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पूर्व PM मनमोहन सिंह की मौत पर शोक में डूबा पाकिस्तान का ये गांव, जानें क्या था रिश्ता

Edited By: Kajal Kumari @lallkajal Published : Dec 28, 2024 07:44 am IST, Updated : Dec 28, 2024 12:34 pm IST

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के निधन से जहां देश में शोक की लहर है, वहीं पाकिस्तान के गाह गांव के लोग भी उदास हैं। उनका कहना है कि हमारा कोई अपना चला गया। जानिए क्या था उनका रिश्ता?

manmohan singh and pakistan village- India TV Hindi
Image Source : FILE PHOTO मनमोहन सिंह का पाकिस्तान के गाह गांव से रिश्ता

देश के पूर्व प्रधानमत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के निधन से पूरे भारत में शोक की लहर व्याप्त है। वहीं पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के चकवाल जिले के गाह गांव के लोग भी भारत पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के निधन से बेहद दुखी हैं। गांव के लोगों का कहना है कि हमें ऐसा लग रहा है जैसे हमारे परिवार के किसी सदस्य का निधन हो गया है, वह हमारे बीच से चला गया है। गाह गांव के रहने वाले अल्ताफ हुसैन ने ‘पीटीआई-भाषा' को बताया कि स्थानीय लोगों के एक समूह ने गांव के लड़के मनमोहन सिंह के निधन पर दुख व्यक्त करने के लिए शोकसभा की। हुसैन गाह गांव के उसी स्कूल में शिक्षक हैं जहां मनमोहन सिंह ने कक्षा 4 तक पढ़ाई की थी।

क्या है मनमोहन सिंह का गाह गांव से रिश्ता?

बता दें कि मनमोहन सिंह के पिता गुरमुख सिंह कपड़ा व्यापारी थे और उनकी मां अमृत कौर गृहिणी थीं। मनमोहन सिंह का बचपन पाकिस्तान के गाह गांव में ही बीता और उन्हें बचपन में उनके दोस्त ‘मोहना' कहकर बुलाते थे। पाकिस्तान का गाह गांव राजधानी इस्लामाबाद से लगभग 100 किमी दक्षिण पश्चिम में स्थित है और मनमोहन सिंह के जन्म के समय यह झेलम जिले का हिस्सा था लेकिन 1986 में इसे चकवाल जिले में शामिल कर लिया गया था।

गाह गांव के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल से मनमोहन सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की थी। आज भी स्कूल के रजिस्टर में उनकी प्रवेश संख्या 187 है, और प्रवेश की तारीख 17 अप्रैल, 1937 दर्ज है और उनकी जन्मतिथि 4 फरवरी, 1932 और उनकी जाति ‘कोहली' के रूप में दर्ज है।

मनमोहन को लोग ऐसे कर रहे हैं याद

जहां मनमोहन ने शिक्षा ली, गाह गांव के उस स्कूल के शिक्षक  ने कहा, ‘‘डॉ. मनमोहन सिंह अपने जीवनकाल में गाह नहीं आ सके, लेकिन अब जब वह नहीं रहे तो हम चाहते हैं कि उनके परिवार से कोई इस गांव का दौरा करने आए। सिंह के कुछ सहपाठियों का अब निधन हो गया है जिन्होंने 2004 में उनके प्रधानमंत्री बनने के समय खुशी व्यक्त की थी। इन सहपाठियों के परिवार अब भी गाह में रहते हैं और सिंह के साथ अपने पुराने संबंध पर गर्व महसूस करते हैं।

 

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