कराची: पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची में इस साल अब तक कुत्ते काटने के 29 हजार मामले सामने आए हैं। इनमें से 19 लोगों की रेबीज से मौत हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कराची के कई इलाकों जैसे लांढी, कोरंगी, डीएचए, महमूदाबाद, ओरंगी टाउन और मलीर में आवारा कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ गई है। इन इलाकों के लोगों का कहना है कि कुत्तों के हमले अब आम हो गए हैं, जिससे डर का माहौल है और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। बता दें कि रेबीज एक ऐसी घातक बीमारी है, जिसमें लक्षण दिखने के बाद बचना नामुमकिन माना जाता है। रेबीज से पीड़ित इंसान को शुरुआत में सिरदर्द होता है और फिर आगे चलकर उसे पानी और हवा से डर लगने लगता है, और अंतत: मौत हो जाती है।
डॉक्टरों का कहना है कि आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ने का मुख्य कारण शहर में कचरा प्रबंधन की खराब व्यवस्था है। कचरे के ढेर जहां-तहां पड़े रहते हैं, जहां से कुत्तों को खाना-पानी और आश्रय मिलता है और उनकी आबादी तेजी से बढ़ती है। कराची के बड़े अस्पतालों में कुत्ते काटने के शिकार लोगों की भारी भीड़ लग रही है। सिर्फ इंडस अस्पताल में रोजाना करीब 150 मामले आते हैं। जनवरी से अब तक वहां 16,000 से ज्यादा मरीजों का इलाज हुआ है, और रेबीज से 8 मौतें हुई हैं। जिन्ना अस्पताल में भी इस साल कुत्ते के काटने के 13,000 मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें 11 मौतें हुई हैं। अस्पताल के अधिकारी कहते हैं कि रोजाना करीब 100 मरीज नए मामलों और फॉलो-अप इलाज के लिए आते हैं।
इंडस अस्पताल में रेबीज रोकथाम क्लिनिक के मैनेजर डॉक्टर मुहम्मद आफताब गोहर ने कहा कि रेबीज के मामले हर साल बढ़ रहे हैं। उन्होंने समझाया कि अगर रेबीज वाले कुत्ते का थूक काटने से शरीर में घुस जाए, तो वायरस नर्वस सिस्टम से होकर दिमाग तक पहुंचता है। उन्होंने कहा कि लक्षण 6 हफ्तों से लेकर 6 महीनों तक में कभी भी दिख सकते हैं। डॉक्टर गोहर ने आगे कहा कि एक बार हाइड्रोफोबिया और एयरोफोबिया हो जाए, तो दुनिया में कहीं भी इसका इलाज नहीं है।
WHO के दिशानिर्देशों के मुताबिक, कुत्ते के काटने के बाद सबसे पहले घाव को कम से कम 10 मिनट तक साबुन और साफ पानी से अच्छी तरह धोना होता है। फिर, घाव की गंभीरता के आधार पर एंटी-रेबीज वैक्सीन दी जाती है। सामान्य मामलों में वैक्सीन पहले, तीसरे, सातवें और चौदहवें दिन लगाई जाती है। गंभीर मामलों में, तुरंत सुरक्षा के लिए रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन घाव में और उसके आसपास इंजेक्ट किया जाता है। डॉक्टर गोहर ने कहा कि समय पर इलाज से 100 प्रतिशत सुरक्षा मिलती है, लेकिन कई मरीज घरेलू उपचारों पर भरोसा करते हैं या छोटे क्लिनिकों में अधूरा इलाज कराते हैं, जिससे मौत हो जाती है।
कराची के निवासी कहते हैं कि रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल हो गई है। शहर की महिलाएं बताती हैं कि कुत्ते उनका पीछा करते हैं, बच्चे उनके हमले का शिकार होते हैं, और साइकिल या मोटरसाइकिल चलाने वाले लोग, खासकर शाम के समय, निशाना बनते हैं। स्थानीय लोग दावा करते हैं कि आवारा कुत्तों को दूसरी जगह ले जाने की कोशिशें नाकाम रही हैं क्योंकि वे वापस आ जाते हैं। उन्होंने मांग की है कि कुत्तों के लिए सही शेल्टर होम बनाए जाएं। हालांकि, कुछ लोगों द्वारा कुत्तों को खाना खिलाए जाने की वजह से वे रिहायशी इलाकों में ही ज्यादा रहते हैं जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है।
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