हेलिकोबैक्टर पाइलोरी जिसे एच पाइलोरी के नाम से भी जाना जाता है। ये एक बैक्टीरिया है जो आमतौर पर पेट में पाया जाता है। दुनियाभर में करीब आधी से ज्यादा आबादी के पेट में ये बैक्टीरिया मौजूद है। कई बार इसके होने पर शरीर में कोई परेशानी या किसी तरह का लक्षण नजर नहीं आता है। कई बार सामान्य लक्षण जैसे ज्यादा गैस बनना, पेट फूलना या पेट भरा रहने जैसे लक्षण होते हैं जिन्हें लोग नजरअंदाज कर देते हैं। कई बार इसकी वजह से पाचन संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं जिसमें अल्सर और बहुत कम मामलों में पेट का कैंसर शामिल है।
क्रोनिक गैस्ट्राइटिस या ड्यूओडेनाइटिस से पीड़ित ज्यादातर लोगों में कोई लक्षण नहीं होते हैं। हालांकि, कुछ लोगों में पेट या ड्यूओडेनल अल्सर और कई दूसरी समस्याएं अधिक गंभीर हो जाती हैं। अल्सर कई तरह के लक्षण पैदा कर सकते हैं या बिल्कुल भी लक्षण पैदा नहीं कर सकते हैं, जिनमें से सबसे आम अल्सर के लक्षणों में शामिल हैं।
कम ही मामलों में क्रॉनिक गैस्ट्राइटिस के कारण पेट की परत में असामान्य बदलाव हो जाते हैं, जिससे कुछ प्रकार के कैंसर हो सकते हैं। एच पाइलोरी संक्रमण से कैंसर होना दुर्लभ है। फिर भी दुनिया भर में बहुत से लोग एच पाइलोरी से संक्रमित हैं, इसलिए इसे पेट के कैंसर का एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। जिन देशों में एच. पाइलोरी संक्रमण कम उम्र में होता है, वहां के लोगों को पेट के कैंसर का सबसे अधिक खतरा होता है।
हेलिकोबैक्टर पाइलोरी के बारे में काफी लोग अब जागरुक हो चुके हैं। जो आपको नहीं पता है वो ये है कि इसकी टेस्टिंग कैसे करनी है। तो इसके invasive test होते है। इनवेजिव का मतलब एंडोस्कोपी के जरिए इस बैक्टीरिया को टेस्ट किया जा सकता है। इसमें टेस्टिंग के लिए कल्चर किया जा सकता है। दूसरा तरीका होता है कि आप नॉन इनवेजिव टेस्ट करवा सकते हैं। जिसमें ब्लड टेस्ट शामिल होते हैं। दूसरा आपका स्टूल टेस्ट होता है और urea breath test होता है। क्योंकि ब्लड टेस्ट का सेंसिटिविटी और स्पेसिफिसिटी काफी लो होता है। वो पॉजिटिव केस को मिस कर सकता है। तो Urea breath test और stool antigen testing करना ज्यादा सेंसिटिव और सटीक होता है। ये टेस्ट पॉजिटि केस को मिस नहीं करते हैं। और नहीं गलत निकलते हैं। अगर आप ये टेस्ट करा रहे हैं तो करीब 2 हफ्ते पहले किसी भी तरह के एंटीबायोटिक और एंटीएसिड दवाओं का सेवन बंद कर दें।
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