Thursday, March 05, 2026
Advertisement

Subedaar Review: बिखरी पटकथा और कमजोर इमोशनल ट्रिगर्स वाली औसत फिल्म, अनिल कपूर का दमदार अभिनय भी नहीं आया काम

जया द्विवेदी Published : Mar 05, 2026 11:47 am IST, Updated : Mar 05, 2026 11:52 am IST

सुरेश त्रिवेणी द्वारा निर्देशित 'सूबेदार' एक महत्वाकांक्षी लेकिन बिखरी हुई फिल्म है। अनिल कपूर और आदित्य रावल के शानदार अभिनय के बावजूद, कमजोर इमोशनल ट्रिगर्स, बोझिल नैरेटिव और ढेर सारे उप-कथानकों के कारण यह प्रभावी नहीं हो पाती। विचारों की अधिकता इस

Subedaar- India TV Hindi
Photo: PRIME VIDEO अनिक कपूर।
  • फिल्म रिव्यू: सूबेदार
  • स्टार रेटिंग: 2.5 / 5
  • पर्दे पर: 05/03/2026
  • डायरेक्टर: सुरेश त्रिवेणी
  • शैली: एक्शन ड्रामा

प्राइम वीडियो की नवीनतम पेशकश 'सूबेदार', जिसे प्रशंसित निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने निर्देशित किया है, एक ऐसी फिल्म है जो कागज़ पर जितनी प्रभावशाली और गहरी नजर आती है, परदे पर उतनी ही बिखरी हुई महसूस होती है। यह फिल्म एक साथ कई सामाजिक मुद्दों, व्यक्तिगत त्रासदियों और हाई-ऑक्टेन एक्शन को समेटने की कोशिश करती है, लेकिन अंततः यह एक ऐसी 'खिचड़ी' बन जाती है जहां किसी भी एक विचार को फलने-फूलने का पर्याप्त समय नहीं मिलता।

कहानी की पृष्ठभूमि और मुख्य पात्र

फिल्म की कहानी एक छोटे से शहर में सेट है, जहां का वातावरण अवैध रेत माफिया के काले कारोबार से प्रदूषित है। यहां हमारी मुलाकात सूबेदार मेजर आदित्य मौर्य (अनिल कपूर) से होती है, जो भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होकर घर लौटे हैं। मौर्य का किरदार गर्व और गिल्ट के बीच झूल रहा है, वर्दी के प्रति गर्व, लेकिन परिवार को समय न दे पाने का गिल्ट। उनकी पत्नी अब इस दुनिया में नहीं हैं और वह अपनी बेटी श्यामा (राधिका मदान) के साथ एक टूटे हुए रिश्ते को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर फिल्म का प्रतिपक्षी प्रिंस (आदित्य रावल) है, जो रेत माफिया की सरगना बबली दीदी (मोना सिंह) का भाई है। प्रिंस एक बिगड़ैल, अहंकारी और हिंसक युवक है जो शहर को अपनी जागीर समझता है। जब एक पूर्व सैनिक का अनुशासन एक अपराधी के अहंकार से टकराता है, तो वही इस फिल्म का मुख्य आधार बनता है।

भटका हुआ नैरेटिव और ढेर सारे उप-कथानक

'सूबेदार' की सबसे बड़ी समस्या इसकी पटकथा का बिखराव है। फिल्म केवल एक रिवेंज ड्रामा या माफिया थ्रिलर बनकर नहीं रहती, बल्कि इसमें कई अन्य ट्रैक जोड़ने की कोशिश की गई है। इसमें मौर्य और उनकी बेटी श्यामा के तनावपूर्ण संबंधों को दिखाया गया है, जहां श्यामा अपने पिता की अनुपस्थिति के कारण कड़वाहट से भरी है। साथ ही फिल्म कॉलेज लाइफ में महिलाओं के खिलाफ नफरत और बुलीइंग जैसे गंभीर मुद्दों को भी छूती है। रेत माफिया का ट्रैक भारत में अवैध खनन की कड़वी सच्चाई को पेश करता है और यह भी दिखाता है कि कैसे सत्ता में बैठे लोग बिना प्रिविलेज वाले लोगों का शोषण करते हैं। समस्या यह है कि फिल्म इन सभी विषयों को उठाती तो है, लेकिन किसी के साथ भी उतनी देर तक नहीं ठहरती कि दर्शक उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ सकें। यह सब कुछ बहुत सतही और 'चेकलिस्ट' जैसा महसूस होता है।

कमजोर इमोशनल ट्रिगर्स और अजीब पटकथा चुनाव

फिल्म में संघर्ष को शुरू करने वाले कारण काफी अजीब और कमजोर लगते हैं। उदाहरण के लिए सूबेदार मौर्य का गुस्सा तब चरम पर पहुँचता है जब उनकी पुरानी जिप्सी को नुकसान पहुँचाया जाता है। बताया गया है कि यह गाड़ी उनकी दिवंगत पत्नी के सपनों से जुड़ी थी। वहीं दूसरी ओर विलेन प्रिंस एक ऐसी रिवॉल्वर को वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है जिसकी पॉलिश उसकी मृत माँ के गहनों की चांदी से बनी है। इन प्रतीकात्मक चीज़ों का उद्देश्य कहानी में भावनात्मक गहराई जोड़ना था, लेकिन स्क्रीन पर यह किसी ठोस वजह के बजाय एक बचकानी जिद जैसा लगता है। जब तक दर्शक इन वस्तुओं के महत्व को समझ पाते, तब तक फिल्म अगले एक्शन सीन की ओर बढ़ जाती है।

चैप्टर फॉर्मेट और टोनल असंतुलन

आजकल की कई फिल्मों की तरह 'सूबेदार' भी अपनी कहानी को अध्यायों में बांटती है, जैसे 'डर' या 'घाव'। हालांकि 'धुरंधर' जैसी फिल्मों में यह सफल रहा है, यहां ये अध्याय केवल ड्रामैटिक सबहेडिंग की तरह लगते हैं जिनका कहानी के वास्तविक मोड़ से बहुत कम लेना-देना है। इसके अलावा, फिल्म की टोन पूरी तरह से भारी और बोझिल है। तनाव और टकराव के बीच फिल्म में ह्यूमर या हल्के-फुल्के पलों की भारी कमी है। एक लंबी फिल्म में दर्शकों को राहत देने के लिए कभी-कभी संवादों या स्थितियों में थोड़ा लचीलापन ज़रूरी होता है, लेकिन यहां निर्देशक ने फिल्म को शुरू से अंत तक इतना डार्क रखा है कि यह अंत तक आते-आते थका देने वाली हो जाती है।

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष- अभिनय

अगर फिल्म कहीं भी अपनी पकड़ बनाए रखती है, तो वह है इसका शानदार अभिनय है। अनिल कपूर ने एक बार फिर साबित किया है कि 'एंग्री ओल्ड मैन' के रूप में उनसे बेहतर विकल्प फिलहाल कोई नहीं है। उन्होंने सूबेदार के किरदार में एक शांत इंटेंसिटी भरी है, एक ऐसा आदमी जो फौजी अनुशासन को अपने भीतर समेटे हुए है और केवल तभी फटता है जब पानी सिर से ऊपर चला जाए। एक्शन दृश्यों में उनकी फुर्ती और स्क्रीन प्रेजेंस आज के युवाओं को कड़ी टक्कर देती है। आदित्य रावल ने भी 'प्रिंस' के रूप में अपनी पिछली फिल्म 'दलदल' से बिल्कुल विपरीत भूमिका निभाई है और वह एक सनकी विलेन के रूप में जमे हैं। राधिका मदान ने अपनी सीमित भूमिका में पूरी ईमानदारी दिखाई है, हालांकि उनके किरदार को और अधिक गहराई दी जा सकती थी। सौरव शुक्ला, मोना सिंह और फैजल मलिक जैसे अनुभवी कलाकारों ने अपनी छोटी भूमिकाओं में भी अपनी छाप छोड़ी है।

इरादे नेक पर इंपैक्ट अधूरा

सुरेश त्रिवेणी की 'सूबेदार' एक बुरी फिल्म नहीं है, लेकिन यह एक बहुत ज़्यादा 'स्टफ्ड' फिल्म है। इसमें इतने सारे आइडियाज ठूंसे गए हैं कि उनमें से कोई भी पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाया। यह फिल्म अनिल कपूर के शानदार प्रदर्शन और कुछ बेहतरीन एक्शन सीक्वेंस के बावजूद एक औसत अनुभव बनकर रह जाती है। अगर पटकथा थोड़ी अधिक केंद्रित  होती और केवल दो या तीन मुख्य ट्रैक पर ध्यान दिया जाता तो शायद यह एक यादगार क्लासिक बन सकती थी। फिलहाल यह एक ऐसी फिल्म है जिसे आप केवल अनिल कपूर के अभिनय के लिए एक बार देख सकते हैं।

Google पर इंडिया टीवी को अपना पसंदीदा न्यूज सोर्स बनाने के लिए यहां
क्लिक करें
Advertisement
Advertisement
Advertisement