बिहार में पिछले कई वर्षों से लागू शराबबंदी कानून अब अपनी ही सरकार के भीतर विरोध का सामना कर रहा है। विधानसभा के भीतर और बाहर NDA के सहयोगी दलों- उपेंद्र कुशवाहा की RLM और जीतन राम मांझी की HAM ने इस कानून की जमीनी हकीकत पर सवाल उठाते हुए इसकी समीक्षा की मांग की है।
विधानसभा में सरकार को घेरते हुए RLM के विधायक माधव आनंद ने कहा कि शराबबंदी को लागू हुए कई साल हो गए, लेकिन इसका जमीन पर कितना असर हो रहा है, क्या वाकई में बिहार में शराब मिलनी बंद हो गई है, इसकी समीक्षा होनी चाहिए। माधव आनंद ने कहा कि उन्हें लगता है कि अब जोर जबरदस्ती के बजाए सरकार का फोकस अवेयरनेस पर होना चाहिए।
NDA के साथी केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी शराबबंदी की समीक्षा की मांग को सपोर्ट किया। मांझी ने कहा कि शराबबंदी बुरी नहीं है, लेकिन इसकी समीक्षा जरूरी है, क्योंकि बिहार में शराब की दुकानें तो बंद हो गई हैं, लेकिन शराब की होम डिलवरी हो रही है। पुलिस भी शराब की तस्करी करने वालों के बजाए छोटे-मोटे लोगों को पकड़ती है, इसलिए अब इस कानून पर विचार तो होना चाहिए।
इसके बाद RJD के नेता भी मैदान में कूदे। RJD के विधायक रणविजय साहू ने कहा कि शराबबंदी के नाम पर बिहार में नौटंकी हो रही है। पहले कम से कम राजस्व के पैसे तो सरकार को मिलता था, लेकिन अब पूरा पैसा पुलिस और शराब माफिया की जेब में जा रहा है। रणविजय साहू ने कहा कि शराबबंदी अच्छी चीज है, लेकिन इसे कैसे लागू किया जाए, इस पर फिर बात होनी चाहिए।
ओवैसी की पार्टी के नेता अख्तरूल ईमान ने कहा कि उनकी पार्टी तो पहले दिन से शराबबंदी के खिलाफ थी, क्योंकि जोर जबरदस्ती से जो किया जाता है, वो कभी सफल नहीं होता।
हालांकि, इस मुद्दे पर नीतीश कुमार की सरकार और JDU की राय बिल्कुल क्लीयर है। आज बिहार सरकार के मंत्री विजय चौधरी ने कहा कि शराबबंदी सबकी सहमति से हुई थी। ये कानून खत्म नहीं होगा। जब उसे पूछा गया कि कानून खत्म न हो, लेकिन इसकी समीक्षा होगी या नहीं, इस पर विजय चौधरी ने कोई जबाव नहीं दिया।
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