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Video: थप्पड़ के बदले थप्पड़, उद्धव के सांसद का ये कैसा न्याय? हिंदी भाषी से कान पकड़कर माफी मंगवाई

Edited By: Shakti Singh Published : Jul 03, 2025 05:57 pm IST, Updated : Jul 03, 2025 05:57 pm IST

मारपीट का वीडियो सामने आने के बाद लोगों को पता चला कि एक मराठी व्यक्ति की पिटाई हुई है। इसके बाद लोग भड़क गए थे। ऐसे में यूबीटी सांसद ने मारपीट करने वाले व्यक्ति से कान पकड़कर माफी मंगवाई और पीड़ित ने उसे बदले में एक थप्पड़ भी मारा।

महाराष्ट्र के थाणे में हिंदी-मराठी विवाद के बीच यूबीटी सांसद ने अपनी अदालत शुरू कर दी और एक मामले का तुरंत निपटारा भी करा दिया। मामला शिवसेना (उद्धव बाळासाहेब ठाकरे) के सांसद राजन विचारे से जुड़ा है। लोकसभा में शिवसेना यूबीटी के चीफ व्हिप और थाणे सांसद राजन विचारे के ऑफिस का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें एक व्यक्ति कान पकड़कर दूसरे से माफी मांग रहा है और दूसरा व्यक्ति एक थप्पड़ मारने के बाद उसे माफ कर देता है। यह घटना हिंदी-मराठी विवाद से भी जुड़ी हुई है।

क्या है मामला? 

थाणे में एक दुकानदार और ग्राहक के बीच विवाद हो गया था। विवाद के बाद दुकानदार और उसके दो-तीन साथियों ने मिलकर ग्राहक को पीट दिया था। इस घटना का वीडियो भी सामने आया था। हालांकि, बाद में यह खुलासा हुआ कि जिस व्यक्ति की पिटाई हुई, वह महाराष्ट्र का था और मारपीट करने वाले आरोपी दूसरे राज्य के हिंदी भाषी लोग हैं। इसके बाद मराठी लोगों ने हंगामा शुरू कर दिया। ऐसे में थाणे सांसद ने खुद ही मामले का निपटारा करने का फैसला किया।

राजन विचारे के ऑफिस में क्या हुआ?

शिवसेना यूबीटी सांसद राजन विचारे ने अपने ऑफिस में पीड़ित और आरोपी को बुलाकर दोनों के बीच सुलह करा दी, ताकि मामला आगे न बढ़े। उन्होंने आरोपी व्यक्ति से कान पकड़कर माफी मांगने को कहा और उसने ऐसा ही किया। हालांकि, पीड़ित ने बदले में उसे एक थप्पड़ जड़ दिया और फिर माफ करने की बात कही। इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि इस विवाद का समाधान कानूनी तरीके से भी किया जा सकता था। ऐसे में नेताजी ने अपनी अदालत क्यों लगाई।

महाराष्ट्र में तीन भाषाई नीति से शुरू हुआ विवाद

महाराष्ट्र में 16 अप्रैल को सरकार ने एक आदेश जारी कर पहली से पांचवीं तक के बच्चों के लिए हिंदी भाषा पढ़ना जरूरी कर दिया था। इसका विरोध होने पर 17 जून को इसे वैकल्पिक कर दिया गया। हालांकि, अभी भी छात्रों को तीन भाषाएं पढ़ना जरूरी था, लेकिन अब तीसरी भाषा के रूप में हिंदी जरूरी नहीं थी। अब सरकार ने तीन भाषा की नीति को ही रोक दिया है। एक समिति बनाई गई है, जो यह सुझाव देगी कि महाराष्ट्र में तीन भाषाई नीति को किस तरह लागू किया जाना चाहिए।

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