Thursday, February 12, 2026
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Explainer: पुतिन के Nuclear Test के निर्देश ने कैसे दी ट्रंप को चुनौती, कैरेबियन सागर में क्यों उतरा रूसी युद्धपोत?

Written By: Dharmendra Kumar Mishra @dharmendramedia Published : Nov 06, 2025 10:53 pm IST, Updated : Nov 06, 2025 10:53 pm IST

अमेरिका और रूस की न्यूक्लियर आक्रामकता से वैश्विक शांति संधियां कमजोर होंगी। भारत जैसे तटस्थ देशों के लिए यह चुनौती है, क्योंकि रूस प्रमुख रक्षा साझेदार है। यदि वाकई परमाणु परीक्षण होते हैं, तो इन हथियारों की नई होड़ में चीन, उत्तर कोरिया और ईरान भी शामिल हो सकते हैं। कैरेबियन में टकराव से तेल कीमतें चढ़ सकती हैं।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन (बाएं) और अमेरिका के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप (दाएं)- India TV Hindi
Image Source : AP रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन (बाएं) और अमेरिका के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप (दाएं)

Explainer: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने द्वारा फिर से परमाणु परीक्षण करने को लेकर दिए गए बयान ने ग्लोबल टेंशन बढ़ा दी है। ट्रंप के इस बयान जवाब में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी अपने देश की सेना को न्यूक्लियर टेस्ट संबंधी तैयारियां करने का निर्देश देकर परमाणु आक्रामता को और बढ़ा दिया है। इससे पूरे विश्व में हलचल पैदा होने लगी है। पुतिन की इस हालिया न्यूक्लियर बयानबाजी और कैरेबियन क्षेत्र में अमेरिका के बाद रूसी युद्धपोती की अचानक हुई आक्रामक तैनाती ने दुनिया को एक बार फिर शीत युद्ध जैसी चिंता में डाल दिया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के न्यूक्लियर टेस्ट फिर शुरू करने के बयान के सीधे जवाब में पुतिन ने रूस को पूर्ण पैमाने के न्यूक्लियर परीक्षणों की तैयारी का आकलन करने का आदेश दिया है। दो महाशक्तिशाली देशों के ताकतवर राष्ट्रपतियों के इन बयानों ने पूरे विश्व में खलबली पैदा कर दी है। 

पुतिन ने कैरेबियन सागर में उतारा युद्धपोत

न्यूक्लियर टेस्ट का सेना को निर्देश देने के बाद राष्ट्रपति पुतिन ने कैरेबियन सागर में वेनेजुएला के सहयोग में रूसी युद्धपोत की तैनाती कर दी है। ऐसा करके पुतिन ने पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व को सीधी चुनौती पेश कर दी है। विश्लेषकों का मानना है कि पुतिन की यह दोहरी रणनीति पश्चिम के साथ तनाव बढ़ाने, वैश्विक शक्ति प्रदर्शन का संकेत देने और अमेरिका के 'बैकयार्ड' में उसकी प्रभुता को कमजोर करने का प्रयास है। आइए, इस जटिल परिदृश्य को विस्तार से समझाते हैं। 

पुतिन ने क्यों कहा-अमेरिका ने किया तो रूस भी करेगा परमाणु परीक्षण

अमेरिका और रूसे के नेताओं द्वारा की गई न्यूक्लियर बयानबाजी की पृष्ठभूमि और संदर्भ न्यूक्लियर टेस्टिंग का इतिहास शीत युद्ध से जुड़ा है। 1996 में संयुक्त राष्ट्र के तहत व्यापक न्यूक्लियर परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) लागू हुई, जिसके तहत सभी देशों द्वारा परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाई गई। अमेरिका और रूस जैसे प्रमुख देशों ने परीक्षण रोके, लेकिन संधि की पुष्टि नहीं की। हाल ही में ट्रंप ने 31 अक्टूबर को कहा कि अमेरिका 'न्यूक्लियर टेस्ट फिर शुरू कर सकता है, ताकि चीन और रूस के खिलाफ अपनी क्षमता मजबूत की जा सके। इसके बाद पुतिन ने भी 5 नवंबर को क्रेमलिन में उच्च अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि अमेरिका परीक्षण करता है, तो रूस भी 'पूर्ण पैमाने के परीक्षण' की योजना तैयार करे। दोनों नेताओं के इन बयानों ने ग्लोबल टेंशन बढ़ा दी है।  


क्या दोनों देश एक दूसरे को कर रहे न्यूक्लियर ब्लैकमेल

पुतिन का न्यूक्लियर टेस्ट वाला यह आदेश रूसी रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को संबोधित था, जिसमें परीक्षण स्थलों (जैसे नोवाया ज़ेमल्या द्वीप) की सक्रियता और तकनीकी तैयारी पर जोर दिया गया। ट्रंप और पुतिन की इस तरह की बयानबाजी को एक दूसरे के खिलाफ'न्यूक्लियर ब्लैकमेल' के रूप में देखा जा रहा है, जो यूक्रेन युद्ध के बाद से जारी है। रूस ने 2022 में यूक्रेन पर पहली बार हमला करने के बाद से कई बार 'न्यूक्लियर थ्रेट' का सहारा लिया, लेकिन वास्तविक परीक्षण नहीं किया। विशेषज्ञों के अनुसार, रूस को परीक्षण फिर शुरू करने में 6 से 12 महीने लग सकते हैं, क्योंकि उसके अधिकांश हथियार कंप्यूटर सिमुलेशन पर निर्भर हैं। 


विश्व में बढ़ सकती है न्यूक्लियर हथियारों की होड़


रूस और अमेरिका का यह कदम वैश्विक न्यूक्लियर हथियारों की होड़ को भड़का सकता है। चीन ने भी चेतावनी दी है कि वह अपनी क्षमता बढ़ाएगा। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की, जबकि नाटो ने इसे 'खतरनाक उकसावा' बताया। 


कैरेबियन स्टैंडऑफ ने बढ़ाया तनाव

पिछले करीब 2 महीनों से अमेरिका कैरेबियन सागर में तथाकथित ड्रग तस्करी करने वाली दर्जनों नौकाओं पर हमला किया है। इसमें करीब 70 लोग मारे जा चुके हैं। अमेरिका का आरोप है कि वेनेजुएला ड्रग तस्करों को बढ़ावा दे रहा है। इसके बाद अमेरिका ने वेनेजुएला को घेरने के लिए युद्धपोतों और करीब 10 हजार अमेरिकी सैनिकों की तैनाती कर दी है। जवाब में वेनेजुएला में रूसी सैन्य मौजूदगी ने कैरेबियन सागर में उबाल पैदा कर दिया है। रूस के इस आक्रामक रुख ने अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर दी है। अमेरिकी प्रतिबंधों से जूझ रहे वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो रूस के करीबी सहयोगी हैं। 31 अक्टूबर को रूसी कार्गो विमान काराकास पहुंचा, जिसमें एयर डिफेंस सिस्टम, बैलिस्टिक मिसाइलें और अपग्रेडेड एयरक्राफ्ट लादे गए हैं। 

 

रूस दे सकता है वेनेजुएल का घातक मिसाइलें

रूस ने कहा है कि मॉस्को वेनेजुएला को 'स्ट्राइक मिसाइलें' दे सकता है। हाल ही में रूस ने वेनेजुएला को 5000 इग्ला-एस एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलें दीं, जो अमेरिकी हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। इसके अलावा वैगनर ग्रुप के विशेष बल वेनेजुएली सैनिकों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। कैरेबियन सागर में यह स्टैंडऑफ 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट की याद दिलाता है, जब सोवियत संघ ने क्यूबा में मिसाइलें तैनात की थीं। आज ट्रंप प्रशासन ने कैरेबियन में सैन्य बल बढ़ाया है। मादुरो के खिलाफ 'इंटरवेंशन' की धमकी देते हुए अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत और एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात हैं। रूस ने इसे 'अत्यधिक सैन्यीकरण' बताकर निंदा की है। 

मादुरो ने पुतिन से मांगी थी सहायता

वेनेजुएल के राष्ट्रपति मादुरो ने अमेरिकी आक्रामकता को देखते हुए पुतिन को पत्र लिखकर सहायता मांगी थी, जो उनके बीच तेल व्यापार और सैन्य साझेदारी को मजबूत कर रही है। विश्लेषकों का आकलन है कि पुतिन की यह दोहरी रणनीति 'हाइब्रिड वारफेयर'है। न्यूक्लियर बयानबाजी यूरोप और एशिया में अमेरिकी प्रभाव को कमजोर करती है, जबकि कैरिबियन में सैन्य तैनाती लैटिन अमेरिका में रूस की पैठ बढ़ाती है।

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