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विकलांग के बजाय “दिव्यांग” कहे जाने से क्या बदल पाई जिंदगी? सुनिए सामाजिक बदलाव की कहानी वर्ल्ड चैंपियंस की जुबानी

“विकलांग” से “दिव्यांग” शब्द में बदलाव ने क्या सिर्फ भाषा बदली या समाज की सोच में भी अंतर आया? इसी सवाल की पड़ताल के लिए INDIA TV ने पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट देवेंद्र झाझरिया, ब्लाइंड क्रिकेट टीम की कप्तान दीपिका टीसी और दिव्यांग राजीव सिंह से बात की।

Written By: Vinay Trivedi
Published : Dec 03, 2025 07:27 am IST, Updated : Dec 03, 2025 07:45 am IST
international day of persons with disabilities- India TV Hindi
Image Source : PTI विकलांग के बजाय “दिव्यांग” कहे जाने ने समाज में क्या कुछ बदलाव लाया।

नई दिल्ली: दुनिया भर में हर साल 3 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस यानी International Day Of Persons With Disabilities मनाया जाता है। यह एक ऐसा दिन, जो उन लाखों लोगों के हौसलों, चुनौतियों और अधिकारों की याद दिलाता है, जिन्हें समाज अक्सर नजरों से ओझल करने की कोशिश करता है। भारत में ही 2011 की जनगणना के मुताबिक, 2.68 करोड़ से अधिक दिव्यांगजन हैं। लेकिन दिलचस्प बात है कि “दिव्यांग” शब्द हमेशा से हमारी डिक्शनरी में नहीं था। एक जमाना था जब इन्हें ''विकलांग'' कहा जाता था, और 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से “दिव्यांग” शब्द अपनाने की अपील ने देश में एक नई बहस छेड़ दी। अब सवाल है कि क्या सिर्फ एक शब्द के बदलने से सोच भी बदली? क्या यह सिर्फ भाषा में सुधार था, या फिर समाज के रवैये को नई दिशा देने का प्रयास? क्या इस परिवर्तन ने दिव्यांग लोगों की जिंदगी में कोई वास्तविक अंतर लाया? इन सवालों के जवाब जानने के लिए INDIA TV ने बात की पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और 2 बार के पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट देवेंद्र झाझरिया, वर्ल्ड कप जीतने वाली भारत की महिला ब्लाइंड क्रिकेट टीम की कैप्टन दीपिका टीसी, और दिव्यांग अधिकारों पर मुखर आवाज राजीव सिंह से ताकि समझ सकें कि विकलांग की जगह ''दिव्यांग'' कहे जाने से जिंदगी कितनी बदली, और कितना बदलाव अभी बाकी है।

ब्लाइंड क्रिकेट टीम की कैप्टन ने PM मोदी से कही बड़ी बात

भारतीय महिला ब्लाइंड क्रिकेट टीम की कैप्टन दीपिका टीसी ने INDIA TV से बातचीत में कहा कि PM मोदी ने जब 2015 में ''विकलांग'' लोगों को ''दिव्यांग'' कहे जाने की अपील की थी तब मेरी उम्र काफी कम थी। मैं तब नहीं समझ पाई थी कि इससे हमें कितना फर्क पड़ेगा। लेकिन वर्ल्ड कप में जीतने के बाद जब मेरी मुलाकात PM मोदी से हुई तो मैंने उनसे ये जरूर कहा था कि सर हम लोग अपनी Disability को Disability नहीं समझते हैं बल्कि हम इसे Ability समझते हैं। शायद PM मोदी को पहले भी हमारे जैसे कई दिव्यांग लोगों ने ये बात बोली होगी तभी उन्होंने ''विकलांग'' शब्द को ''दिव्यांग'' में बदलने का फैसला किया होगा।

मैं जैसी हूं, वैसा ही खुद को पसंद करती हूं- दीपिका टीसी

दीपिका टीसी ने आगे कहा कि मैं आपको अपने उदाहरण से समझाना चाहती हूं। मैं क्लास 1 से 4 तक नॉर्मल बच्चों के साथ स्कूल में पढ़ी हूं। हम लोग तब साथ में ही खेलते थे। एक बार जब मैं उनके साथ खेलने गई तो उन्होंने मुझे टोक दिया। उन बच्चों ने मुझसे कहा था कि जब तुम्हे ठीक से दिखता नहीं है तो हमारे साथ खेलने क्यों आईं। उस बात को सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा था। मैं घर जाकर अपनी मां के सामने बहुत रोई थी। लेकिन आज जब अपनी शारीरिक परेशानी के बावजूद भी मैं क्रिकेटर के तौर पर सफल हुई तो मैंने इस बात का एहसास किया कि मैं भी अपनी क्लास के बाकी बच्चों की तरह नॉर्मल होती तो शायद यहां तक नहीं पहुंचती। उनकी तरह अपने Comfort Zone में रहती और आगे नहीं बढ़ पाती। तो मैं इसे अपनी Ability ही समझती हूं। मैं जैसी हूं, वैसा ही खुद को पसंद करती हूं। मुझे खुद पर गर्व है।

PM मोदी ने सिर्फ कहा नहीं, करके भी दिखाया- देवेंद्र झाझरिया

इस मुद्दे पर पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष देवेंद्र झाझरिया ने भी INDIA TV से बातचीत की। सबसे पहले ये जान लीजिए कि देवेंद्र झाझरिया पद्मश्री, पद्म भूषण, अर्जुन अवॉर्ड और मेजर ध्यानचंद खेल रत्न अवॉर्ड से सम्मानित हो चुके हैं। देवेंद्र झाझरिया ने पैरालंपिक में भारत के लिए 2 बार गोल्ड मेडल और 1 बार सिल्वर मेडल जीता है। ''विकलांग'' की जगह ''दिव्यांग'' कहे जाने की PM मोदी की अपील पर बात करते हुए देवेंद्र झाझरिया ने कहा कि प्रधानमंत्री ने ये आग्रह अपने मन की बात कार्यक्रम में किया था। हमारे काफी WhatsApp ग्रुप होते हैं। जब प्रधानमंत्री ने हमारे लिए ''दिव्यांग'' शब्द कहा था तो उनकी इस बात पर सभी दिव्यांग खिलाड़ियों ने WhatsApp ग्रुप में बधाई दी थी क्योंकि वह हमारे लिए बहुत बड़ा दिन था। उसके बाद से हमें कोई विकलांग नहीं कहता, हमें सब दिव्यांग कहते हैं। और हमारे प्रधानमंत्री सिर्फ कहते नहीं हैं, वह करके भी दिखाते हैं। स्पोर्ट्स में Target Olympic Podium Scheme में बदलाव हुआ है। अब खिलाड़ियों के पास सिर्फ फाइनेंशली फ्रीडम ही नहीं बल्कि उनको ट्रेनिंग की आजादी भी है। अब वह अपना कोच ले सकते हैं। जहां ट्रेनिंग करना चाहें, वहां वह कर सकते हैं। PM मोदी का कहना है कि हमें तो बस देश के लिए मेडल जिताओ आप। दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए जितनी सुविधाएं भारत में हैं, उतनी तो दुनिया के बहुत सारे देशों में नहीं हैं। कैश अवॉर्ड देने के मामले में हम टॉप 5 देशों में हैं।

Para खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं में हुआ बड़ा इजाफा

देवेंद्र झाझरिया ने बताया कि अभी हाल में दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में World Para Athletics Championships 2025 हुई। इसकी मेजबानी हमें PM मोदी की वजह से मिली। पूरी दुनिया को पता है कि वह दिव्यांगों के लिए कितना काम कर रहे हैं। जब हमने World Para Athletics Championships 2025 की मेजबानी का दावा किया था, तो उसकी प्रेजेंटेशन में हमने दुनिया को बताया था कि PM मोदी Para खिलाड़ियों के लिए कैसा काम करते हैं। इस इवेंट में 106 देशों के लगभग 1400 एथलीट्स ने भाग लिया। मेरा एक सपना होता था कि हिंदुस्तान में मैं Mondo Track पर ट्रेनिंग करूं। ये सुविधा अभी कुछ दिनों पहले तक देश में नहीं थी। लेकिन भारत अब 25वां ऐसा राष्ट्र है जहां एथलीट्स की ट्रेनिंग के लिए Mondo Track है। पिछले खेल दिवस पर इसका उद्घाटन हुआ था। इससे आप समझ सकते हैं कि देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर कितना बढ़ रहा है। Para खिलाड़ियों को कितनी सुविधाएं मिल रही हैं। पहले जब मैं खुद खिलाड़ी के तौर पर इंडिया के कैंप में जाता था तो पंखे के नीचे सोना पड़ता था। लेकिन आज हमारे जूनियर बच्चों को भी AC मिल रहा है। खेलो इंडिया में जो बच्चे NCOE के ट्रेनिंग सेंटर में जाते हैं, उन्हें 8 लाख रुपये की सालाना सुविधा मिल रही है। इसके अलावा, उन्हें सालाना 25 हजार रुपये की किट मिल रही है। यहां तक कि पॉकेट मनी भी उस खिलाड़ी को मिलती है। Para खिलाड़ियों के लिए ये सबकुछ मोदी सरकार में हुआ है।

जब देवेंद्र झाझरिया ने पहली बार सामान्य खिलाड़ियों को दी मात

उन्होंने आगे कहा कि मैं अपनी बात करूं तो 10 साल की उम्र में मुझे बिजली का करंट लग गया था और इस वजह से मुझे अपना बायां हाथ गंवाना पड़ा था। जब मैं स्कूल में पढ़ता था 9वीं कक्षा में, तब मुझे पहली बार लगा कि मुझे स्पोर्ट्स में जाना चाहिए। इसके पीछे की कहानी ये है कि जब मैं अपना हाथ गंवाने के बाद हॉस्पिटल से वापस आया था तो हर किसी ने यही कहा कि अब देवेंद्र क्या करेगा। इसका तो हाथ ही नहीं है। वे लोग मेरे लिए बेचारा और कमजोर जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे। लेकिन एक वक्त के बाद मुझे हमदर्दी चुभने लगी। तब मैंने ठान लिया कि मैं खेल के माध्यम से दुनिया को दिखाऊंगा कि मैं सबसे मजबूत हूं। मैं उस समय सरकारी स्कूल में पढ़ता था। उस स्कूल में थोड़ा-बहुत स्पोर्ट्स का माहौल था। वहां तीन-चार गेम ही होते थे तो मैंने उनमें से जैवलिन थ्रो को चुना। शुरुआत में मेरे पास भाला नहीं था। तब मैंने लकड़ी का भाला बनाया था। और उसी लकड़ी के भाले से मैं डिस्ट्रिक्ट का चैंपियन बना था। और ये प्रतियोगिता मैंने सामान्य एथलीट्स के साथ गेम खेलकर जीती थी। और जब मैं डिस्ट्रिक्ट का चैंपियन बना तो मेरे दिमाग में सबसे पहली बात यही आई कि अब मुझे कोई कमजोर नहीं कहेगा।

दिव्यांगजनों की जिंदगी में जमीन पर क्या बदला?

मशहूर हो चुके लोगों के बाद INDIA TV ने दिव्यांगों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले राजीव सिंह से भी बात की जो खुद भी दिव्यांग हैं। उनसे बातचीत में हमने समझने की कोशिश की कि बड़े खिलाड़ियों से इतर एक आम दिव्यांग के जीवन में क्या फर्क आया। राजीव सिंह बताते हैं कि उन्होंने 2014 के पहले की सरकारें भी देखी हैं और अब की सरकार भी देख रहे हैं। 2015 में जब से PM मोदी ने ''विकलांग'' की जगह ''दिव्यांग'' शब्द का इस्तेमाल करने की अपील की है, उससे समाज और सरकार दोनों के नजरिए में काफी कुछ बदला है। पहले जैसे हमको विकलांग कहा जाता था तो उसमें लाचार और मजबूर होने का भाव आता था। सरकार और समाज दोनों हमें इसी नजर से देखते थे। हमारे लिए कोई खास सुविधा नहीं थी। लेकिन अब इसमें काफी सुधार हुआ है। दिव्यांगों को ट्राई साइकिल देने में पहले के मुकाबले काफी इजाफा हुआ है। अब तो बैटरी चालित ट्राई साइकिल दी जा रही हैं। इसके अलावा, हर जगह चाहे स्कूल हो, अस्पताल हो, स्टेशन हो या कोई और सार्वजनिक जगह, हर जगह दिव्यांगों की सुविधा के लिए रैंप बने हुए हैं। इसकी वजह से हर दिव्यांग खुद अपनी ट्राई साइकिल पर बैठकर हर जगह पहुंच सकता है, उसे किसी दूसरे की मदद की जरूरत नहीं पड़ती है। मैं ये भी बताना चाहता हूं कि मैं यूपी के सीतापुर में रहता हूं। अब जब मैं या मेरा कोई अन्य दिव्यांग साथी खाद लेने जाता है तो हमको सामान्य किसानों की तरह लाइन में नहीं लगना पड़ता है। हम जैसे ही अपना दिव्यांग वाला सर्टिफिकेट दिखाते हैं तो कर्मचारी हमारी ट्राई साइकिल पर ही खाद रिसीव करवा देते हैं। ऐसा पहले के जमाने में नहीं होता था, तब घंटों लाइन में लगना पड़ता था।

PM मोदी के कहने से कैसे बदला प्रशासन का रवैया

राजीव सिंह ने आगे कहा कि कृत्रिम अंग लगाने के लिए भी बड़ी पहल हो रही है। समय-समय पर ब्लॉक स्तर पर कैंप लगाए जाते हैं। सरकार और अधिकारियों के रवैये में दिव्यांगों के प्रति बदलाव का एक और बड़ा कारण है। वो ये है कि PM मोदी जब खुद दिव्यांगों का नाम लेकर कोई बात उठाते हैं तो वह सीधे हर अधिकारी तक पहुंचती है। अधिकारी भी फिर उस योजना को दिव्यांगों तक पहुंचाने में सजग रहते हैं। पहले की सरकारें हमारे लिए योजनाएं निकालती थीं लेकिन उनका प्रचार-प्रसार ज्यादा ना होने की वजह से प्रशासन भी सुस्त रहता था। हम अखबार की कटिंग लेकर दफ्तर-दफ्तर भटकते रहते थे लेकिन कई बार तब भी काम नहीं हो पाता था।

एक शब्द के बदलाव ने ऐसे दिया आत्मविश्वास

समाज की बात करें तो अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो दिव्यांग को भला-बुरा कह ही देते हैं, लेकिन विकलांगों के दिव्यांग बनने के बाद हमारा हर साथी अपने आप में कॉन्फिडेंस महसूस करता है। हम खुद से ये सवाल करते हैं कि अगर भगवान ने हमसे कोई अंग छीना है तो उसके बदले में कौन सी ऐसी कला दी है, जिसके दम पर हम अपनी पहचान बना सकते हैं। हमारे कई दिव्यांग साथी मूर्तिकला, पेंटिंग और अन्य कलाओं में सामान्य लोगों से भी ज्यादा पारंगत हैं। जब कोई दिव्यांग ऐसा काम करता है तो उसे समाज भी सम्मान की नजर से देखता है।

सिर्फ शब्द का बदलाव नहीं यह सम्मान की तरफ एक कदम

दिव्यांगजनों से बातचीत में पता चला कि “विकलांग” शब्द अभाव और अक्षमता की याद दिलाता है, लेकिन इसके उलट “दिव्यांग” जिसका मतलब है दिव्य अंग वाला व्यक्ति, सकारात्मकता का मैसेज देता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत की कुल जनसंख्या में करीब 2.21 फीसदी लोग दिव्यांग हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत में कुल 2.68 करोड़ लोग दिव्यांग हैं, जिनमें करीब 1.50 करोड़ पुरुष और 1.18 करोड़ महिलाएं शामिल हैं। ये दिव्यांगता कितने प्रकार की है, इसकी बात करें तो इसमें

  • दृष्टि बाधित
  • वाणी बाधित
  • श्रवण बाधित
  • मानसिक बीमारी
  • चलने-फिरने में बाधा (Locomotor Disability)
  • बौद्धिक अक्षमता (Mental Retardation) और अन्य प्रकार की दिव्यांगता शामिल है।

कई दिव्यांगजनों का मानना है कि दिव्यांग शब्द ने लोगों की नजर में सम्मान बढ़ाया। इसने बातचीत में संवेदनशीलता लाई और लोगों ने पहले के मुकाबले अधिक सम्मानजनक भाषा अपनाई। यह बदलाव सरकार के स्तर पर भी हुआ। विकलांगजन सशक्तिकरण विभाग का नाम बदलकर दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग कर दिया गया। यह बदलाव PM मोदी की तरफ से 27 दिसंबर, 2015 को उनके रेडियो प्रोग्राम ''मन की बात'' में दिए गए उस बयान के करीब 5 महीने बाद हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था कि Person With Disability में एक “दिव्य क्षमता” होती है, इसलिए अब से उनके लिए ''विकलांग'' की जगह ''दिव्यांग'' शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

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