Religious importance of Rangoli:
फूलों ने रंगों से रंगोली सजाई,
सारी धरती यह महकायी ।
चरणों में बहती है गंगा की धरा,
आरती का दीपक लगे हर एक सितारा ।
पुरवैया देखो चवर कैसे झुलाए,
ऋतुएँ भी माता का झुला झुलायें ।
पा के भक्ति का धन, हुआ पावन यह मन,
कर के तेरा सुमिरन, खुले अंतर नयन,
तन मन में भक्ति ज्योति तेरी, हे माता जलती रहे ॥
आपने मशहूर गायक अनुराधा पौडवाल और सोनू निगम की आवाज में माता रानी का प्रसिद्ध भजन'आए तेरे भवन, दे दे अपनी शरण' सुना ही होगी, जिसकी चंद पंक्तियां हमने यहां ली है। इस भजन में भी कितनी खूबसूरती से रंगोली की अहमियत बताई गई है। नवरात्रि के दौरान रंगोली बनाने का खास महत्व होता है। नवरात्रि के महापर्व पर लोग मातारानी के आगमन की तैयारियां करते हैं, जिसमें पंड़ालों की सजावट, घरों की साफ-सफाई और रंग-लोगन किया जाता है।
कई तरह की द्वार तोरण आदि लगाए जाते हैं। इसके साथ ही माता के स्वागत में घरों और पंडालों में रंग-बिरंगी रंगोली बनाई जाती है। शुभ अवसरों पर रंगोली बनाने की खास महत्व है। हिंदू धर्म में नवरात्रि समेत सभी त्योहारों और शुभ अवसरों पर घर के आंगन और मुख्य दरवाजे पर रंगोली सजाने की परंपरा है, जो सदियो से चली आ रही है। चलिए जानते हैं इसका इतना महत्व होता है।
शुद्धता, समृद्धि और शुभ ऊर्जा का प्रतीक
नवरात्रि के शुभ अवसर पर रंग-बिरंगी रंगोली सजाने की परंपरा बहुत पुरानी है। यह सिर्फ घर को सुंदर बनाने का तरीका नहीं, बल्कि देवी दुर्गा को आमंत्रित करने और सकारात्मक ऊर्जा को घर में लाने का एक प्रतीकात्मक साधन है। रंगोली केवल सजावट नहीं है, बल्कि शुद्धता, समृद्धि और शुभ ऊर्जा को आकर्षित करने का महत्वपूर्ण कारण भी है।
रंगोली का आध्यात्मिक महत्व
नवरात्रि में बनाई जाने वाली आकृतियों और चिह्नों का अपना आध्यात्मिक महत्व होता है। मान्यता है कि रंगोली से घर की नकारात्मकता दूर होती है। रंगोली शब्द संस्कृत के रंग और आवली से मिलकर बना है, जिसका मतलब होता है रंगों की पंक्ति। नवरात्रि में महिलाएं अपने घर आंगन में हर दिन नई-नई डिजाइन की रंगोली उकेरती हैं, जिसका उद्देश्य देवी दुर्गा को आमंत्रित करना है, ताकि हमारे घर-परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहे। आटे, फूल और रंगोली के विभिन्न रंगों से बनी सुंदर आकृतियां देवी ऊर्जा और ब्रह्मांडीय शक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
त्योहार रंगोली के बिन अधूरे
रंगोली बनाने की शुरुआत किसी निश्चित महीने से नहीं होती है। हालांकि, वर्षा ऋतु के जाने और हिंदू कैलेंडर के अनुसार अश्विन माह में नवरात्रि के साथ ही इसकी शुरुआत हो जाती है। इसके बाद, दिवाली, मकर संक्रांति, पोंगल और ओणम आदि प्रमुख त्योहारों में रंगोली बनाई जाती हैं। हालांकि, भारत के गांवों में आज भी नवरात्रि से हर दिन घर के आंगन में रंगोली बनाई जाती है।
रंगोली ध्यान और भक्ति का माध्यम
रंगोली को बनाने की जिम्मेदारी ज्यादातर महिलाएं निभाती हैं। रंगोली उनकी रचनात्मकता, धैर्य और सौंदर्यबोध को दर्शाती है। रंगोली बनाना केवल कला नहीं, बल्कि साधना और प्रार्थना भी है। परंपरा के अनुसार महिलाएं सुबह-सुबह उठकर मंत्रोच्चार करते हुए रंगोली बनाती हैं। इस दौरान उनका पूरा ध्यान देवी की पूजा और घर में सुख-शांति लाने पर होता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
नवरात्रि की रंगोली लोगों को जोड़ने का भी काम करती है। परिवार और पड़ोस की महिलाएं और बच्चे मिलकर रंगोली बनाते हैं, जिससे एकता और सहयोग की भावना बढ़ती है। अलग-अलग राज्यों में रंगोली की अपनी-अपनी शैली है। भले ही देश के हर राज्य में इसका रूप अलग हों, लेकिन उद्देश्य एक ही है देवी का स्वागत।
शक्ति और स्त्री ऊर्जा का प्रतीक
इसे देवी शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इस तरह नवरात्रि की रंगोली शक्ति और नारीत्व का उत्सव भी बन जाती है। नवरात्रि के इन नौ दिनों में रंगोली बनाना वास्तव में भक्ति, सौंदर्य और संस्कृति का संगम है।
रंगों और सामग्री का महत्व
रंगोली बनाने में उपयोग होने वाली चीजें भी शुभ मानी जाती हैं। गेहूं का आटा, चावल का आटा, हल्दी, कुमकुम, सिंदूर और फूलों की पंखुड़ियां इसमें शामिल होती हैं। हर रंग का अपना महत्व है। लाल रंग शक्ति और संरक्षण का, पीला ज्ञान का, हरा विकास और उर्वरता का, जबकि नीला ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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