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दिवाली के दूसरे दिन बैलों की जगह गधों की पूजा, क्यों दिया गया VIP ट्रीटमेंट; जानें वजह

Edited By: Khushbu Rawal @khushburawal2 Published : Oct 23, 2025 10:28 am IST, Updated : Oct 23, 2025 10:29 am IST

भीलवाड़ा जिले के माण्डल कस्बे में गोवर्धन पूजा के दिन बुधवार की देर रात गधों की पूजा का बड़ा आयोजन हुआ जहां कुम्हार समाज के लोगों ने गोवर्धन पूजा के दिन गधों को नहला-धुला कर बड़े ही सुंदर तरीके से सजाने के बाद उनकी पूजा-अर्चना की।

donkey worship- India TV Hindi
Image Source : REPORTER INPUT भीलवाड़ा के मांडल में गधों की पूजा।

भीलवाड़ा: दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट और गोवर्धन पूजा पर देश के अधिकतर हिस्सों में बैलों की विधि विधान से पूजा की जाती है लेकिन भीलवाड़ा जिले के माण्डल कस्बे में गोवर्धन पूजा के दिन बुधवार की देर रात गधों की पूजा का बड़ा आयोजन हुआ जहां कुम्हार समाज के लोगों ने गोवर्धन पूजा के दिन गधों को नहला-धुला कर बड़े ही सुंदर तरीके से सजाने के बाद उनकी पूजा का भव्य आयोजन कर वैशाख नंदन (गधों) की परंपरागत तरीके से पूजा अर्चना की।

गधों की पूजा के पीछे वजह क्या?

माण्डल कस्बे वासी बताते हैं कि किसान बैल की पूजा करते हैं, उसी प्रकार कुम्हार (प्रजापति) समाज के लोग गधों की पूजा सालों से करते आ रहे हैं क्योंकि प्रजापति समाज के लिए गधे ही रोजी-रोटी का बड़ा साधन है। गधे तालाब से मिट्टी ढोकर लाते हैं इसलिए सालों से यह परंपरा माण्डल कस्बे में निभाई जा रही है। 

गधों को दिया जाता है वीआईपी ट्रीटमेंट

गोवर्धन पूजा के दिन रात्रि 9:00 बजे के करीब माण्डल कस्बे में गधे की पूजा के लिए पूरा कुम्हार समाज एक जगह इकट्ठा होता है जहां कस्बे के प्रताप नगर क्षेत्र में गधों को नहला-धुला कर सजाया जाता है। इन पर रंग-बिरंगे कलर लगाए जाते हैं। फिर इनको माला पहना कर पहले चौक में लाया जाता है। वहां पंडित पूजा-अर्चना के बाद इनका गुड से मुंह मीठा कराते हैं। इसके बाद उनके पैरों में पटाखे डालकर इनको भड़काया जाता है फिर इनकी दौड़ संपन्न कराई जाती है। गधों की पूजा के अनूठे आयोजन को देखने के लिए माण्डल के आसपास के लोग भी आते हैं।

देखें वीडियो-

70 साल से कर रहे गधों की पूजा

माण्डल कस्बे के निवासी गोपाल कुम्हार ने कहा कि बैसाख नंदन पर्व माण्डल में लगभग 70 सालों से मनाते आ रहे हैं। हमारे पूर्वज पहले हर घर में गधे रखते थे, उससे हमारी रोज़ी-रोटी चलती थी लेकिन अब जैसे-जैसे साधन बढ़ रहे हैं इनकी संख्या कम होती जा रही है। फिर भी इनको हम भूले नहीं और हमारे पूर्वज दीपावली पर इनको पूजते थे उसी परंपरा को निभाते हुए हम भी इनको पूजते हैं। जिस प्रकार किसान अपने बैलों की पूजा करते है, इस प्रकार हम कुम्हार समाज के लोग परंपरा को बनाए रखे हुए हैं। 

(रिपोर्ट- सोमदत्त त्रिपाठी)

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