Bangladesh Elections Impact On South Asia: बांग्लादेश में शेख हसीना को सत्ता से बेदखल किए जाने के बाद पहले राष्ट्रीय चुनाव के लिए प्रचार अभियान शुरू हो चुका है। प्रमुख राजनीतिक दल 12 फरवरी को होने वाले चुनाव से पहले ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे हैं। इस चुनाव को बांग्लादेश के इतिहास में सबसे अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद अंतरिम सरकार के तहत कराया जा रहा है और इसमें मतदाता प्रस्तावित राजनीतिक सुधारों पर भी फैसला करेंगे। बांग्लादेश दक्षिण एशिया का एक मुस्लिम बहुल देश है, जिसकी राजनीतिक स्थिरता का असर केवल उसके पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे रीजन में दिखाई देता है। तो चलिए इसे विस्तार से समझते हैं।
अवामी लीग के बिना बांग्लादेश की चुनावी दिशा
बांग्लादेश की राजनीति मुख्य रूप से दो प्रमुख दलों अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। अवामी लीग अपेक्षाकृत धर्मनिरपेक्ष और भारत-समर्थक मानी जाती है, जबकि BNP पर अक्सर इस्लामी समूहों और पाकिस्तान के करीब होने के आरोप लगते रहे हैं। चुनावों के दौरान यह वैचारिक संघर्ष और तेज हो जाता है, जिसका असर देश की विदेश नीति पर भी पड़ता है। अब जबकि, अवामी लीग लीग के चुनाव लड़ने पर बैन लगा है तो जाहिर है कि चुनाव के बाद इसका प्रभाव इस पूरे क्षेत्र में नजर भी आएगा।
बांग्लादेश के चुनाव पर कई देशों की है नजर
भारत, चीन, पाकिस्तान और म्यांमार जैसे देशों की नजर बांग्लादेश के चुनावी नतीजों पर टिकी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता या अस्थिरता पूरे क्षेत्र की दिशा तय कर सकती है। चुनाव से पहले शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग और मानवाधिकार संगठनों ने निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। अवामी लीग का आरोप है कि सरकारी तंत्र का दुरुपयोग हो रहा है और चुनाव आयोग पूरी तरह स्वतंत्र नहीं रहा।
चुनाव के बाद ये है सबसे बड़ी चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार, बांग्लादेश के लिए सबसे बड़ी चुनौती चुनाव के बाद राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है। यदि चुनाव परिणाम सभी पक्षों को स्वीकार्य होते हैं, तो देश में शांति बनी रह सकती है। लेकिन, यदि विरोध-प्रदर्शन और हिंसा बढ़ती है, तो इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द पर पड़ेगा।

भारत के लिए क्यों अहम हैं बांग्लादेश के चुनाव
भारत और बांग्लादेश के संबंध फिलहाल सामान्य नहीं हैं। दोनों देशों के बीच लंबी सीमा है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा भी काफी हद तक बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिरता पर निर्भर करती है। चुनावों के बाद बनने वाली सरकार का रुख सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर असर डालता है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश में अस्थिर सरकार के समय अवैध घुसपैठ, तस्करी और आतंकी गतिविधियों का खतरा बढ़ जाता है। भारत चाहता है कि बांग्लादेश की सरकार कट्टरपंथी संगठनों के खिलाफ सख्त रुख अपनाए लेकिन फिलहाल ऐसा होता दिख नहीं रहा है।
पाकिस्तान की कठपुतली बना बांग्लादेश
बांग्लादेश की राजनीति में पाकिस्तान का नाम समय-समय पर चर्चा में रहता है। कुछ इस्लामिक और कट्टरपंथी संगठन पाकिस्तान समर्थक माने जाते हैं। यदि चुनावों के बाद ऐसी ताकतें मजबूत होती हैं, तो भारत-विरोधी राजनीति को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे दक्षिण एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका है। फिलहाल, बांग्लादेश में जिस तरह के हालात हैं उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि बांग्लादेश मौजूदा समय में पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली बना हुआ है और भारत विरोध में किसी भी हद तक जा सकता है।
चीन का बढ़ता प्रभाव और रोहिंग्या समस्या
चीन बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है, खासकर बंदरगाह, सड़क और ऊर्जा परियोजनाओं में। चुनावों के बाद बनने वाली सरकार का चीन के प्रति झुकाव क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है। भारत और अन्य पड़ोसी देश इसे रणनीतिक चुनौती के रूप में देखते हैं। इतना ही नहीं बांग्लादेश में चुनावों का असर रोहिंग्या शरणार्थी संकट पर भी पड़ता है। म्यांमार से आए लाखों रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश में रह रहे हैं। राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में इस संकट के समाधान की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है, जिसका प्रभाव पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और मानवीय स्थिति पर पड़ता है।
दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था पर असर
बांग्लादेश दक्षिण एशिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल था लेकिन हसीना की सरकार जाने के बाद वहीं हालात बिगड़े हैं। अब अगर चुनाव के बाद स्थिर सरकार बनती है तो इसका असर व्यापार और निवेश पर जरूर पड़डेगा। भारत, नेपाल, भूटान और श्रीलंका जैसे देशों के साथ बांग्लादेश आर्थिक सहयोग कैसे बढ़ाएगा यह नई सरकार को तय करना होगा। अब ऐसे में अगर राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है या फिर देश में हिंसा होती है तो खामियाजा यहां के लोगों तो ही भुगतना पड़ेगा।

बांग्लादेश के खुद तय करना होगा भविष्य
अमेरिका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन बांग्लादेश के चुनावों पर करीबी नजर रखते हैं। लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण चुनाव होने पर बांग्लादेश की वैश्विक छवि मजबूत होती है। इसके विपरीत, विवादित चुनावों की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों की आशंका बनी रहती है। यदि देश में राजनीतिक स्थिरता रहती है, तो क्षेत्रीय मंचों पर सहयोग को नई गति मिल सकती है। लेकिन भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच बांग्लादेश की भूमिका तय करेगी कि वह भविष्य में खुद के कहां देखना चाहता है।
बांग्लादेश के चुनाव से मिलेंगे बड़े संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश के चुनाव दक्षिण एशिया के लिए एक संकेत की तरह हैं। इससे यह तय होता है कि क्षेत्र लोकतांत्रिक मूल्यों, विकास और सहयोग की ओर बढ़ेगा या अस्थिरता और टकराव की ओर। कुल मिलाकर, बांग्लादेश में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि उनका असर पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव क्षेत्र में स्थिरता और सहयोग को मजबूती दे सकते हैं, जबकि विवाद और अस्थिरता नए संकटों को जन्म दे सकती है।
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