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सुप्रीम कोर्ट ने अपने 4 अगस्त के आदेश से दो पैराग्राफ हटाए, इलाहाबाद HC के सभी जजों ने चीफ जस्टिस को लिखी थी चिट्ठी

 Reported By: Atul Bhatia Edited By: Mangal Yadav
 Published : Aug 08, 2025 10:56 am IST,  Updated : Aug 08, 2025 12:18 pm IST

इलाहाबाद हाई कोर्ट के सभी 13 जजों ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखा है। हाई कोर्ट के एक जज से क्रिमिनल मामलों की सुनवाई से अधिकार छीनने को लेकर यह पत्र लिखा गया है।

सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट। फाइल फोटो- India TV Hindi
सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट। फाइल फोटो Image Source : ANI

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने अपने 4 अगस्त के आदेश से दो पैराग्राफ हटा दिए हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार को आपराधिक मामलों की सुनवाई से अलग रखने के अपने आदेश को जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने वापस ले लिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उनकी मंशा इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के प्रशासनिक अधिकारों में हस्तक्षेप करने की नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट को भेज दिया। 

जस्टिस पारदीवाला ने कही ये बात

जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि उनका उद्देश्य संबंधित न्यायाधीश को शर्मिंदा करना या उन पर व्यक्तिगत टिप्पणी करना नहीं था। उन्होंने कहा कि जब भी किसी जज के अच्छे निर्णय सामने आते हैं, उन्होंने उनकी सराहना की है। हाई कोर्ट कोई अलग इकाई नहीं है जिसे अलग रखा जा सके; न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना ही सर्वोच्च लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि न्याय मांगने वालों की अपेक्षा रहती है कि फैसला कानून के अनुसार मिले, और जब भी कोई मामला “रूल ऑफ लॉ” को प्रभावित करता है, सुप्रीम कोर्ट सुधारात्मक कदम उठाने के लिए बाध्य हो जाता है।

हाई कोर्ट के सभी जजों ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखी थी 

इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट के 13 मौजूदा जजों ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखी थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के 4 अगस्त के आदेश को लागू न करने की अपील की गई है। ये वही आदेश है जिसके तहत एक जज से क्रिमिनल मामलों की सुनवाई का अधिकार छीन लिया गया था।

चिट्ठी में क्या कहा गया?

हाई कोर्ट के सभी 13 जजों ने मांग की है कि हाई कोर्ट की फुल कोर्ट मीटिंग बुलाई जाए। इसमें चर्चा की जाए कि क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करना जरूरी है या नहीं। जजों का मानना है कि ये आदेश संवैधानिक मूल्यों और हाई कोर्ट की स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या था?

4 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जज की कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई थी। एक आपराधिक मामले में जमानत देने के तरीके पर सवाल उठाए थे। इससे कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक दीवानी मामले में आपराधिक कार्यवाही की अनुमति देने के लिए इलाहबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश के प्रति नाराजगी जताई थी। 

न्यायमूर्ति जे.बी.पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने चार अगस्त को एक अभूतपूर्व आदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश को आपराधिक मामले न सौंपने का निर्देश दिया था, क्योंकि उन्होंने एक दीवानी विवाद में आपराधिक प्रकृति के समन को “गलती से” बरकरार रखा था। इसी पीठ ने एक अन्य मामले में उच्च न्यायालय के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। पीठ ने कहा, "इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक और आदेश है जिससे हम निराश हैं।

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने आदेश में कही ये बात

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने छह अगस्त के आदेश में कहा, “सबसे पहले विषय-वस्तु पर गौर करना बहुत जरूरी होता है। उसके बाद अदालत को संबंधित मुद्दे पर गौर करना चाहिए। अंत में, अदालत को वादी की दलील पर गौर करना चाहिए और फिर कानून के सही सिद्धांतों को लागू करना चाहिए।” न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय का आदेश कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है और स्थापित न्यायशास्त्र के प्रति उपेक्षा दर्शाता है। 

(ANI इनपुट के साथ)

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