नई दिल्ली: 10 दिसंबर को International Human Rights Day के मौके पर जब हम मानवाधिकारों का जिक्र करते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में बड़ी-बड़ी बातें आती हैं- उत्पीड़न, भेदभाव और सामाजिक अन्याय। लेकिन सच यह है कि Human Rights का सबसे बड़ा इम्तिहान हमारे रोजमर्रा के जीवन में छुपा होता है। सड़क पर चलते वक्त, लोन के पैसे भरते हुए और पुलिस से जुड़े मामलों जैसी छोटी-छोटी बातें, जिनमें हमें पता भी नहीं चलता कि कब हमारे मानवाधिकारों का हनन हो गया। ऐसे ही सवाल हमने सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने एडवोकेट संदीप मिश्रा के सामने रखे, जिसने हमारे नागरिक अधिकारों, संविधान की ताकत, पुलिस की सीमाओं और सोशल मीडिया के बढ़ते असर पर एक गहरी, आंखें खोल देने वाली चर्चा का रास्ता खोल दिया। Human Rights केवल किताबी बात नहीं, वह हर नागरिक की गरिमा, स्वतंत्रता और सुरक्षा की पहली ढाल है। और इसी ढाल के बारे में जानने के लिए हमने एडवोकेट संदीप मिश्रा से टेलीफोन पर एक्सक्लूसिव बातचीत की। पढ़िए भारत में रहने वाले नागरिकों के मानवाधिकारों पर पूरी बातचीत।
जवाब- सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट संदीप मिश्रा ने कहा कि सबसे पहले तो मैं आपको बता दूं कि देश में मानवाधिकारों को लेकर जो सेटअप है, जो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बना हुआ है, वह उन्हीं अधिकारों की रक्षा करता है जो हमारे संविधान में दिए गए हैं। जिसको हम Equality Before Law, Fraternity, Dignity of Individual और Liberty to life कहते हैं, इन सबकी गारंटी हमारे संविधान में दी गई है। मानवाधिकारों की जो हम बात करते हैं वह हमारे संविधान में पहले से ही वर्णित हैं। अगर कोई पुलिस वाला गाड़ी रोकता है तो आपका रुकना तो एक सभ्य नागरिक होने के नाते जिम्मेदारी बनती है। लेकिन जिस तरह की बात आपने बताई, उस तरह की अनुमति उन्हें नहीं है। और प्रॉपर चेकिंग पुलिसकर्मी अपने उच्चाधिकारियों को सूचना देकर और बोर्ड लगाकर ही कर सकते हैं। इस तरह से नहीं कि आप कहीं भी चेकिंग करने लगे। लेकिन जो चाभी निकालने की बात आपने कही, वह मानवाधिकारों का हनन है और साथ में इसे मनमानापन भी कहा जाएगा। ये आर्टिकल 14 का हनन है जिसे कहीं से भी कानून का संरक्षण प्राप्त नहीं है। आज की तारीख में आपके हाथ में सबसे बड़ा हथियार सोशल मीडिया है। इसमें भी खास है सोशल मीडिया प्लेटफार्म ''एक्स''। सभी बड़े पुलिस अधिकारियों के आधिकारिक अकाउंट आपको वहां मिल जाएंगे। अगर आपके साथ ऐसा कुछ होता है तो आप सबसे पहले वहां की फोटो खींचिए। फिर उसे संबंधित बड़े अधिकारी को टैग करके पोस्ट करिए। साथ में लोकेशन लिखना ना भूलें। ऐसा देखने में आया है कि कई बार 112 हेल्पलाइन नंबर से भी तेज कार्रवाई एक्स हैंडल के माध्यम से हो जाती है क्योंकि सभी बड़े अधिकारियों की उसके जरिए मॉनिटरिंग होती है। इसके बाद आपको तुरंत 112 पर कॉल लगाना चाहिए। पुलिस अधिकारी के मनमानेपन पर रोक लगाने के लिए़ आपको पुलिस के ही सिस्टम यानी 112 का इस्तेमाल करना चाहिए। उसपर बताना चाहिए कि मेरे साथ ऐसा-ऐसा हो रहा है, मेरी गाड़ी छीन ली गई है। पुलिस के कुछ अधिकारी हैं। अगर वे पुलिस अधिकारी प्रॉपर यूनिफॉर्म में नहीं हैं, अगर उनकी ड्रेस में कोई कमी है या उनके आईकार्ड आदि विजिबल नहीं हैं तो इन सब चीजों की रिपोर्टिंग भी आप 112 नंबर पर करें। इन सब बातों को 112 पर जरूर बताएं। ऐसे मामलों में आप 2 चीजों का ध्यान रखें। एक्स पर जरूर पोस्ट करें अधिकारी को टैग करके और 112 नंबर पर कॉल करें।
जवाब- उसके बाद तो आपके पास सिर्फ एक ही उपाय बचता है कि लिखित में सूचना दें, जिसमें पुलिस कमिश्नर, असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस, डीसीपी, और जहां कमिश्नरेट सिस्टम नहीं है, वहां सीधे पुलिस अधीक्षक या थाना अध्यक्ष को पत्र लिखें। इसके 2 से 3 दिन के बाद अपने एडवोकेट से संपर्क करें और उनके माध्यम से अदालत में शिकायत करवाएं। इससे बेहतर और कुछ हो नहीं सकता क्योंकि जैसे ही मामला अदालत में चला जाता है तो पुलिस को उस मामले में कार्यवाही त्वरित गति से करनी ही पड़ती है।
जवाब- संदीप मिश्रा ने कहा कि अब भारत में जितने भी 112 नंबर के कंट्रोल रूम हैं वह सभी डिजिटल हैं। मैंने खुद ऐसे कई मामलों में थाने के बाहर खड़े होकर पीड़ित से कॉल करवाया है। ऐसे किसी व्यक्ति को जिसे बैठा लिया गया है, जिसका कोई रोल नहीं है। इसके लिए फिर वही प्रोसेस यूज करना पड़ेगा। आप 112 पर फोन लगाइए और बताइए कि जो व्यक्ति पुलिस का सहयोग करने के लिए थाने गया हुआ था, उसे वहां जबरिया बैठा लिया गया है। और इस तरह के शब्द जब आप बोलेंगे कि जबरिया बैठा लिया गया है तो इसपर अगले अधिकारी को जवाब देना पड़ेगा कि हां, हमने बैठाया तो है लेकिन जबरिया नहीं बैठाया है। या जिसको थाने में बैठाया गया है, उसका रोल क्या है, ये अधिकारी को एक्सप्लेन करना पड़ेगा। 112 पर कॉल करते समय, अपने शब्दों के चयन का खास ख्याल रखना है। आपने सुना होगा कि पुलिस वाले 2 शब्दों पर बहुत ज्यादा जोर देते हैं। अगर आपका मोबाइल गायब हो जाए या चोरी हो जाए तो शिकायत दर्ज करते वक्त वह कहते हैं कि आपका मोबाइल गायब हो गया। वह चोरी शब्द नहीं लिखवाते हैं। क्योंकि ''गायब'' शब्द से यह प्रतीत होता है कि आपको पता नहीं है कि चोरी हुआ है या आप उसे कहीं भूल गए हैं। लेकिन जब शिकायत में आप चोरी लिखते हो तो उससे यह संदेश जाता है कि क्राइम हुआ है। आपकी Negligence नहीं है बल्कि किसी ने आपकी पॉकेट से मोबाइल निकाल लिया है। जब शिकायत में गायब लिखा जाएगा तो पुलिस को कोई कार्रवाई नहीं करनी पडे़गी। लेकिन जब चोरी लिखवाएंगे तो उन्हें कार्रवाई करनी पड़ेगी। और पुलिस अपनी कार्रवाई करने से भागना चाहती है। ये सीधी सी बात है। पुलिस नहीं चाहती है कि थाने में एक और फाइल बढ़े।
जो सवाल आपने पूछा, उसमें भी सबसे बड़ा उपाय ये है कि जैसे ही आपके घर के किसी सदस्य को थाने में बैठा लिया जाए आप सोशल मीडिया का सहारा लीजिए। सोशल मीडिया आज आमजन तक पहुंच चुका है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया पर आपको देसी भाषाएं भी मिली हुई हैं, चाहे वो तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम ही क्यों ना हो। एक वक्त था जब एक्स पर सिर्फ एलीट क्लास ही लिखता था। अब एक्स पर कोई भी अपनी बात लिख सकता है। और आपके लिखने पर कार्रवाई होनी ही है। जब भी आपके साथ कुछ गलत होता है, आप जितनी जल्दी उसको पब्लिक डोमेन में और अधिकारियों के नॉलेज में ला देते हैं, उतनी जल्दी ही उसपर कार्रवाई शुरू हो जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि जो चीज आप सोशल मीडिया पर डाल देते हैं उसे पीछे नहीं किया जा सकता है। जैसे अंग्रेजी में कहावत है- No one set the clock back. इसका मतलब है कि कोई घड़ी को पीछे नहीं कर सकता है। जब आप इन सूचनाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर डाल देते हैं और अधिकारियों को उसमें शामिल कर देते हैं तो उन अधिकारियों की जिम्मेदारी हो जाती है कि आपकी सुरक्षा के लिए वह कदम उठाएं।
जवाब- सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट संदीप मिश्रा ने कहा कि मानवाधिकार दिवस की बात हो रही है तो मैं आपको थोड़ा अंतर भी बताता हूं कि किस लेवल के अधिकारी को कब टैग करना है। अगर Human Rights के Gross Violation का केस है, मानवाधिकारों के हनन का कोई गंभीर मामला है तो ऐसे में आप मुख्यमंत्री कार्यालय को टैग करिए, डीजीपी को टैग करिए, और उस जिले के Concern पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी दोनों को जरूर टैग करें। लेकिन जहां पर छोटा मामला है, जैसे- ट्रैफिक पुलिस का मामला है या कहीं कोई बात नहीं सुनी जा रही है तो बहुत होगा तो आप एसीपी, डीसीपी, या हद से हद पुलिस अधीक्षक को टैग करिए। इससे आपके मामले में कार्रवाई हो जाएगी। चूंकि जिलाधिकारी पूरे जिले का सर्वेसर्वा होता है तो आप उसे भी टैग कर सकते हैं। लेकिन इन मामलों में मुख्यमंत्री कार्यालय या अन्य बड़े अधिकारियों को टैग करना, मुझे नहीं लगता बहुत Fruitful होगा।
जवाब- संदीप मिश्रा ने कहा कि सबसे पहली बात है कि सभी को Due Process फॉलो करना पड़ता है, चाहे आप कॉर्पोरेट बैंक हों या फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन हों, जो रिकवरी एजेंट हैं वो पूरी तरह से अवैध हैं। यह इलीगल तरीका है। कानून में इसकी कोई मान्यता नहीं है कि बैंक 4 बाउंसर्स को हायर करे, फिर उन्हें किसी के पास बैंक के पैसे रिवकर करने के लिए भेजे या उनके जरिए किसी तरह की बात रखे। अगर आपने बैंक के पैसे में डिफॉल्ट किया है तो बैंक की जिम्मेदारी है कि वह आपसे पत्राचार करे। या फिर बैंक के किसी Authorized अफसर को भेज करके आपसे पैसे की डिमांड करे। सिविल प्रक्रिया संहिता में इस तरह की व्यवस्था बनी हुई है। अगर ऐसी चीजें हो रही हैं तो ये पूरी तरह से असंवैधानिक हैं। कानून इसकी इजाजत नहीं देता है। अगर ऐसा कोई रिकवरी एजेंट आपके पास आता है और धमकाता है तो आप पुलिस में शिकायत कर सकते हैं। कोई भी रिकवरी एजेंट आपसे पैसे की डिमांड करने का Authorize नहीं है। आप इसके खिलाफ पुलिस में कम्प्लेन कर सकते हैं। अगर आप शिकायत करते हैं तो पुलिस उसपर कार्रवाई करने के लिए बाध्य है। आप अपने बैंक के खिलाफ कार्रवाई करिए। आप उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई मत करिए जो आपके पास पैसे की डिमांड करने आए हैं। आप सीधे लिखिए कि हमारी नौकरी चली गई, हमारी 3 EMI Due हैं, इसकी डिमांड बैंक वाले कानूनी तरीके से ना करके धमका रहे हैं। हमारे पास Unauthorize लोगों को भेज रहे हैं। आप इसकी शिकायत रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पोर्टल पर Ombudsman के जरिए भी कर सकते हैं। चूंकि RBI, इस तरह की चीजों की इजाजत नहीं देता है। अगर कोई लोन के पैसे वापस नहीं करता है तो आप उसके पास गुंडे या रिकवरी एजेंट भेजकर पैसे वसूल नहीं कर सकते। देश में अदालती प्रक्रिया है, आपको उसे फॉलो करना होगा।
जवाब- सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट संदीप मिश्रा ने कहा कि ये मानवाधिकार का ही हनन नहीं है बल्कि Right To Liberty, संविधान के आर्टिकल 21 में जो हमें दी गई है, ये उसका सीधा-सीधा हनन है। हमें अपनी बातें कहने और उन्हें लोगों तक पहुंचाने का हक है। बस वह बात, Public Order, Morality, देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता और सांप्रदायिक सौहार्द के खिलाफ नहीं होनी चाहिए। इन सब चीजों का ध्यान रखते हुए अगर आप कुछ बोलते हैं और तब भी आपको रोका जाता है तो आप उन लोगों के खिलाफ शिकायत करिए जो आपको रोक रहे हैं। ऐसे मामलों में आप Writ Jurisdiction का सहारा ले सकते हैं। आप Writ दायर करके उस संस्था के खिलाफ आदेश ले सकते हैं जो आपके Right को सुरक्षित करने या संरक्षण करने में विफल रही है।
जवाब- संदीप मिश्रा ने कहा कि देखिए One Stop Solution तो नहीं है लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का पोर्टल तो बना हुआ है। अगर आपको कोई शिकायत करनी है तो आप उसके पोर्टल के माध्यम से शिकायत कर सकते हैं। लेकिन इसमें दिक्कत ये है कि यह चीजें अभी सेंट्रलाइज नहीं हुई हैं। अगर आप मुझे सेंट्रलाइज की बात पूछेंगे तो सेंट्रलाइज सिस्टम अभी नहीं है। लेकिन अगर आपके मानवाधिकार का हनन हो रहा है तो आप अलग-अलग जगह शिकायत करें। बैंक से रिलेटेड मामला है तो आप RBI के पोर्टल पर शिकायत करें। इसी तरह Public Grievance है तो आप CGRS, जिसको आप IGRS भी कहते हैं, उसके माध्यम से शिकायत कर सकते हैं। हर राज्य में यह अलग रूप में है। जैसे उत्तर प्रदेश में यह जनसुनवाई के नाम से है। इसी तरह केंद्र सरकार का पोर्टल CPGRAMS यानी Centralised Public Grievance Redress and Monitoring System है, इस पर आप किसी भी विभाग के खिलाफ कोई भी शिकायत कर सकते हैं। इसके अलावा, आप RTI का उपयोग कर सकते हैं। चूंकि मामला आपसे जुड़ा होगा तो अधिकारी जानकारी देने के लिए बाध्य होगा। RTI के जरिए आप थर्ड पर्सन की जानकारी नहीं मांग सकते हैं लेकिन आपसे जुड़ा मामला है तो आप RTI का इस्तेमाल कर सकते हैं। जब भी आप पोर्टल के माध्यम से शिकायत करें तो बाद में आप RTI के जरिए जानकारी मांग सकते हैं कि आपकी तरफ से की गई शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई। अगर संबंधित अधिकारी तय समय में जवाब नहीं देते हैं तो उनके खिलाफ जुर्माना भी हो सकता है।
जवाब- सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट संदीप मिश्रा ने कहा कि अगर ऐसा कुछ होता है तो तुरंत पुलिस अधिकारियों को सूचना दें। संबंधित विभाग को सूचना दें। अगर किसी ने आपकी प्राइवेसी Breach करते हुए आपका डेटा चुराया है तो आपको इसकी जानकारी IT विभाग को देनी होगी। साइबर क्राइम सेल में देनी होगी। हेल्पलाइन नंबर 1930 डायल करके आप ऐसा कर सकते हैं। इसके अलावा, कुछ Precautions आपको खुद लेकर चलने होंगे। जैसे- अपनी पर्सनल जानकारी देने से परहेज करें। अपने आधार का नंबर ना दें। अपनी बैंकिंग डिटेल और डेट ऑफ बर्थ किसी को ना दें। इसको आप सार्वजनिक प्लेटफार्म पर साझा ना करें। आज के समय में बहुत सारे लोगों के साथ बैंकिंग के फ्रॉड होते हैं। इसलिए कभी लालच में मत पड़िए। सोशल मीडिया पर फोटो शेयर करते वक्त भी सतर्क रहें। अपने फोटो को ऐसे एंगल के साथ खिंचवाकर ना शेयर करें, जिससे कि कोई आपकी फोटो को कांट-छांटकर आपकी पासपोर्ट साइज फोटो बना ले।
जवाब- संदीप मिश्रा ने कहा कि इस सभी के लिए अलग-अलग कानून बने हुए हैं। अनुसूचित जाति के SC/ST कानून बना हुआ है। महिलाओं के लिए महिला आयोग बना हुआ है। बच्चों के हितों के संरक्षण के लिए बाल आयोग बना हुआ है। महिलाओं के लिए राज्य में भी अलग से राज्य महिला आयोग है। राज्य में बाल आयोग भी है। इन आयोग में आप अपनी अर्जी दे सकते हैं। ये सारे डेडिकेटेड ऑर्गनाइजेशन हैं, जिनका काम ही यही है कि आपको किसी ना किसी तरीके से रिलीफ दिलाई जाए। इन आयोग में आपको एक प्रकार का ह्यूमन टच मिलेगा। आपकी बात सुनी जाएगी। जिन अधिकारियों ने आपकी बात आजतक नहीं सुनी है, उनसे सवाल पूछने का हक इन संस्थाओं के पास है। इनके पास भी आप नहीं पहुंच पाते हैं तो बस आपको पोस्ट ऑफिस तक जाना है। A4 साइज पेपर लीजिए, उसपर पेन से अपनी शिकायत लिखिए और पत्राचार के माध्यम से संबंधित संस्थाओं से सवाल करिए। इसके जरिए मेरठ में अपने घर में बैठा हुआ आदमी प्रयागराज तक अपनी बात पहुंचा सकता है।
जवाब- सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट संदीप मिश्रा ने कहा कि भारत के लोग अपने मानवाधिकारों के प्रति जागरूक हैं। अक्सर जिन लोगों को हम कम पढ़े-लिखे मानते हैं वे एलीट क्लास से ज्यादा जागरूक हैं। जो पैसे वाले लोग हैं, ज्यादातर बार वह कहते हैं कि इन सब चक्करों में कौन पड़े। लेकिन आम तबका अपने मानवाधिकारों के प्रति उनके मुकाबले ज्यादा जागरूक है।
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