले में भी उसका हाथ था जिसमें CRPF के 24 जवान शहीद हुए थे। इसके अलावा 2010 में दंतेवाड़ा और 2017 में सुकमा में हुए बड़े नक्सली हमलों में भी उसकी भूमिका थी। दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी (DKGSZC) का मेंबर होने के नाते, हिडमा ने दक्षिणी बस्तर में कई खूनी साजिशें रची थीं। अप्रैल 2021 में सुरक्षाबलों ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन 2000 जवानों की टीम को 400 नक्सलियों ने घेर लिया। 5 घंटे की लड़ाई में 23 जवान शहीद हुए, जबकि नक्सलियों के 15 सदस्य मारे गए। अप्रैल 2025 से कर्रेगुट्टा पहाड़ियों में 1000 से ज्यादा नक्सलियों की घेराबंदी में भी हिडमा केंद्र में था।उसकी पत्नी राजे भी बैटालियन में सक्रिय थी और हर बड़े हमले में शामिल थी।
कैसे हुआ हिडमा के आतंक का अंत?
आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले के मारेदुमिल्ली जंगलों में मंगलवार सुबह सुरक्षाबलों ने हिडमा, राजे और 4 अन्य नक्सलियों को घेरकर मार गिराया। बस्तर के एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने उसके मारे जाने की पुष्टि करते हुए कहा, 'हिडमा का खात्मा बस्तर से माओवाद उखाड़ फेंकने की दिशा में बड़ा कदम है।' यह घटना नक्सलियों के लिए 'कफन में आखिरी कील' जैसी है। बस्तर का नक्सलवाद पहले ही कमजोर हो चुका था। हिडमा के मारे जाने से सेंट्रल कमिटी के 9 मेंबर अब खत्म हो चुके हैं, जिनमें छत्तीसगढ़ में 5 (जनरल सेक्रेटरी बसवराजू शामिल), झारखंड में 2 और आंध्र प्रदेश में 2 का खात्मा हुआ है।
नक्सलियों के लिए कितना बड़ा झटका?
हिडमा का जाना नक्सलवाद के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। वह दंडकारण्य क्षेत्र में नक्सलियों की ताकत का प्रतीक था और उसे उनके बीच किसी नायक की तरह देखा जाता था। उसके बिना पीएलजीए बैटालियन नंबर 1 बिखर सकती है, और युवा काडरों का मनोबल निश्चित तौर पर टूट सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि हिडमा के मारे जाने के बाद अब नक्सलियों में और तेजी से बिखराव हो सकता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिडमा का अंत दंडकारण्य के इलाके में नक्सलवाद के पतन का संकेत है।




