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साल 1712 में बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद बेटों के बीच सत्ता की लड़ाई हुई, जिसमें जहांदार शाह अपने भाइयों को हराकर दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
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सत्ता मिलते ही जहांदार शाह 'लाल कुंवर' नाम की एक नर्तकी के प्रेम में पड़ गया। उसने उसे 'इम्तियाज महल' की उपाधि दी और शासन की बागडोर अनौपचारिक रूप से उसके हाथों में सौंप दी।
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लाल कुंवर के प्रभाव के कारण योग्यता को दरकिनार कर उसके रिश्तेदारों को ऊंचे पदों और जागीरों से नवाजा गया, जिससे पुराने वफादार अमीरों और सेनापतियों में भारी असंतोष फैल गया।
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जहांदार शाह अपनी अजीब हरकतों के लिए कुख्यात था। वह कभी बिना वस्त्रों के तो कभी महिलाओं के कपड़े पहनकर दरबार में आ जाता था, जिससे मुगल सल्तनत की गरिमा को भारी ठेस पहुंची।
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विलासिता, भोग-विलास और शासन के प्रति घोर लापरवाही के कारण समकालीन इतिहासकारों ने उसे लंपट और अयोग्य शासक की संज्ञा दी।
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विलासी होने के साथ-साथ वह बेहद क्रूर भी था। उसने सत्ता के मोह में अपने ही बेटों के प्रति कठोर फैसले लिए और आम जनता के साथ भी उसका व्यवहार अक्सर बेरहम रहा।
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उसकी कमजोर नीतियों और दरबार में बढ़ते विद्रोह का फायदा उठाकर उसके भतीजे फर्रूखसियर ने हमला कर दिया। जहांदार शाह का शासन काल मात्र 9 महीने ही चल सका।
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6 जनवरी 1713 को विद्रोहियों द्वारा हारने के बाद उसे कैद कर लिया गया। जेल में ही उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई, जिससे मुगल इतिहास के एक बेहद शर्मनाक अध्याय का अंत हुआ।