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Vinayak Chaturthi Vrat Katha: शिव-पार्वती की इस कथा के बिना अधूरी मानी जाती है विनायक चतुर्थी की पूजा, पढ़िए संपूर्ण व्रत कथा

 Written By: Arti Azad
 Published : Jan 22, 2026 12:03 am IST,  Updated : Jan 22, 2026 12:03 am IST

Vinayak Chaturthi Vrat Katha: विनायक गणेश चतुर्थी का सनातन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। इस पावन दिन गणेश जी की पूजा और व्रत करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन शिव-पार्वती की इस कथा का पाठ किए बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। यहां पढ़िए संपूर्ण कथा।

Vinayak Chaturthi Vrat Katha विनायक चतुर्थी शिव-पार्वती कथा - India TV Hindi
विनायक चतुर्थी शिव-पार्वती कथा Image Source : PEXELS

Vinayak Chaturthi Shiv aur Parvati Ki Katha: सनातन धर्म में गणेश चतुर्थी व्रत की बड़ी महिमा बताई गई है। ऐसी मान्यता है कि जो कोई भी ये व्रत रखता है उसके जीवन के सारे संकट दूर हो जाते हैं।  किसी भी माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है। इस बार विनायक चतुर्थी 22 जनवरी, गुरुवार को पड़ रही है। विनायक चतुर्थी पर भगवान गणेश को दूर्वा यानी दूब घास अर्पित करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। व्रत के दौरान उपवास रखकर पूजा के बाद भोग अर्पित करना विशेष पुण्यकारी होता है। मान्यता है कि इस दिन शिव-पार्वती से जुड़ी गणेश कथा का पाठ करने से भगवान गणेश शीघ्र प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं, इस कथा के पाठ के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

विनायक चतुर्थी व्रत कथा (शिव-पार्वती की पौराणिक कथा)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर विराजमान थे। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने की इच्छा जताई। भगवान शिव ने माता की बात स्वीकार कर ली, लेकिन खेल में हार-जीत का निर्णय करने के लिए किसी साक्षी की आवश्यकता थी।

तब भगवान शिव ने पास पड़े कुछ तिनकों से एक पुतले का निर्माण किया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर दी। उस बालक से शिवजी ने कहा, "वत्स, हम चौपड़ खेल रहे हैं। तुम निष्पक्ष होकर बताना कि जीत किसकी होती है।"

इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती के बीच चौपड़ का खेल आरंभ हुआ। यह खेल तीन बार खेला गया और तीनों बार माता पार्वती विजयी रहीं। खेल समाप्त होने के बाद जब बालक से निर्णय पूछा गया, तो उसने माता पार्वती के स्थान पर भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया।

यह सुनकर माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने बालक को श्राप दे दिया कि वह लंगड़ा हो जाएगा और कीचड़ में पड़ा रहेगा। बालक ने तुरंत माता से क्षमा मांगी और कहा कि यह उससे अज्ञानवश हो गया है।

बालक की विनती सुनकर माता पार्वती का हृदय पिघल गया। उन्होंने कहा, "कुछ समय बाद यहां नागकन्याएं आएंगी। वे तुम्हें गणेश व्रत की विधि बताएंगी। उनके अनुसार व्रत करने से तुम्हारे कष्ट दूर हो जाएंगे।"

यह कहकर माता पार्वती वहां से चली गईं।

एक वर्ष बाद उसी स्थान पर नागकन्याएं आईं। उनसे गणेश व्रत की विधि जानकर उस बालक ने लगातार 21 दिनों तक भगवान गणेश का व्रत किया। उसकी कठोर भक्ति से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और प्रकट होकर उसे मनचाहा वर मांगने को कहा।

बालक ने विनयपूर्वक कहा, "हे विनायक! मुझे इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर कैलाश पर्वत तक पहुंच सकूं।"
भगवान गणेश ने उसे यह वरदान दे दिया।

इसके बाद वह बालक कैलाश पहुंचा और पूरी कथा भगवान शिव को सुनाई। उधर, चौपड़ वाले दिन से माता पार्वती भगवान शिव से नाराज थीं। माता को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने भी बालक के बताए अनुसार 21 दिनों तक विनायक व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती की नाराजगी दूर हो गई।

जब भगवान शिव ने माता को इस व्रत का महत्व बताया, तो माता पार्वती के मन में अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जागृत हुई। तब माता पार्वती ने भी 21 दिनों तक श्री गणेश का व्रत किया। व्रत के 21वें दिन भगवान कार्तिकेय स्वयं माता पार्वती से मिलने आए।

तभी से विनायक चतुर्थी व्रत को समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला व्रत माना जाता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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