Goa Liberation Movement: भारत 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो गया था, लेकिन गोवा जैसे कई इलाके ऐसे भी थे, जहां अभी भी विदेशी शासन चल रहा था। गोवा, दमन, दीव, दादरा और नगर हवेली में पुर्तगालियों का शासन था, और पूरे इलाके को उनसे मुक्त कराने के लिए जो आंदोलन चला उसे गोवा मुक्ति आंदोलन कहा गया। खास बात यह रही कि ये आंदोलन सशस्त्र और अहिंसक दोनों तरीकों से लड़ा गया और आखिरकार 1961 में भारत की सेना द्वारा 'ऑपरेशन विजय' के जरिए अपने अंजाम तक पहुंचा। सिर्फ 36 घंटों तक चले इस ऑपरेशन के बाद 451 साल की गुलामी झेलने वाले गोवा और अन्य इलाके भारत में शामिल हुए।
गोवा पर पुर्तगालियों के शासन की शुरुआत 1510 में हुई। पुर्तगाली सेनापति अल्फांसो डी अल्बुकर्क ने इसे जीतकर अपना आधिपत्य जमा लिया था। उस समय गोवा एशिया में व्यापार का बड़ा केंद्र बन गया। गोवा की सत्ता हथियाने के बाद पुर्तगालियों ने वहां के लोगों पर कठोर नियम थोपे, लोगों को जबरन ईसाई बनाने लगे और स्थानीय संस्कृति का दमन करने लगे। गोवा में पुर्तगालियों के शासन के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत 16वीं सदी से ही हो गई थी। यहां 1583 में कुनकोलिम विद्रोह हुआ, जहां स्थानीय लोगों ने पुर्तगाली पादरियों के खिलाफ हथियार उठाए और मंदिरों की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा दी। 1787 में 'पिंटोस की साजिश' नाम का विद्रोह हुआ जिसमें गोवा के कैथोलिक पादरियों और स्थानीय लोगों ने पुर्तगाली शासन को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई, लेकिन यह नाकाम रही।
19वीं सदी में विद्रोह और तेज हुए। सतारी के राणे परिवार ने 1755 से 1895 तक 14 विद्रोह किए, जिनमें दीपाजी राणे, कुस्टोबा राणे और दादा राणे जैसे नेता शामिल थे। ये विद्रोही गुरिल्ला युद्ध में माहिर थे और पुर्तगालियों को इन्होंने काफी परेशान किया। 1835 में बर्नार्डो पेरेस दा सिल्वा गोवा, दमन और दीव के पहले गोवा मूल के प्रीफेक्ट बने, लेकिन यूरोपीय निवासियों ने उन्हें 18 दिनों के अंदर ही हटा दिया। 1852 में दीपाजी राणे ने नानुज किले पर कब्जा किया, जिससे पुर्तगालियों को झुकना पड़ा। 1895 में दादा राणे का विद्रोह सबसे बड़ा था, लेकिन इसे दबा दिया गया और विद्रोहियों को तिमोर द्वीप पर निर्वासित कर दिया गया।
20वीं सदी में आंदोलन संगठित रूप लेने लगा। 1928 में ट्रिस्टाओ डी ब्रगांका कुन्हा ने गोवा नेशनल कांग्रेस की स्थापना की, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ी। 1946 में राम मनोहर लोहिया और जुलियाओ मेनेजेस ने मारगांव में एक सभा की, जहां नागरिक स्वतंत्रता और आजादी की मांग की गई। इस सभा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन हजारों लोग आए और लोहिया को गिरफ्तार कर लिया गया। इस सभा के बाद सत्याग्रह की लहर चली, जिसमें 1500 से ज्यादा लोग जेल गए। आंदोलन से जुड़े कई नेताओं जैसे पुरुषोत्तम काकोदकर और लक्ष्मीकांत भेंबरे को पुर्तगाल निर्वासित किया गया।
1947 में भारत आजाद हुआ, लेकिन गोवा अभी भी पुर्तगाली कब्जे में था। नेहरू सरकार ने कूटनीतिक तरीके से बात की, लेकिन पुर्तगाल ने मना कर दिया। 1954 में दादरा और नगर हवेली को आजाद गोमांतक दल और अन्य समूहों ने मुक्त कराया। 1955 में बड़े पैमाने पर सत्याग्रह हुए, जिसमें जगन्नाथराव जोशी जैसे नेता शामिल थे। पुर्तगालियों ने आंदोलन को दबाने के लिए गोलीबारी की, जिसमें कई लोग मारे गए। आखिरकार, 1961 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 'ऑपरेशन विजय' शुरू करने का आदेश दे दिया। 18 दिसंबर को भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर हमला किया और 19 दिसंबर को पुर्तगाली गवर्नर जनरल वासालो ई सिल्वा ने आत्मसमर्पण कर दिया। यह ऑपरेशन सिर्फ 36 घंटों में पूरा हुआ।
दिग्गज समाजवादी राम मनोहर लोहिया को 'गोवा मुक्ति का जनक' कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने 1946 में आंदोलन को नई ऊर्जा दी थी। ट्रिस्टाओ दा कुन्हा ने गोवा कांग्रेस बनाकर राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया। लुई डी मेनेजेस ब्रगांजा ने 'ओ हेराल्डो' अखबार से पुर्तगाली नीतियों की आलोचना की। पुरुषोत्तम काकोदकर सत्याग्रह में शामिल हुए और निर्वासित हुए। जगन्नाथराव जोशी ने 1955 के सत्याग्रह का नेतृत्व किया। अन्य नायक जैसे फ्रोइलानो डी मेलो, पुंडलिक गायतोंडे, फ्रांसिस मस्कारेन्हास, विष्णनाथ लावंडे और मोहन रानाडे ने दादरा-नगर हवेली की मुक्ति में भूमिका निभाई। इनमें से कई नायक जेल गए, यातनाएं सहीं, निर्वासन झेला, लेकिन हार नहीं मानी।
गोवा मुक्ति आंदोलन ने भारत के इतिहास को नई दिशा दी। यह भारत की आजादी के बाद का पहला बड़ा सैन्य अभियान था, जिसने दिखाया कि भारत अपनी जमीन पर किसी विदेशी कब्जे को बर्दाश्त नहीं करेगा। इससे भारत में उपनिवेशवाद का पूरी तरह अंत हो गया। 1961 में गोवा, दमन और दीव को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। 1967 में एक जनमत संग्रह में गोवा ने महाराष्ट्र में विलय को ठुकरा दिया। 1987 में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला, जबकि दमन-दीव और दादरा-नगर हवेली अलग केंद्र शासित प्रदेश बने। गोवा की आजादी के साथ ही भारत का पूरे पश्चिमी तट पर आधिपत्य हुआ और विदेशी एन्क्लेव्स खत्म हो गए।
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