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प्लॉट का कब्जा न देने पर सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डर को दी ऐसी सजा..., बाकी भी डरेंगे

Reported By : Atul Bhatia Edited By : Subhash Kumar Published : Sep 26, 2025 06:24 am IST, Updated : Sep 26, 2025 08:50 am IST

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में बिल्डरों को बड़ा झटका दिया है। बिल्डर को प्लॉट का कब्जा दिलाने में देरी करने पर कड़ी सजा मिली है। कोर्ट कहा है कि खरीदारों को 18% ब्याज मिलेगा।

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Image Source : PTI बिल्डर्स को सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा झटका।

सुप्रीम कोर्ट ने घर खरीदारों को बड़ी राहत देते हुए कहा है कि यदि कोई बिल्डर खरीदार से भुगतान में देरी होने पर 18 प्रतिशत ब्याज वसूलता है, तो उसे भी उतना ही ब्याज चुकाना होगा, अगर वो समय पर मकान या प्लॉट का कब्जा देने में विफल रहा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई कानूनी सिद्धांत नहीं है कि बिल्डर द्वारा खरीदार से वसूला गया ब्याज खरीदार को नहीं दिया जा सकता।

12 साल बाद भी नहीं मिला प्लॉट का कब्जा

मामला 2006 का है जब अपीलकर्ता ने एक प्लॉट बुक किया और 28 लाख रुपये से ज्यादा की राशि का भुगतान किया। इसके बावजूद बिल्डर ने मई 2018 तक प्लॉट का कब्जा नहीं दिया। लंबे इंतजार और उत्पीड़न के बाद खरीदार ने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई और जमा राशि के साथ ब्याज वापसी की मांग की।

एनसीडीआरसी ने दिया था 9 प्रतिशत ब्याज

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने इस मामले में खरीदार को 9 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का आदेश दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए जी मसीह शामिल थे, ने इस ब्याज दर को अपर्याप्त माना। बेंच ने कहा कि इतने लंबे इंतजार और उत्पीड़न के बाद 9 प्रतिशत ब्याज न्यायसंगत नहीं है।

बिल्डर को भी झेलने होंगे वही नियम

कोर्ट ने कहा कि यदि बिल्डर खरीदार से देरी होने पर 18 प्रतिशत ब्याज वसूल सकता है, तो उसे भी उतना ही ब्याज देना होगा जब वह खुद डिफॉल्ट करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह हर मामले में नियम  लागू नहीं होगा, लेकिन इस विशेष मामले में न्याय और समानता यही मांगते हैं। यदि ऐसा न किया गया तो यह खरीदार के साथ अन्याय होगा और गलत सौदे को बढ़ावा मिलेगा।

खरीदारों की जीत, बिल्डर को दो महीने की मोहलत

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि बिल्डर को जमा राशि के साथ 18 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा और यह राशि दो महीने के भीतर लौटानी होगी। कोर्ट ने कहा कि खरीदार को एक दशक तक इंतजार करना पड़ा, जिससे उसे मानसिक परेशानी और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। ऐसे हालात में 9 प्रतिशत ब्याज पर्याप्त नहीं था।

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