ढाकाः बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद से ही देश गृहयुद्ध की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। बांग्लादेश में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। यहां हिंदुओं समेत अन्य अल्पसंख्यों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है। उनकी हत्या की जा रही है, उनके घरों को जलाया जा रहा है, धार्मिक स्थलों में तोड़फोड़ की जा रही है और बुरी तरह जानलेवा हमले किए जा रहे हैं। बांग्लादेश की ये बर्बरता बढ़ती ही जा रही है। इसी बीच पिछले साल शेख हसीना को सत्ता से बेदखल करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाली छात्रों के नेतृत्व में गठित नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) का आगामी राष्ट्रीय चुनावों के लिए इस्लामी रूढ़िवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन टूट चुका है। सीट-बंटवारे को लेकर दोनों दल अलग-थलग पड़ गए हैं। ऐसे में बांग्लादेश में होने वाले चुनावों पर भी गहरे आशंका के बादल मंडराते जा रहे हैं।
नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) और जमात के बीच सीटों के बंटवारे और मतों में भिन्नता के चलते यह गठबंधन टूट गया। इसके बाद एनसीपी की नेता तसनीम जारा ने पार्टी की उम्मीदवारी ठुकराने की घोषणा की है और अगले साल फरवरी में होने वाले राष्ट्रीय चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। तसनीम जारा ने कहा कि मेरा सपना एक राजनीतिक पार्टी के मंच से संसद में प्रवेश करके अपने निर्वाचन क्षेत्र और देश की जनता की सेवा करना था, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों के कारण मैंने किसी विशेष पार्टी या गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। जारा ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि मैंने आपसे और देश की जनता से वादा किया था कि मैं आपके लिए और नई राजनीतिक संस्कृति के निर्माण के लिए लड़ूंगी। परिस्थितियां चाहे जो हों, मैं उस वादे को निभाने के लिए दृढ़ संकल्पित हूं। इसलिए इस चुनाव में मैं ढाका-9 से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ूंगी।
एनसीपी के शीर्ष नेताओं में लगातार फूट पड़ रही है। तसनीम जारा के बाद एनसीपी की एक अन्य वरिष्ठ नेता समंता शर्मिन ने भी जमात-ए-इस्लामी के साथ एनसीपी के गठबंधन का विरोध करते हुए बयान जारी किया है। उनका कहना है कि बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी विश्वसनीय सहयोगी नहीं है। मुझे लगता है कि जमात-ए-इस्लामी के साथ उसकी राजनीतिक स्थिति और विचारधारा को देखते हुए-किसी भी तरह का सहयोग या समझौता करने से एनसीपी को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) की लंबे समय से चली आ रही स्थिति के अनुसार, उसके मूल सिद्धांत और राज्य की दृष्टि जमात से पूरी तरह अलग हैं। एनसीपी न्याय, सुधार और संविधान सभा के चुनाव के इर्द-गिर्द गठित पार्टी है। इसलिए इन तीन मुद्दों पर संरेखण किसी भी राजनीतिक गठबंधन के लिए पूर्व शर्त है। उन्होंने कहा कि उनका वर्तमान रुख पिछले डेढ़ साल से पार्टी की स्थिति के अनुरूप है, और जमात ने निचले सदन में आनुपातिक प्रतिनिधित्व (पीआर) की मांग करके सुधारों में बाधा डाली है।
समंता शर्मिन ने यह भी स्पष्ट किया कि जमात के साथ गठबंधन का मतलब बीएनपी का समर्थन करना नहीं है। उन्होंने कहा कि एनसीपी की लंबे समय से चली आ रही स्थितियां सही थीं और वह उस विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहेंगी। मेरा वर्तमान रुख पिछले डेढ़ साल से पार्टी की स्थिति के अनुरूप है। जमात ने निचले सदन में पीआर (आनुपातिक प्रतिनिधित्व) की मांग करके सुधारों में बाधा डाली थी। नतीजतन, एनसीपी के संयोजक ने कहा था कि सुधारों के पक्ष में न होने वालों के साथ गठबंधन संभव नहीं है। परिणामस्वरूप, जुलाई मार्च के बाद कई संयोजक नेताओं सहित अन्यने घोषणा की थी कि एनसीपी सभी 300 सीटों पर अकेले उम्मीदवार उतारेगी, और देश भर से उम्मीदवारों को आमंत्रित किया गया था कि एनसीपी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी।
बयान में कहा गया कि बीएनपी या जमात में से किसी के साथ भी गठबंधन एनसीपी की संगठनात्मक और राजनीतिक नीतियों से विचलन होगा। जुलाई 2024 में शेख हसीना के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व करने वाले छात्र ही एनसीपी के गठनकर्ता हैं। पार्टी द्वारा जमात-ए-इस्लामी के साथ चुनावी गठबंधन बनाने की पहल के बाद से पार्टी के अंदर विभाजन उभर कर सामने आया है, विशेष रूप से महिला नेताओं ने इस कदम का कड़ा विरोध किया है।
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