Monday, January 26, 2026
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UGC के नए नियम पर बवाल, जानिए क्या है 'इक्विटी कमेटी' और बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

यूजीसी के नए नियमों को लेकर बवाल बढ़ता जा रहा है। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने भी इन नियमों के खिलाफ इस्तीफा दे दिया है। इन नियमों के दुरुपयोग का डर भी लोगों को सता रहा है।

Edited By: Niraj Kumar @nirajkavikumar1
Published : Jan 26, 2026 08:08 pm IST, Updated : Jan 26, 2026 08:08 pm IST
UGC- India TV Hindi
Image Source : HTTPS://WWW.UGC.GOV.IN/HOME यूजीसी

नई दिल्ली:  विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर मचे बवाल के बीच बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने इस्तीफा दे दिया है। इसे भेदभाव बढ़ाने वाला नियम बताते हुए लोग सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए हैं। आखिर यूजीसी का नया नियम क्या है और उसे बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

SC, ST के साथ OBC को भी शामिल किया गया

दरअसल, रोहित वेमुला केस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए नियम-कानून बनाने को कहा। इसके बाद UGC ने नियमों में बदलाव किया। इसी महीने UGC ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026 (UGC Promotion of Equity Regulations, 2026) जारी किया है। इसमें ओबीसी को शामिल किया जाना और 'इक्विटी कमेटी'के गठन को लेकर काफी विवाद हो रहा है। इसके पहले ड्राफ्ट में जातिगत भेदभाव से सुरक्षा के दायरे में केवल एससी और एसटी को रखा गया था। लेकिन अब इसमें ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया है। जिसका विरोध हो रहा है। 

सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व का कोई प्रावधान नहीं

नए नियमों के मुताबिक हर कॉलेज/यूनिवर्सिटी में एक 'इक्विटी कमेटी' बनेगी। विवाद इस बात को लेकर है कि इस कमेटी में एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों का होना अनिवार्य है, लेकिन सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व का कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है। 

ओबीसी के साथ अनुचित व्यवहार भी भेदभाव माना जाएगा

नए नियमों के तहत एससी, एसटी और ओबीसी सदस्यों के साथ होने वाले किसी भी अनुचित व्यवहार को भेदभाव माना जाएगा। संस्थान के प्रमुख की अध्यक्षत में एक्विटी कमेटी भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी। साथ ही शिकायत मिलने के 24 घंटे अंदर एक्शन लेना होगा और 15 दिनों के अंदर रिपोर्ट देनी होगी। संस्थानों को 24/7 हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत प्रणाली शुरू करनी होगी। यह भी प्रावधान है कि नियमों का पालन नहीं करने पर यूनिवर्सिटी की डिग्री देने की शक्ति छीनी जा सकती है या अनुदान को रोका जा सकता है।

विरोध करने वालों का क्या है तर्क?

विरोध करने वालों का तर्क है कि 'इक्विटी कमेटी' में सामान्य वर्ग का सदस्य नहीं होने से जांच निष्पक्ष नहीं हो सकेगी। साथी ही यह डर भी जताया जा रहा है कि इन नियमो का दुरुपयोग झूठी शिकायतों के द्वारा किया जा सकता है। क्योंकि इसमें झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ सजा का प्रावधान हटा दिया गया है। 

बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षा में ओबीसी छात्रों को भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए उन्हें सुरक्षा देना जरूरी है। बता दें कि इस संबंध में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली शिक्षा संबंधी संसदीय समिति ने सिफारिश की थी। उसी सिफारिश के आधार पर ओबीसी को भी इस दायरे में लाया गया है।

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