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Flashback 2018: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सुनाए 6 अहम फैसले, जिनसे समाज में आएगा बड़ा बदलाव

सुप्रीम कोर्ट के लिहाज से साल 2018 ऐतिहासिक रहा। इस साल कोर्ट द्वारा सुनाए गए कई फैसले समानता और सशक्तिकरण की दिशा में नजीर बने। कई फैसले न सिर्फ रूढ़िवादी सोच के खिलाफ थे बल्कि आधुनिक समाज के हित में रहे।

IndiaTV Hindi Desk IndiaTV Hindi Desk
Published on: December 26, 2018 19:29 IST
Supreme Court- India TV Hindi
Supreme Court

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के लिहाज से साल 2018 ऐतिहासिक रहा। इस साल कोर्ट द्वारा सुनाए गए कई फैसले समानता और सशक्तिकरण की दिशा में नजीर बने। कई फैसले न सिर्फ रूढ़िवादी सोच के खिलाफ थे बल्कि आधुनिक समाज के हित में रहे। अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा ने ताबड़तोड़ कई ऐतिहासिक फैसले सुनाए। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराने व्यभिचार-रोधी कानून को रद्द कर दिया है और कहा है कि व्यभिचार अपराध नहीं है. तो दूसरी तरफ धारा 377 को रद्द करते हुए कहा कि अब समलैंगिकता अपराध नहीं है। कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर लगे बैन को भी हटा दिया। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे फैसले दिए जिनका बड़ा असर दिखेगा और इनसे भारतीय समाज में बड़ा बदलाव आएगा। आइए जानते हैं सुप्रीम कोर्ट के इन पांच अहम फैसलों के बारे में-

1. धारा 497 व्यभिचार (Adultery) कानून- सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराने व्यभिचार कानून को किया खत्‍म

सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ ने 27 सितंबर को भारतीय आचार दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 497 व्यभिचार (Adultery) कानून को खत्म कर दिया। देश के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (CJI) दीपक मिश्रा ने कहा कि यह कानून बेशक तलाक का आधार हो सकता है, लेकिन यह महिला के जीने के अधिकार पर भी असर डालता है। कोर्ट ने धारा 497 की व्याख्या करते हुए कहा कि इसके अनुसार पत्नी पति की संपत्ति मानी जाती है जो कि भेदभावपूर्ण है। जिस प्रावधान से महिला के साथ गैरसमानता का बर्ताव हो, वह असंवैधानिक है।

2. समलैंगिकता अपराध की श्रेणी से बाहर, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- समलैंगिकता अपराध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि दो वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से स्थापित समलैंगिक यौन संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं आ सकते। चीफ़ जस्टिस की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने एकमत से ये फ़ैसला सुनाया। करीब 55 मिनट में सुनाए इस फ़ैसले में धारा 377 को रद्द कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को अतार्किक और मनमानी बताते हुए कहा कि LGBT समुदाय को भी समान अधिकार है। धारा 377 के ज़रिए एलजीबीटी की यौन प्राथमिकताओं को निशाना बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन प्राथमिकता बाइलॉजिकल और प्राकृतिक है। अंतरंगता और निजता किसी की निजी च्वॉइस है इसमें राज्य को दखल नहीं देना चाहिए।

3. आधार की अनिवार्यता पर अहम फैसला
तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा ने सितंबर में कई ताबड़तोड़ फैसले सुनाए इनमें आधार की अनिवार्यता पर भी फैसला भी शामिल था। सुप्रीम कोर्ट ने आधार की संवैधानिकता को तो बरकरार रखा, लेकिन ये साफ कर दिया कि हर जगह आधार को लिंक कराना अनिवार्य नहीं होगा। इस पर 38 दिनों तक लंबी सुनवाई चली थी। कोर्ट ने साफ किया कि मोबाइल और निजी कंपनियां आधार की मांग नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने आंशिक बदलाव के साथ आधार अधिनियम की धारा 57 को हटा दिया।

4. महिलाओं के लिए खुले सबरीमाला के दरवाजे
केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 28 सितंबर को अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने महिलाओं की एंट्री पर लगे बैन को हटा दिया। पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि महिलाओं को भी पूजा करने का समान अधिकार है, इसे रोकना मौलिक अधिकार का हनन है। फिलहाल मंदिर में 10 साल से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा हुआ था।

5. राफेल डील पर मोदी सरकार को क्लीन चिट
14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया और मोदी सरकार को क्लीन चीट दे दी। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों ने एकमत से अपने फैसले में राफेल सौदे को लेकर सभी याचिकाएं खारिज कर दीऔर मोदी सरकार को पूरी तरह से क्लीन चिट दे दी। बता दें कि राफेल पर मोदी सरकार काफी समय से घिरी थी और विपक्ष ने इसे चुनावी हथियार बनाया था। कोर्ट ने कहा कि इस डील को लेकर कोई शक नहीं है और कोर्ट इस मामले में अब कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहती है। विमान खरीद प्रक्रिया पर भी कोई शक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि हमने राष्ट्रीय सुरक्षा और सौदे के नियम कायदे दोनों को जजमेंट लिखते समय ध्यान में रखा है। मूल्य और जरूरत भी हमारे ध्यान में हैं।

6. अयोध्या में जमीन के मालिकाना हक पर सुनवाई
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संवेदनशील राम मंदिर मसले पर सुनवाई की दिशा में कदम बढ़ा दिए। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सिर्फ जमीन के मालिकाना हक के वाद के रूप में ही विचार करने की बात करते हुए कहा कि इस मामले की जल्द से जल्द सुनवाई शुरू हो। सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि 4 जनवरी 2019 को इस मामले की सुनवाई होगी। गौरतलब है कि राम मंदिर पर फैसले का पूरे देश को काफी समय से इंतजार है। 

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