India-EU Free Trade Agreement: 26 जनवरी… गणतंत्र दिवस का मंच, और पर्दे के पीछे चला जाएगा दुनिया का सबसे बड़ा जियो-इकोनॉमिक दांव? सवाल है कि क्या भारत-यूरोप के बीच होने जा रहा Free Trade Agreement महज एक कारोबारी समझौता है, या फिर यह अमेरिका-चीन समेत पूरी दुनिया के लिए कड़ा रणनीतिक संदेश भी है? यूरोप, आज भारत को उम्मीद की नजरों से क्यों देख रहा है? ट्रंप, रूस, NATO, ग्रीनलैंड, यूरोप की असुरक्षा और भारत की Sovereign Autonomy— इन सभी मुद्दों पर 6 देशों में राजनयिक रह चुके दीपक वोहरा ने INDIA TV से एक्सक्लूसिव बातचीत की, जिसमें उन्होंने बताया कि बदलती ग्लोबल पॉलिटिक्स में भारत क्यों अब डील-मेकर बन चुका है। अतीत के किस्सों से आज की कड़वी सच्चाइयों तक यह खास बातचीत महज इंटरव्यू नहीं, बल्कि आने वाले वर्ल्ड ऑर्डर की झलक है। पढ़ें दीपक वोहरा का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू।
सवाल- 26 जनवरी को रिपब्लिक डे पर यूरोप के साथ भारत की फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की डील साइन हो सकती है? क्या यह महज एक समझौता होगा या दुनिया को एक कड़ा संदेश? क्योंकि अमेरिका भी कब से भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट करना चाहता है लेकिन उसके बजाय हमारा यूरोप के साथ ये एग्रीमेंट पहले हो रहा है।
जवाब- पूर्व राजनयिक दीपक वोहरा ने कहा कि जब मैं विदेश मंत्रालय में था, 1980 के दशक में, तो उस समय यूरोप का वीजा मिलना भारतवासियों के लिए, यहां तक कि हमारे जैसे डिप्लोमेट्स के लिए भी बड़ा मुश्किल होता था। वो सोचते थे कि उस समय जो 100-110 करोड़ भारतवासी हैं, सब यूरोप में जाकर बस जाना चाहते हैं। उनकी ऐंठ मैंने देखी थी। लेकिन वक्त के साथ हल्के-हल्के उनकी ताकत खत्म हो गई, पैसा खत्म हो गया, लेकिन अकड़ अभी तक बाकी है। एक जमाना था जब दुनिया के 40 या 50 प्रतिशत इलाके पर यूरोप का राज था। लेकिन अब चीजें बदल गई हैं।
उन्होंने कहा, 'ये फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की जो हम बात कर रहे हैं। हम इसे 20 साल से नेगोशिएट कर रहे थे। अभी हाल ही में यूरोपियन यूनियन ने Mercosur, जो साउथ अमेरिका का ब्लॉक है- जिसमें ब्राजील, अर्जेंटीना, पैराग्वे और उरुग्वे हैं, उनके साथ एक डील साइन की है। अब वो इसे हमारे साथ साइन करना चाहते हैं।'
पूर्व राजनयिक ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल है कि हमारे साथ क्यों साइन करना चाहते हैं? क्योंकि चीन, उनको भाव नहीं दे रहा है। अमेरिका उनसे कुछ खरीदेगा नहीं। रूस का दरवाजा उन्होंने खुद बंद कर दिया है। अब बचा कौन सिर्फ भारत। खरीदने की ताकत किसके पास है? हमारे पास है। तो वो हमारे पास आ रहे हैं अपना सामान बेचने के लिए। हम इस पर टैरिफ हटा देंगे। और बदले में कुछ चीजें करेंगे।
दीपक वोहरा ने कहा, 'मैंने जो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स देखे हैं- हमने ASEAN के साथ किया है, UAE के साथ किया है- चाहे उसको कम्प्रेहेंसिव एग्रीमेंट कहें या फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, हम हमेशा दोनों तरफ का फायदा देखते हैं। अब हमारे पास तजुर्बा है। आसियान के साथ जो हमने किया, उसमें ज्यादा फायदा उनको हो रहा है, हमको इतना फायदा नहीं हुआ, तो हम उसका Review करते रहते हैं। हो सकता है कि हम उसे रिन्यू न करें जब तक उसमें कोई परिवर्तन नहीं आता। तो यूरोप के साथ जो हम एफटीए कर रहे हैं, अभी देखेंगे कि इसका परिणाम क्या होता है।'
रही बात ट्रंप की, तो यूरोप से जब हमने बातचीत शुरू की थी तो डोनाल्ड ट्रंप तो राजनीतिक रूप से पैदा भी नहीं हुए थे। तो उनका इससे कोई लेना-देना नहीं है। हां, यूरोप अब बड़ा सतर्क हो गया है कि डोनाल्ड ट्रंप तो ग्रीनलैंड को हड़प करना चाहता है और उनकी परवाह नहीं करते।
उन्होंने कहा, 'मैं आपको एक किस्सा बताता हूं। मेरी पहली पोस्टिंग फ्रांस में थी, 1970 के दशक में। वहां मैं पढ़ा भी हूं, मैं फ्रेंच फर्राटेदार बोलता हूं। वहां एक मजेदार चीज होती थी। मैं देखता था कि वहां पार्टियां खूब चलती थीं। रोज रात को लोग बार में बैठकर शराब पीते थे। मैंने उनसे कहा कि सोवियत संघ आपके पड़ोस में है, आपको डर नहीं लगता उनसे? तब उनका जवाब था, 'किस बात का डर? अगर वो हम पर हमला करेंगे, तो अमेरिका आकर बचा लेगा।' ये उनकी मानसिकता थी कि वो अमेरिका समंदर के उस पार बैठा है, उसे बुलाएंगे जैसे दूसरे विश्व युद्ध में किया था। लेकिन अब, वो अमेरिका कहता है कि मैं नहीं आऊंगा। मैं देखता हूं आप लोग कैसे अपने आप को बचाते हो। या तो फिर अपना बजट बढ़ाओ।'
दीपक वोहरा ने कहा कि अब ये यूरोपियन कमीशन की जो प्रेसिडेंट हैं, वो कहती हैं कि हम 800 बिलियन और 900 बिलियन इकट्ठा कर रहे हैं। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि ओवरनाइट डिफेंस इंडस्ट्री नहीं बनती है। अगर किसी के पास डिफेंस इंडस्ट्री है यूरोप में, तो वो एक फ्रांस के पास है। जबकि फ्रांस का कोई दुश्मन नहीं है। लेकिन वो पश्चिम अफ्रीका में और भारत को भी हथियार देता है, चीन को भी देता रहता था। वो तो हमेशा दुश्मन ढूंढता रहता है कि भाई किस इलाके में जंग हो रहा है, ताकि जाकर हथियार बेचें। जैसा किसी ने कहा था, 'It's a nation of shopkeepers' यानी कि यह दुकानदारों का देश है। वो तो बस धंधे की बात करते हैं।
पूर्व राजनयिक ने कहा, 'फिर इंग्लैंड के पास थोड़ा बहुत था लेकिन फौज उनकी नहीं है। तो ये कहना कि मैं 800-900 बिलियन इकट्ठे कर रही हूं और कल दुनिया की सबसे शक्तिशाली फोर्स बन जाऊंगी, यह ठीक नहीं है। डिफेंस इंडस्ट्री बनाने में वक्त लगता है। हमें मालूम है, हम कब से 'आत्मनिर्भर भारत' में लगे हुए हैं। अब हम इस लेवल पर पहुंचे हैं कि हमारे तीन चौथाई हथियार भारत में बने हुए हैं और 100 से ज्यादा देश हमसे खरीदते हैं। इसलिए, इसमें टाइम लगेगा। ये मेहमान आएंगे, हम इनका सम्मान करेंगे, भोजन खिलाएंगे, मीठी बातें करेंगे, मेरे जैसे डिप्लोमेट्स 'ब्रिलियंट आइडियाज' देंगे। लेकिन अंग्रेजी की कहावत है- Proof Of The Pudding Is In The Eating. यानी कि खाने के बाद ही स्वाद का पता चलता है।'
सवाल- चूंकि भारत पहले ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूएई समेत कई देशों से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट कर चुका है, लेकिन यूरोपियन यूनियन के साथ इस ट्रेड डील को हमारे कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहा है? हमारे दर्शकों को आसान भाषा में समझाइए उन्होंने ऐसा क्यों कहा?
जवाब- दीपक वोहरा ने कहा कि 'मदर ऑफ ऑल डील्स' इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि हम एक ही साथ 27 देशों के संगठन यानी यूरोपियन यूनियन के साथ डील साइन करेंगे। लेकिन मैं आपको स्पष्ट बता दूं कि यूरोपियन यूनियन के साथ व्यापार या डिप्लोमेसी करना आसान नहीं है। जो लोग बहुत उत्साहित हैं, उन्हें समझना चाहिए कि एक तरफ आप फ्रांस, जर्मनी या स्वीडन से बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ आप 'ब्रसेल्स' से बात कर रहे हैं। मेरे जितने मित्र वहां राजदूत रहे हैं, वो कहते हैं कि ब्रसेल्स से डील बहुत मुश्किल होती है। वो हमेशा अपना फायदा देखते हैं।
उन्होंने कहा, 'यूरोप के पास बेचने को है क्या? बहुत कम चीजें। वाइन खरीद लीजिए, गाड़ियां खरीद लीजिए... और तो कुछ है नहीं जो मुझे चाहिए। मोबाइल फोन भारत खुद बनाता है, भारत में बिकने वाले 99 प्रतिशत मोबाइल यहीं बनते हैं। सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ट्रेनें, सब हम खुद बनाते हैं। जल्द ही दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेन भारत में चलेगी।'
पूर्व राजनयिक ने कहा कि एक जमाना वो था, जब मैं बचपन में अपने फादर के साथ भाखड़ा नांगल डैम गया था। फादर इंजीनियर थे। मैंने वहां के लोगों से पूछा कि आपको कैसे मालूम कि इतनी बड़ी दीवार गिर नहीं जाएगी? तब उन्होंने जवाब दिया, 'बेटा, कोई गोरा आकर बना गया था, कैसे गिरेगी? वो बड़ा मजबूत काम करते हैं।'
दीपक वोहरा ने कहा कि लेकिन आज कहां आपको गोरे नजर आते हैं भारत के अंदर? ये परिवर्तन आ रहा है। तो अगर ये यूरोपियन यूनियन वाले या न्यूजीलैंड वाले सोचते हैं कि अब तो सारा भारत हमने कैप्चर कर लिया, मार्केट कैप्टिव हो गया तो मैं कहूंगा कि दोबारा सोचिए। भारत और शक्तिशाली और आत्मनिर्भर होगा, इन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स की चमक कम हो जाएगी।
सवाल- फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों, जर्मनी के चांसलर और इटली की प्रधानमंत्री खुलेआम रूस से सीधी बातचीत की वकालत कर चुके हैं, ऐसे में भारत जो दोनों का दोस्त है, क्या इस नई दोस्ती का आर्किटेक्ट बनेगा?
जवाब- उन्होंने कहा कि नहीं, मध्यस्थता तब होती है जब दोनों पक्ष तैयार हों। यूरोप जो मर्जी कहे, वहां Russophobia बहुत है। वो रूस से डरते हैं। ये डर 18वीं-19वीं शताब्दी से है। उन्हें लगता है रशियन आकर हमें हड़प लेंगे। बड़ी मजेदार बात सुनिए। NATO में अगर अमेरिका को निकाल दें, तो 65 करोड़ की आबादी बचती है। ये 65 करोड़ नाटो वाले, 35 करोड़ अमेरिकियों से कहते हैं कि हमें 15 करोड़ रूसियों से बचाओ। मैं पूछता हूं कि आपकी लड़ने की क्षमता कहां है?
दीपक वोहरा ने कहा कि अब जो ये कह रहे हैं कि हम अमेरिका के बिना बात करेंगे। अभी जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर धमकी दी और कहा था कि अगर फौज नहीं हटाई तो 10 प्रतिशत टैरिफ लगा दूंगा, तो जर्मनी ने अपने 15 सिपाहियों को तुरंत वापस बुलाने का सोचा कि वापस आ जाओ, वरना ट्रंप तो हमें खत्म कर देगा। हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और होते हैं। यूरोप, अमेरिका के बिना कुछ नहीं कर सकता। भारत की बात करें तो हम यूरोप से भी डील करेंगे, रूस से भी, अमेरिका से भी, चीन से भी और साउथ अफ्रीका से भी। हम इसे कहते हैं 'Sovereign Autonomy' हम वही करेंगे जो हमारे हित में है।
पूर्व राजनयिक ने कहा कि और एक बात, शायद कुछ लोग नाराज हो जाएं, लेकिन मैं ट्रंप और पीएम नरेंद्र मोदी के बीच समानता देखता हूं। दोनों अपने देश पर कुर्बान होने को तैयार हैं। दोनों चाहते हैं कि देश तेज गति से आगे बढ़े। दोनों की अपने ही देश में मुखालफत हो रही है।
उन्होंने कहा, 'ट्रंप का दिमाग 1991 में है जब सोवियत संघ टूटा था। मेरे प्रोफेसर Francis Fukuyama ने The End of History and the Last Man लिखी थी कि अमेरिका जीत गया। एक सीनेटर ने कहा था कि दुनिया में जब इमरजेंसी होती है तो लोग वाशिंगटन को फोन करते हैं। लेकिन 9/11 और 26/11 के बाद वो समझ गए कि दुनिया का अकेला सुपरपावर होना आसान नहीं है। आज लोग मल्टी-पोलर वर्ल्ड की बात करते हैं। मैं कहता हूं, खंभा तो एक ही है- अमेरिका। बाकी सब बातें हैं। अगर पेरू या नाइजीरिया नाराज होता है, तो क्या वो मेरे पास आएगा? या रूस-चीन के पास जाएगा? नहीं।'
सवाल- वेनेजुएला में एक्शन के बाद, उनके राष्ट्रपति मादुरो को उठाने के बाद ट्रंप ने ग्रीनलैंड खरीदने की बात ऐसे की जैसे वो कोई 'फार्महाउस' खरीद रहे हों। क्या यह यूरोप के स्वाभिमान पर सीधी चोट नहीं है? क्या इसी बेइज्जती ने यूरोप को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अमेरिका अब हमारा सगा नहीं रहा, चलो नए दोस्त बनाते हैं। और भारत इसके लिए कैसे सबसे भरोसेमंद है क्योंकि इतिहास गवाह है कि हमने कभी किसी दूसरे की जमीन को मैली आंख से नहीं देखा।
जवाब- दीपक वोहरा ने कहा कि सवाल ही नहीं पैदा होता। यूरोप के पास है क्या? कहां फौज भेजेंगे लड़ने के लिए? यूक्रेन के बारे में बस ऐसे ही बात करते हैं, हथियार देते हैं लेकिन लड़ने कोई नहीं गया। फ्रांस हो, ब्रिटेन हो या जर्मनी, आपस में ये एक-दूसरे से कहते हैं पहले आप हमला करें रूस पर, क्योंकि पहले भिड़े कौन।
उन्होंने कहा, 'तो मेरा अपना मानना है कि अखबारों में, मीडिया में, विकिपीडिया पर, चैट जीपीटी पर आप जो मर्जी पढ़ें या प्रोड्यूस करें वहां से, सच्चाई ये है कि अमेरिका का सामना बहुत समय के लिए कोई नहीं कर सकता। उसकी बहुत ताकत है, 30 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी है। चीन की हालत खराब है। वो बात बहुत करते हैं - मेरे पास ये है, वो है। और फिर हमारी ताकत उभर रही है लेकिन अभी हम वहां तक नहीं पहुंचे जहां हम डायरेक्ट टक्कर दे सकते हैं अमेरिका को।'
सवाल- तो इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से भारत का क्या फायदा होगा? यहां की कंपनियों को क्या मिलेगा? और आम हिंदुस्तानियों को क्या फायदा होगा?
जवाब- दीपक वोहरा ने कहा कि देखिए, यूरोप बूढ़ा हो गया है। उनकी फैक्ट्रियां चलाने के लिए उनके पास लोग नहीं हैं। वो मुस्लिम देशों और चीन से लोगों को लेना नहीं चाहते। अब बचा भारत, जिसके पास 'ह्यूमन रिसोर्स' है। पहले वो हमारे लोगों को आने नहीं देते थे, लेकिन अब समझ गए हैं कि अगर फैक्ट्रियां चलानी हैं तो भारत की जवानी की जरूरत है। भारत की औसत उम्र 29 साल है, यूरोप की 45 साल। वे बुड्ढे हो रहे हैं।
उन्होंने कहा, 'इस एग्रीमेंट से हमारे लोग वहां जाएंगे, टेक्नोलॉजी और इन्वेस्टमेंट यहां आएगा। लेकिन खतरा भी है। चीनी कंपनियां बहुत चालाक हैं। वो यूरोप में फैक्ट्री लगाकर अपना माल भारत भेज सकती हैं, जैसा उन्होंने अफ्रीका में किया था ताकि अमेरिका में ड्यूटी-फ्री माल बेच सकें। हमें 'सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन' को लेकर बहुत सतर्क रहना पड़ेगा। वैसे, इस डील से दोनों को फायदा होगा, लेकिन 19-20 का ही फर्क रहेगा।'
सवाल- सर, यूरोप अपनी सुरक्षा को लेकर डरा हुआ है। वो न रूस पर भरोसा कर पा रहा है, ना ट्रंप पर। तो क्या भारत उनका भरोसेमंद साथी बनकर उन्हें सुरक्षा दे सकता है? क्या हम एक नया ब्लॉक बना सकते हैं?
जवाब- दीपक वोहरा ने कहा कि सुरक्षा का मतलब क्या होता है? हथियार तो उनके पास हैं। सिपाही हम भेजेंगे नहीं। पहले विश्व युद्ध में हम गुलाम थे, हमारे लोग तब लड़ने गए। दूसरे विश्व युद्ध में 25 लाख भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए गए। ब्रिटेन ने वादा किया था कि जंग के बाद आजादी देंगे। जंग खत्म हुई तो बोले, 'हमने कुछ कहा था? हमें तो याद ही नहीं।' हमें धोखा मिला। आजादी 1947 में मिली, लेकिन असली आजादी तब मिली जब हमारा मन आजाद हुआ। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था, 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।' वो मेरे हीरो हैं।
उन्होंने कहा, 'हम अब किसी की रक्षा के लिए अपने सिपाही नहीं भेजेंगे। हम सिर्फ 'शांति दूत' बनकर जाते हैं। अगर रूस-यूरोप में जंग हुई तो सब खत्म हो जाएगा, किसी पीस कीपर की जरूरत नहीं पड़ेगी। चीन जानता है कि भारत आसानी से दबेगा नहीं। '120 बहादुर' रेजांग ला की लड़ाई याद है? 120 अहीर जवानों ने 2 हजार चीनियों को ऊपर भेज दिया था, Till The Last Man, Last Bullet.'
रही बात संयुक्त राष्ट्र की, तो वो इतिहास के कूड़ेदान में जाने लायक है। उनके सेक्रेटरी जनरल बस इतना कहते हैं, 'मुझे बहुत फिक्र है' और सो जाते हैं। वो न यूक्रेन में कुछ कर पाए, न गाजा में। अमेरिका की 'Forever Wars' की नीति भी बदलेगी। अब एक नया सिस्टम आएगा जहां भारत और अमेरिका मिलकर शांति तय करेंगे।