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BLOG: मंगल पाण्डेय की क्रांति... 'एकला चलो रे'

आज मंगल पाण्डेय की पुण्यतिथि है । 8 अप्रैल 1857 को आज ही के दिन मंगल पाण्डेय को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था। 

Dileep Kumar Pandey Dileep Kumar Pandey @dileeppandey
Published on: April 08, 2021 14:58 IST
BLOG: मंगल पाण्डेय की क्रांति... 'एकला चलो रे'- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV BLOG: मंगल पाण्डेय की क्रांति... 'एकला चलो रे'

आज मंगल पाण्डेय की पुण्यतिथि है । 8 अप्रैल 1857 को आज ही के दिन मंगल पाण्डेय को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था। आज मंगल पाण्डेय के बलिदान के 124 साल बाद भी ट्विटर पर मंगल पाण्डेय ट्रेंड कर रहे हैं । युवा दिलों की धड़कनों पर आज भी मंगल पाण्डेय ट्रेंड कर रहे हैं ।

कौन थे मंगल पाण्डेय ? और क्यों मंगल पाण्डेय का बलिदान भारत के इतिहास में महान है ? ये बात अगर आपको समझनी है तो भारत के महान कवि... गुरु रबींद्र नाथ टैगोर के एक महान गीत 'एकला चलो रे' के सार को भी समझना होगा । 'एकला चलो रे'  इस गीत का मतलब है कि अगर कोई आपकी बात नहीं सुन रहा है... कोई आपके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है... तो भी हिम्मत मत हारो... अगर तुम सही हो और सच्चाई के रास्ते पर हो... तो अकेले चलो... आज नहीं तो कल बदलाव ज़रूर होगा ।

ऐसी ही कहानी आज़ादी की लड़ाई के पहले नायक मंगल पाण्डेय की है जो भारत की संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अकेले ही अंग्रेजों से भिड़ गए थे । मंगल पाण्डेय ने अपने साथियों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया था। उस वक्त किसी ने भी मंगल पाण्डेय का साथ नहीं दिया था । आखिरकार मंगल पाण्डेय अकेले ही अंग्रेज़ों के खिलाफ भिड़ गए । मंगल पाण्डेय के बलिदान के कुछ दिनों बाद... उनका बलिदान, शौर्य और साहस ही भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा बना। आज शहीद मंगल पांडे की पुण्यतिथि है... और मंगल पाण्डेय के पूरे जीवन का संदेश यही था कि अगर एक अकेला आदमी भी ज़ोर लगाए तो पूरे देश की किस्मत बदल सकता है।

मंगल पाण्डेय का जन्म  साल 1827 में  हुआ था । उनका जन्म कहां पर हुआ ? इसे लेकर कोई प्रामाणिक जानकारी उपब्ध नहीं है... कुछ लोगों का मानना है कि उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया में हुआ था और कुछ लोग उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद को भी मंगल पाण्डेय की जन्मभूमि मानते हैं ।

वो साल 1849 था जब मंगल पाण्डेय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती हुए थे । मंगल पाण्डेय 34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री में सिपाही थे। उन्हें पश्चिम बंगाल की बैरकपुर छावनी में तैनात किया गया था । उस वक्त भारत में सैनिकों को एक नई इनफील्ड राइफल दी गई थी । जिसकी कारतूस पर चढ़ी हुई परत को उतारने के लिए सिपाहियों को दांतों का यूज़ करना पड़ता था। लेकिन इस नई राइफल की कारतूस पर पशुओं की चर्बी लगाई जाती थी... कहा ये भी गया कि इसमें गाय की चर्बी का भी इस्तेमाल हुआ और इसकी वजह से सैनिकों में जबरदस्त असंतोष फैल गया ।

29 मार्च 1857 को मंगल पाण्डेय ने अपनी टुकड़ी के साथियों को कहा कि अब वक्त आ गया है कि अंग्रेज़ों के खिलाफ जंग छेड़ दी जाए । ये सिपाही दिल से तो मंगल पाण्डेय के साथ जरूर थे लेकिन कोई भी अंग्रेज़ों के खिलाफ बंदूक उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। आखिरकार मंगल पाण्डेय एकदम अकेले पड़ गए लेकिन अकेले होने के बावजूद मंगल पाण्डेय ने हार नहीं मानी और दो अंग्रेज़ अधिकारियों पर हमला कर दिया। मंगल पाण्डेय के इस हमले से दोनों अंग्रेज अधिकारी घायल हो गए ।

जब मंगल पाण्डेय को उनके साथियों की मदद नहीं मिली तो मंगल पाण्डेय बहुत निराश हो गए। आखिर उन्होंने इस गुलामी से खुद को आजाद करने के लिए अपने आपको ही गोली मारने की कोशिश की। लेकिन कोशिश सफल नहीं हुई इतने में अंग्रेजों को वक्त मिल गया और उन्होंने मंगल पाण्डेय को गिरफ्तार कर लिया। मंगल पाण्डेय का कोर्ट मार्शल किया गया और उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी देने की प्लानिंग बनाई गई । लेकिन बगावत के डर से मंगल पाण्डेय को 10 दिन पहले.. 8 अप्रैल को ही फांसी दे दी गई।

फांसी के करीब 2 हफ्ते बाद... 24 अप्रैल को मेरठ में थर्ड नेटिव कैविलरी के सिपाहियों ने भी पशुओं की चर्बी वाले कारतूसों का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया । अंग्रेज़ों ने फौरन इन सभी सिपाहियों को गिरफ्तार कर लिया । लेकिन 10 मई को मेरठ में ही इन्हीं सैनिकों के साथियों ने जेल की दीवारों को तोड़ दिया और सभी गिरफ्तार सैनिकों को छुड़ा लिया गया। यानी जो चिंगारी मंगल पाण्डेय ने लगाई थी वो आजादी का शोला बनकर भड़क उठी ।

मेरठ के बाद ये सैनिक दिल्ली में लालकिले की तरफ बढ़ चले । लाल किले में इन सैनिकों ने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को क्रांति का नेतृत्व करने के लिए कहा । बादशाह ज़फर तैयार हो गए और इस तरह भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम पूरे देश में बहुत तेजी से फैल गया । इलाहाबाद, कानपुर, पटना, अवध, रूहेलखंड, बुंदेलखंड, दोआब और भारत के इन तमाम हिस्सों में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत हो गई ।

अंग्रेज़, भारत के इस पहले स्वतंत्रता संग्राम का दमन करने में कामयाब तो हो गए । लेकिन इस स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारत में ये भरोसा पैदा हुआ कि अंग्रेज़ों को हराना संभव है । इस विद्रोह के 90 साल बाद भारत को आज़ादी मिल गई।

ब्लॉग लेखक दिलीप कुमार पाण्डेय इंडिया टीवी न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं।

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