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सावन के महीने में शिव नहीं राम पूजा का भी महत्व, जानिए क्यों'

 Published : Aug 07, 2015 09:53 am IST,  Updated : Aug 20, 2015 06:49 am IST

नई दिल्ली: सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही सावन के महीने मे भगवान राम की पूजा भी उतना ही महत्व रखती है जितना की शिव पूजा। सावन

सावन के महीने में शिव...- India TV Hindi
सावन के महीने में शिव नहीं राम पूजा का भी महत्व, जानिए क्यों?

नई दिल्ली: सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही सावन के महीने मे भगवान राम की पूजा भी उतना ही महत्व रखती है जितना की शिव पूजा। सावन के महीने मे अधिकतर लोग श्री रामचरितमानस का पाठ कराते हैं। यदि अखण्ङ पाठ नही करा सकते तो एक मास परायण का पाठ भी लाभकारी है।

रामचरितमानस के पाठ से भगवान राम की आराधना तो होती ही है साथ ही भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैँ भगवान राम की पूजा के बिना शिव पूजा अधूरी रहती है और बिना शिव पूजा के राम पूजा अधूरी है। इस विषय में कई मान्याताएं प्रचलित हैँ। मसलन कहा जाता है कि रामेश्वरम में शिवलिंग पर जल चढाने से मनुष्य शिव का प्रिय भक्त हो जाता है। ज्योतिर्लिंग में रामेश्वरम सर्वोपरि माना जाता है उसकी स्थापना भगवान राम ने अपने हाथों से की है जो व्यक्ति निष्काम भाव से रामेश्वरम के दर्शन करता है या जल चढाता है उसे शिव के साथ साथ प्रभु राम की कृपा भी प्राप्त हो जाती है।

होइ अकाम जो छल तज सेइहि, भगति मोरि तेहि संकर देहि।

ममकत सेतु जो दरसनु करिही, सो विनु श्रम भव सागर तरिही।।

(लंका काण्ड दोहा(2) चौपाई(2))

 भगवान राम का कहना है भगवान शिव के समान मुझे कोई दूसरा प्रिय नही है इसलिय शिव मेरे आराध्य देव हैँ जो शिव के विपरीत चलकर या शिव को भूलकर मुझे पाना चाहे तो मैँ उसपर प्रसन्न नहीं होता। जिसका प्रमाण रामचरितमानस में चंद चौपाई और दोहों में किया गया है।

लिंग थाप कर विधिवत पूजा, शिव समान मोही और न दूजा।। 

शिव द्रोही मम दास कहावा, सो नर सपनेहु मोही न भावा।।

(लंकाकाण्ड का दोहा नंबर (1) चौपाई(3))

जो व्यक्ति राम से वैर कर शिव का उपासक अथवा शिव से वैर रखता हो ओर राम का उपासक बनना चाहता हो तो वह पुण्य नही पाप का भागी होता है।

राम चरितमानस में गोस्वामी जी ने लिखा है।      

शंकर प्रिय मम द्रोही, शिव द्रोही ममदास।। ते नर करही कलप भरी, घोर नरक महुँ वास।।

सावन के महीने में रामचरितमानस का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कहा जाता है इसकी रचना स्वयं शंकर जी ने की है। इसका जिक्र तुलसीदास जी ने लिखा है।

रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमय सिवा मनभाषा।।

ताते राम चरितमानस वर। धरेउ नाम हियं हेरि हरसि हर।।  

(बालकाण्ड में दोहा नंबर(34) चौपाई(6))                                         

अर्थात महेश ने (महादेव जी) इसे रचकर अपने मन में रखा था और अच्छा अवसर देखकर पार्वती जी को कहा। शिव जी ने अपनें मन में विचार कर इसका नाम रामचरितमानस रखा।

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