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Holi 2023: 7 या 8 कब है होली? जानिए होलिका दहन का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Written By: Sushma Kumari @ISushmaPandey Published : Mar 01, 2023 12:32 pm IST, Updated : Mar 01, 2023 12:33 pm IST

Holi 2023: धार्मिक मान्यता के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन स्नान-दान कर उपवास रखने से मनुष्य के दुखों का नाश होता है और उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है।

Holi 2023- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV Holi 2023

Holi 2023: हिंदू पंचाग के अनुसार होली हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। हिंदुओं का प्रमुख त्योहार होली 2 दिन मनाया जाने वाला बेहद ही रंगीन और खुशियों भरा त्यौहार है। इस त्योहार के पहले दिन होलिका दहन मनाया जाता है और दूसरे दिन रंगों वाली होली खेली जाती है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंग, अबीर, गुलाल लगाते हैं और बधाई एवं शुभकामनाएं देते हैं। वहीं धार्मिक मान्यता के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन स्नान-दान कर उपवास रखने से मनुष्य के दुखों का नाश होता है और उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई का दिन के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि होली कब है? होलिका दहन कब है और होलिका दहन का समय क्या है?

शुभ मुहूर्त

  • फाल्गुन माह पूर्णिमा तिथि का आरंभ: 6 मार्च 2023 को 4 बजकर 17 मिनट से
  • फाल्गुन माह पूर्णिमा तिथि का समापन: 7 मार्च 06 बजकर 09 मिनट पर
  • होलिका दहन शुभ मुहूर्त-  7 मार्च 2023 की शाम को 6 बजकर 24 मिनट से लेकर 8 बजकर 51 मिनट तक

होलिका दहन पूजन विधि

होलिका दहन से पहले होली पूजन का विशेष विधान है। इस दिन सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें। इसके बाद होलिका पूजन वाले स्थान में जाए और पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करके बैठ जाएं। इसके बाद पूजन में गाय के गोबर से होलिका और प्रहलाद की प्रतिमाएं बनाएं। इसके साथ ही रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, हल्दी, मूंग, मीठे बताशे, गुलाल, रंग, सात प्रकार के अनाज, गेंहू की बालियां, होली पर बनने वाले पकवान, कच्चा सूत, एक लोटा जल मिष्ठान आदि के साथ होलिका का पूजन किया जाता है। इसके साथ ही भगवान नरसिंह की पूजा भी करनी चाहिए।  होलिका पूजा के बाद होली की परिक्रमा करनी चाहिए और होली में जौ या गेहूं की बाली, चना, मूंग, चावल, नारियल, गन्ना, बताशे आदि चीज़ें डालनी चाहिए।

होली मनाने के पीछे की पौराणिक कथा

होली मनाने के पीछे शास्त्रों में कई पौराणिक कथा दी गई है। लेकिन इन सबमें सबसे ज्यादा भक्त प्रहलाद और हिरण्यकश्यप की कहानी प्रचलित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को बुराई पर अच्छाई की जीत को याद करते हुए होलिका दहन किया जाता है।

कथा के अनुसार, असुर हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, लेकिन यह बात हिरण्यकश्यप को बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। बालक प्रह्लाद को भगवान की भक्ति से विमुख करने का कार्य उसने अपनी बहन होलिका को सौंपा जिसके पास वरदान था कि अग्नि उसके शरीर को जला नहीं सकती।

भक्तराज प्रह्लाद को मारने के उद्देश्य से होलिका उन्हें अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रविष्ट हो गयी, लेकिन प्रह्लाद की भक्ति के प्रताप और भगवान की कृपा के फलस्वरूप खुद होलिका ही आग में जल गई। अग्नि में प्रह्लाद के शरीर को कोई नुकसान नहीं हुआ। इस प्रकार होली का यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

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