Tuesday, January 13, 2026
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Shatila Ekadashi Vrat Katha: षटतिला एकादशी व्रत के दिन पढ़ें ये कथा, हर पाप से मिलेगा छुटकारा, धन-धान्य से भर जाएगा घर

Shatila Ekadashi Vrat Katha In Hindi: षटतिला एकादशी व्रत कथा के बिना एकादशी की पूजा पूरी नहीं मानी जाती है। ऐसे में षटतिला एकादशी के दिन इस कथा को जरूर सुनें।

Written By: Vineeta Mandal
Published : Jan 13, 2026 08:34 pm IST, Updated : Jan 13, 2026 08:34 pm IST
षटतिला एकादशी व्रत कथा- India TV Hindi
Image Source : FILE IMAGE षटतिला एकादशी व्रत कथा

Shatila Ekadashi Vrat 2026: षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी, बुधवार के दिन किया जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है। एकादशी का व्रत करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और नारायण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। षटतिला एकादशी का व्रत हर साल माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। षटतिला एकादशी के दिन तिल का छ: तरीकों से प्रयोग किया जाता है। इस दिन तिल मिश्रित जल से स्नान करने, तिल का उबटन लगाने, तिल से हवन करने, तिल मिश्रित जल का सेवन करने, तिल का भोजन करने और तिल का दान करने का विधान है।

षटतिला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा में भी विशेष रूप से तिल का इस्तेमाल किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है और उसे जीवन में वैभव प्राप्त होता है। साथ ही सुख-सौभाग्य, धन-धान्य में वृद्धि होती है और आरोग्यता की प्राप्ति होती है। अगर आप एकादशी का व्रत रख रहे हैं तो इस दिन षटतिला एकादशी व्रत की कथा जरूर सुनें। इस कथा के बिना षटतिला एकादशी का व्रत पूरा नहीं माना जाता है।

षटतिला एकादशी की व्रत कथा

एक बार भगवान विष्णु ने नारद जी को एक सत्य घटना से अवगत कराया और नारदजी को एक षटतिला एकादशी के व्रत का महत्व बताया। इस एकादशी को रखने की जो कथा भगवान विष्णु जी ने नारद जी को सुनाई वह इस प्रकार से है-

प्राचीन काल में पृथ्वी लोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह हमेशा व्रत करती थी लेकिन किसी ब्राह्मण अथवा साधु को कभी दान आदि नहीं देती थी। एक बार उसने एक माह तक लगातार व्रत रखा। इससे उस ब्राह्मणी का शरीर बहुत कमजोर हो गया था। तब भगवान विष्णु ने सोचा कि इस ब्राह्मणी ने व्रत रख कर अपना शरीर शुद्ध कर लिया है अत: इसे विष्णु लोक में स्थान तो मिल जाएगा परन्तु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया। इससे ब्राह्मणी की तृप्ति होना कठिन है। इसलिए भगवान विष्णु ने सोचा कि वह भिखारी का वेश धारण करके उस ब्राह्मणी के पास जाएंगे और उससे भिक्षा मांगेंगे।

यदि वह भिक्षा दे देती है तब उसकी तृप्ति अवश्य हो जाएगी और भगवान विष्णु भिखारी के वेश में पृथ्वी लोक पर उस ब्राह्मणी के पास जाते हैं और उससे भिक्षा मांगते हैं। वह ब्राह्मणी विष्णु जी से पूछती है - महाराज किसलिए आए हो? विष्णु जी बोले मुझे भिक्षा चाहिए। यह सुनते ही उस ब्राह्मणी ने मिट्टी का एक ढे़ला विष्णु जी के भिक्षापात्र में डाल दिया। विष्णु जी उस मिट्टी के ढेले को लेकर स्वर्गलोक में लौट आये।

कुछ समय के बाद ब्राह्मणी ने अपना शरीर त्याग दिया और स्वर्ग लोक में आ गई। मिट्टी का ढेला दान करने से उस ब्राह्मणी को स्वर्ग में सुंदर महल तो मिल गया परन्तु उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था इसलिए महल में अन्न आदि से बनी कोई सामग्री नहीं थी। वह घबराकर विष्णु जी के पास गई और कहने लगी कि हे भगवन मैंने आपके लिए व्रत आदि रखकर आपकी बहुत पूजा की उसके बावजूद भी मेरे घर में अन्नादि वस्तुओं का अभाव है। ऐसा क्यों है? तब विष्णु जी बोले कि तुम पहले अपने घर जाओ।

तुम्हें मिलने और देखने के लिए देवस्त्रियां आएगी, तुम अपना द्वार खोलने से पहले उनसे षटतिला एकादशी की विधि और उसके महात्म्य के बारे में सुनना तब द्वार खोलना। ब्राह्मणी ने वैसे ही किया। द्वार खोलने से पहले षटतिला एकादशी व्रत के महात्म्य के बारे में पूछा। एक देवस्त्री ने ब्राह्मणी की बात सुनकर उसे षटतिला एकादशी व्रत के महात्म्य के बारे में जानकारी दी। उस जानकारी के बाद ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिए। देवस्त्रियों ने देखा कि वह ब्राह्मणी न तो गांधर्वी है और ना ही आसुरी है। वह पहले जैसे मनुष्य रुप में ही थी। अब उस ब्राह्मणी को दान ना देने का पता चला। अब उस ब्राह्मणी ने देवस्त्री के कहे अनुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इससे उसके समस्त पापों का नाश हो गया। अब उसका घर अन्नादि सभी प्रकार की वस्तुओं से भर गया। 

इस प्रकार मनुष्यों को अज्ञान को त्यागकर षटतिला एकादशी का उपवास करना चाहिए। इस एकादशी व्रत के करने वाले को जन्म-जन्म की निरोगता प्राप्त हो जाती है। इस उपवास से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।सभी मनुष्यों को लालच का त्याग करना चाहिए। किसी प्रकार का लोभ नहीं करना चाहिए।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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