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EXCLUSIVE: भारत में ''व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क'' क्यों खड़ा कर रहे आतंकी, पढ़े-लिखे डॉक्टर-इंजीनियर कैसे हो रहे रेडिकलाइज?

भारत में ''व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क'' खड़ा करने के पीछे आतंकी संगठनों का क्या मकसद हो सकता है? डॉक्टर जैसे पढ़े-लिखे लोग आतंकी गतिविधियों में क्यों शामिल हो रहे हैं? इस खबर में बीएसएफ के पूर्व DIG नरेंद्र नाथ धर दुबे ने विस्तार से समझाया है।

Written By: Vinay Trivedi
Published : Nov 12, 2025 05:11 pm IST, Updated : Nov 12, 2025 05:18 pm IST
White Collar Terror Network- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV ''व्हाइट कॉलर'' लोगों का आतंकी गतिविधियों में शामिल होना भारत के लिए चिंता की बात है।

नई दिल्ली: टेरर मॉड्यूल के संबंध में फरीदाबाद, अहमदाबाद और सहारनपुर में हुई डॉक्टर्स की गिरफ्तारी के बाद ''व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क'' टर्म की चर्चा हर तरफ हो रही है। इस टर्म का मतलब है कि ऐसे लोगों का नेटवर्क जो पेशेवर, हाईली क्वालिफाइड, सामान्य दिखने वाले हों और टेरर एक्टिविटीज में शामिल हों। समाज में इस बात को लेकर भी चिंता है कि शिक्षित होने बावजूद कैसे कोई आतंकी बन जा रहा है? प्रोफेशनल्स कैसे रेडिकलाइज हो जा रहे हैं? और ये भारत के लिए कितना बड़ा खतरा है? इस मुद्दे पर INDIA TV की टीम ने बीएसएफ के पूर्व DIG नरेंद्र नाथ धर दुबे का टेलीफोनिक इंटरव्यू लिया। इसमें हमने उनसे जानने की कोशिश की कि अनपढ़ आतंकियों के मुकाबले ''व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क'' भारत के लिए ज्यादा खतरनाक क्यों है? आतंकी संगठन Foot Soldiers के बजाय डॉक्टर जैसे पेशेवर लोगों का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? आतंकियों के लॉन्ग टर्म विजन ने उन्हें कैसे शॉक किया और भारत के लोग इससे कैसे बच सकते हैं?

सवाल- आतंकी संगठन भारत में 'व्हाइट कॉलर नेटवर्क' खड़ा करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? पहले तो अनपढ़ लोगों का ब्रेनवॉश करके और पैसे का लालच देकर आतंकी बनाया जाता था लेकिन अब डॉक्टर जैसे पढ़े-लिखे लोगों को क्यों आतंक एक्टिविटिज में शामिल किया जा रहा है?

जवाब- बीएसएफ DIG (रिटायर्ड) नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि लोग आमतौर पर गलती से आतंकवाद की तुलना क्राइम से करने लगते हैं। वे मानते हैं कि यह आतंकवाद भी चूंकि अपराध है तो इसमें डिप्राइव्ड क्लास यानी वे लोग जो गरीब हैं, जिनको अवसर नहीं मिले, सामाजिक रूप से असंतुष्ट हैं, वो इसका हिस्सा बनते हैं। लेकिन मैं यहां यह कहना चाहूंगा कि जो रेडिकलाइज्ड आतंकवाद है, जिस सोच की बुनियाद ही एक रेडिकल थॉट प्रोसेस है, जो एंटी-इंडिया कैंपेन पर आधारित है, जो गजवा-ए-हिंद करने की सोच रखता है, जो शरिया लॉ स्थापित करने का विचार है। और जो मुस्लिम उम्मा ब्रदरहुड के विस्तार करने सोच है, इसका गरीबी से कोई लेना-देना नहीं है। इसका सिर्फ लेना-देना है संवेदनशीलता से। रेडिकल थॉट प्रोसेस से कोई भी प्रभावित हो सकता है। वह डॉक्टर हो सकता है, वह इंजीनियर हो सकता है, वह प्रोफेसर हो सकता है और वह एक आम आदमी भी हो सकता है।

उदाहरण के तौर पर इससे पहले भी व्हाइट कॉलर और पढ़े-लिखे लोग टेररिज्म में शामिल रहे हैं। ये कोई पहली बार नहीं हुआ है। जम्मू-कश्मीर फ्रीडम फोर्स का जो चीफ था, वह इकोनॉमिक्स का सबसे बड़ा एडवाइजर था। एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग, देहरादून से बीटेक किया हुआ लड़का टेरर मॉडयूल का चीफ था। और अगर आप ISIS मॉड्यूल की बात करें तो मुंबई में 2014-15 में जो टेकी पकड़ा गया था वो हाई ग्रेड टेक्निकल पर्सन था। उच्च शिक्षा प्राप्त किया हुआ था। इसके पहले भी डॉक्टर टेरर मॉडयूल में पकड़े जा चुके हैं।

उन्होंने आगे कहा कि जो रेडिकल थॉट प्रोसेस से निकला हुआ आतंकवाद है, जो जिहादी मानसिकता से निकला हुआ आतंकवाद है, उसका धनी होना या गरीब होने से कोई संबंध नहीं है। दरअसल, 2017 में कश्मीर में जाकिर मूसा एक टेररिस्ट था, जिसके नाम पर बड़े गुणगान होते थे। और वह हिज्बुल मुजाहिदीन का सुप्रीम कमांडर था। उसने हिज्बुल मुजाहिदीन से अपने संबंध तोड़कर और अंसार गजवात-उल-हिंद बनाया था। यह ISIS का थॉट प्रोसेस है। आप समझ लीजिए कि यह ISIS का एक इंडिया बेस्ड मॉडयूल है। इसको ISIS-K बोलते हैं। इसमें K का मतलब कश्मीर है। जाकिर मूसा जब मारा गया तो उसका सक्सेसर ललिहारी आया. सुरक्षाबलों ने उसे भी मारा तो अगला सक्सेसर हमीद बन गया। फिर 2020 में वह भी मारा गया तो पिछले 4-5 साल से ये वाली तंजीम ठंडी पड़ा हुई थी। लेकिन अब फिर से अंसार गजवात-उल-हिंद मॉडयूल को रिवाइव करने की कोशिश की गई है।

बीएसएफ के पूर्व DIG नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि अब चूंकि भारत और पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिंदूर से पहले पहलगाम वाला बड़ा कांड हुआ। उसके अलावा, जैश-ए-मोहम्मद ने फरवरी, 2019 में बड़ा कांड किया था। उन दो बड़े कांड के बाद पाकिस्तान ने फिर से अंसार गजवात-उल-हिंद को अब ड्राइव किया। यानी एक इंजन को बंद कर दिया और दूसरे इंजन को अभी फास्ट ट्रैक पर लाया है। अब इसमें देखिए ना कितनी बड़ी बात है कि अगर यह प्रूव होता है कि डॉक्टर उमर ने ब्लास्ट किया है तो वह तो पुलवामा का है। ऐसे में पाकिस्तान, बड़ी आसानी से बोलेगा कि यह तो आपके यहां के लोग हैं। इससे हमारा तो लेना-देना नहीं है। पहलगाम तो पाकिस्तानी टेररिस्ट ने किया था लेकिन इस बार पाकिस्तान बोल देगा कि यह तो आपके लोगों ने किया, हमसे क्या लेना-देना है? यही काम उसने फरवरी, 2019 में किया था। आदिल अहमद डार जो ब्लास्टर था, जिसने ईको मारुति कार में ब्लास्ट किया था, जिसने सीआरपीएफ की हैवी कैजुअल्टी की थी, वह भी पुलवामा का रहने वाला था।

अभी यह फरीदाबाद वाला मॉडयूल भी पुलवामा का है। एक आदमी उसमें कोयल गांव का है और एक वनपुरा का है, जो पड़ता कुलगाम में है लेकिन पुलवामा के बॉर्डर पर है। तो उन्होंने यह प्रूव करने की कोशिश की कि ये आपके लोग हैं, लोकल लोग हैं जो टेररिज्म में शामिल हैं। इसका पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने नई टैक्टिक्स को लॉन्च किया है। और इसमें हाई प्रोफेशन जैसे- डॉक्टर हैं। मतलब यह बड़ी चिंता की बात है कि डॉक्टर्स का एक इतना मुकद्दस पेशा है और उसमें तो एक डॉक्टर, मेडिसिन स्पेशलिस्ट भी है। और एनसीआर के अंदर विस्फोटक इकट्ठा करना, यह बड़ी चिंता की बात है। और अगर यह सुसाइड ब्लास्ट है तो दिल्ली के इतिहास की पहली घटना है।

सवाल- पहले यह देखा जाता था कि फिदायीन अटैक में ज्यादातर Foot Soldiers का इस्तेमाल होता था। आतंकी संगठन कसाब जैसे Foot Soldier की कु्र्बानी दे देते थे और बाकी जिसके पास दिमाग है, जिसको ट्रेनिंग ज्यादा दी गई है, जो ज्यादा पढ़ा-लिखा है, उसको बचाकर रखते थे। अगर जांच के दौरान दिल्ली में हुआ विस्फोट एक फिदायीन अटैक निकला तो इस बार इसमें मोहम्मद उमर जैसे डॉक्टर को क्यों भेज दिया गया? किसी Foot Soldier को क्यों नहीं?

जवाब- बीएसएफ DIG (रिटायर्ड) नरेंद्र नाथ धर दुबे के मुताबिक, हमारे यहां एक क्लास है जो ये बात बहुत प्रचारित करती है कि डिप्राइव्ड क्लास ही आतंकवादी है। लेकिन जो पहला श्रीनगर सिटी का सुसाइड ब्लास्टर था, वो बिलाल नाम का कश्मीरी बॉर्न ब्रिटिश नेशनल था। श्रीनगर सिटी में जो अप्रैल, 2000 में 15 कोर हेडक्वार्टर के सामने एंबेसडर कार ब्लास्ट हुआ था, वो धमाका करने वाला ब्रिटिश बॉर्न कश्मीरी नेशनल बिलाल था। आप सोचिए ब्रिटेन में कौन पढ़ेगा। वहां कोई गरीब आदमी तो पढ़ेगा नहीं। एक तंजीम के चीफ को मैंने पकड़ा, वो उस समय सेंट पीटर्सबर्ग से मेडिकल कर रहा था। ये जो हमारे यहां एक बात बहुत सुनाई जाती है, वो सच नहीं है। नक्सलिज्म में भी बात करिए तो लोग कहते हैं गरीब-गुरबे लोग हैं, डिप्राइव्ड हैं, जंगल-जमीन-पानी से जो हट गए हैं वो हैं। लेकिन नक्सलिज्म को चलाने वाले अर्बन नक्सल थे, वो भी जो दिल्ली में बैठे हुए थे। एम्स के डॉक्टर नक्सलिज्म में शामिल थे। दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शामिल थे। ये तो गरीब नहीं थे। यह एक मानसिकता है और एक सेंसिटिविटी है। उसमें गरीब भी हैं। लेकिन गरीब को तो ये Foot Soldier के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। कश्मीर बेस्ड जिहादी टेररिज्म की यह एक बहुत बड़ी घटना है, अगर उसमें डॉक्टर ने अपने आपको सुसाइड बॉम्बर बनाकर इस्तेमाल किया है। आप मानकर चलिए कि यह बहुत ही चुनौतीपूर्ण है। लेकिन इस तरह के बुद्धिजीवी लोग टेररिज्म में एक्टिवली शामिल रहे हैं, ये नई बात नहीं है।

सवाल- आतंकवादी संगठन जब अनपढ़ के बजाय किसी पढ़े-लिखे यानी टेकी या डॉक्टर जैसे किसी को ट्रेन करते हैं तो उन्हें क्या एडवांटेज होता है? और अनपढ़ के बजाय पढ़े-लिखे को ब्रेनवॉश करना कितना मुश्किल होता है?

जवाब- बीएसएफ के पूर्व DIG नरेंद्र नाथ धर दुबे ने बताया कि आतंकी संगठनों को दोनों टाइप के ही कैडर की जरूरत होती है। अजमल कसाब जैसे लोग भी इनको चाहिए, जिसको लेना-देना कुछ नहीं. कराची से चलकर मुंबई में आए खुद को कुर्बान करने के लिए। लेकिन जो पढ़ा-लिखा ग्रुप है, उसके साथ प्रॉब्लम ये है कि वो सेल्फ-रेडिकलाइज्ड ज्यादा होता है। सोशल मीडिया का एक्सेस उसको बहुत होता है। वो दुनिया में हो रहे कथित अत्याचार को बहुत जल्दी अपने से जोड़ता है। और वो सेंसिटिविटी की वजह से अपने आपको बहुत जल्दी एक हाइपरसोनिक जोन में लेकर चला जाता है। ऐसे लोगों पर नजर नहीं होती है। ये विमान में, एसी फर्स्ट क्लास और अच्छी गाड़ी में चल रहे होते हैं। जो भी इन्हें देखता है उसके मन में इनके प्रति सम्मान ही आता है। अब सैयद मोहम्मद उमर शेख, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स का पढ़ा हुआ था। उसे तिहाड़ जेल से आईसी 814 हाईजैक के बदले में छोड़ा गया था. उसने 1 लाख अमेरिकी डॉलर उस मोहम्मद अत्ता पायलट को ट्रांसफर किए, जिसने अमेरिका में 9/11 हमले यानी WT टॉवर पर प्लेन अटैक करने का काम किया था। सैयद ने खुद जनरल परवेज मुशर्रफ के काफिले पर 3 सुसाइड अटैक करवाए थे। उसने अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल का मर्डर भी किया था। बाद में वो चेचन्या में जाकर भी लड़ा था। इतना ही नहीं एम्स्टर्डम के टॉप एजुकेटेड 2 लोगों ने श्रीनगर में डल गेट पर बीएसएफ पेट्रोलिंग टीम पर अटैक किए थे. सोचिए वे एम्स्टर्डम के पढ़े हुए थे। उनको क्या कोई कमी थी?

उन्होंने कहा कि दरअसल ये लोग सेल्फ-रेडिकलाइज्ड हैं। यानी ये लोग ऑनलाइन रेडिकलाइज्ड होते हैं। सोशल मीडिया पर इतनी चीजें चल रही हैं, जो बेमतलब में लोगों के सामने परोसी जा रही हैं। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने हजार-हजार यंग टेक्निशियन को हायर कर रखा है जो पूरे दिन मीम बनाते हैं। पूरे दिन सोशल मीडिया पर 20-20 सेकंड की फॉल्स वीडियो डालते हैं। बहुत सारे लोग यही देखते हैं और उसके बाद उनको देश-दुनिया से कथित शिकायत हो जाती है। उनको लगने लगता है कि सिस्टम बहुत खराब है। भारत बहुत ही एंटी-इस्लामिक है। फिर ये लोग ऑनलाइन ही आपस में ग्रुप बनाकर जुड़ते हैं। इस बारे में इनके परिवार को भी नहीं पता होता। ये फैमिली को कुछ नहीं बताते कि वे क्या कर रहे हैं। और दिल्ली धमाका और फरीदाबाद के मामले में भी देखिएगा यही निकलकर आएगा। जांच में आखिरकार यही पता चलेगा कि फैमिली को इस बारे में कोई क्लू नहीं था। ये उस वर्ग के लोग हैं जिन्हें औपचारिक तौर पर कट्टर बनाने की जरूरत नहीं पड़ती है। ये सोशल मीडिया से रेडिकलाइज होते हैं। ये लिटरेचर पढ़कर रेडिकलाइज होते हैं। और सोशल मीडिया पर जो एक फैक्ट्री खुली हुई है एंटी-इंडिया, ये उसके विक्टिम हैं।

सवाल- जैसा कि आपने बताया कि कई बार रेडिकलाइज हो चुके लोगों के परिजनों को भी नहीं अंदाजा होता है कि उनके घर के सदस्य किन हरकतों में शामिल हैं। तो अगर जैसे सिक्योरिटी फोर्सेज और एजेंसियां इतना काम करती हैं इनको रोकने के लिए, फिर भी 100 बार रोकती हैं तो एक बार कहीं ना कहीं आतंकी सफल हो ही जाते हैं। ऐसे में जितने भी आम आदमी भारत में रहते हैं, जो भारत को चाहते हैं, भारत से प्यार करते हैं, उनको कैसे सतर्क रहना चाहिए और ऐसी संदिग्ध कोई गतिविधि दिखे किसी जगह तो कैसे उसको रिपोर्ट करें और एजेंसियों की मदद करें?

जवाब- बीएसएफ DIG (रिटायर्ड) नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि पहली बात तो ऐसी घटना में सिक्योरिटी एजेंसी और इंटेलिजेंस एजेंसी अपना हाथ धो ले तो यह संभव नहीं है। ना मैं हाथ धोने के मुद्दे पर उनके साथ हूं। यह बहुत बड़ा सिक्योरिटी लैप्स है। और यह बताता है कि हम बेसिक पुलिसिंग, बेसिक इंटेलिजेंस भी नहीं कर पा रहे हैं। पुलिस प्रोफेशनल्स और इंटेलिजेंस एजेंसियां घटनाएं होने से रोकती भी हैं लेकिन बहुत फालतू चीजों में बिजी भी रहती हैं। दूसरी बात है कि मुझे आम आदमी से उससे ज्यादा शिकायत है। दिल्ली-एनसीआर में मैं 22 साल से रह रहा हूं। लोग अपनी जाति, अपनी कम्युनिटी का बोर्ड लगाकर पूरे दिन मोटरसाइकिल और गाड़ियों में घूमते हैं। आप किसी भी जगह चले जाइए, दिल्ली के सबर्ब में चले जाइए, एनसीआर में चले जाइए। इन लोगों को अपने अहंकार से फुर्सत नहीं है। कोई भी कम्युनिटी में साइड, राइट-लेफ्ट, ऊपर-नीचे किसी पर नजर नहीं रखता। आप बताइए फरीदाबाद का ये फतेहपुर गांव है, सारे लोग अंधे थे क्या उस गांव में? उस गांव में हमारे आप जैसा शहरी चला जाए तो 10 सवाल पूछेंगे। क्या आम आदमी की जिम्मेदारी नहीं है 142 करोड़ के इस देश में कि वह अपनी कम्युनिटी के अंदर लोगों पर नजर रखे? 3 हजार किलोग्राम एक्सप्लोसिव वहां पर अलग-अलग कमरों में स्टोर हो रहा है। वहां एक इमाम है। आप उस गांव में जाएंगे तो देखेंगे कि उसी इमाम ने कई लोगों को उधार दे रखा होगा। दूसरी कम्युनिटी वालों को भी पैसे दे रखे होंगे। लोग अपने पर्सनल स्वार्थ में बिके हुए हैं। इनको खाली फोर्सेज और पुलिस के काम में कमी निकालनी है कि ये आपकी नाकामयाबी है। 142 करोड़ का देश जो इतने बड़े निशाने पर हो रेडिकल जिहाद के, उस देश का आम शहरी आंख बंद करके बैठा रहे? उसको कोई क्लू ना मिले? ऐसा कैसे हो सकता है। आपके मोहल्ले में कोई आदमी किराए का घर ढूंढने जाए, उसको 20 लोग ढूंढेंगे, 20 लोग पूछेंगे। लेकिन फतेहपुर में इतना बड़ा जखीरा जमा हो गया और किसी ने नहीं देखा. ये कोई एक दिन में तो नहीं आया होगा। इसको आने में 6 महीने लगे होंगे।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पटेल चेस्ट, नॉर्दन कैंपस दिल्ली यूनिवर्सिटी एरिया में पार्लियामेंट अटैक के मुख्य आरोपी यानी 6 पाकिस्तानी, किराए पर घर लेकर बैठे रहे। तिलक नगर मार्केट में उन्होंने सेकेंड हैंड एंबेसडर कार खरीदकर मॉडिफाई की। पेमेंट आप ज्यादा दे दीजिए, कोई आपसे पूछने वाला नहीं है। हम लोग बहुत ज्यादा सिक्योरिटी के मुद्दे पर अंधे हुए हैं। आंखें हमारी बंद हैं। मानकर चलते हैं कि जब तक हमारे पर ना आए, तब तक सब अच्छा है। और हम लोग भाषण देने और नेतागिरी में ज्यादा तेज हैं। तो इसमें कम्युनिटी की भी गलती है, मैं तो उनको भी बराबर दोषी मानता हूं। कहना बड़ा आसान है कि पुलिस है, सिक्योरिटी एजेंसी है, उनकी तो गलती है ही। फरीदाबाद में एक्सप्लोसिव का इतना बड़ा ट्रांसशिपमेंट हुआ? इसमें फरीदाबाद पुलिस क्या कर रही थी? फरीदाबाद में छत्तीसगढ़ नंबर की कार दिख जाए तो उसे फट से रोक लेंगे। आप जाकर देखिए कि हरियाणा नंबर की गाड़ी ना हो, दिल्ली नंबर की गाड़ी हो तो आपको रोक लेंगे, 5 सवाल पूछेंगे। आपका पॉल्यूशन चेक 20 बार पूछ लेंगे। तो कहने का मतलब है कि पुलिस जो रास्ते में, चौराहे और सड़क पर बैठी है, टैक्सपेयर की सैलरी ले रही है, पुलिस की भी जिम्मेदारी तो बनती ही है कि आपके यहां एक्सप्लोसिव जमा हो गया लेकिन आपको कोई क्लू ही नहीं है। किसके लिए बैठे हुए हैं आप? हर कोई इसका जिम्मेदार है।

सवाल- आपने बहुत सारे आतंकियों को पकड़ा होगा और कई बार पूछताछ भी की होगी। उसमें कभी ऐसा हुआ कि आपने कुछ बहुत ही शॉकिंग सुना। आप भी सोच में पड़ गए हों कि अरे ये क्या होने जा रहा है? इससे निपटना तो बहुत मुश्किल है।

जवाब- पूर्व बीएसएफ DIG दुबे ने बताया कि एक बार मेरे सामने जम्मू-कश्मीर फ्रीडम फोर्स (JKFF) का चीफ था. वह सियालकोट, पाकिस्तान का रहने वाला टेररिस्ट था. JKFF बहुत ही लेस नोन ऑर्गनाइजेशन है, लेकिन आइडियोलॉजिकली उसकी सोच बहुत आगे है। हाल में मैं ब्रेकिंग न्यूज़ में देख रहा था। उसमें गुलाम नबी फही और एक ठुकुर का नाम आया। अमेरिका में कश्मीर एक्शन कमेटी है, फरीदाबाद वाला जो मॉड्यूल पकड़ा गया है वो ग्रुप उससे इंस्पायर्ड है। गुलाम नबी फही के बारे में उसने 2003 की पूछताछ में आज के 22 साल पहले मुझे बताया था कि साहब हमारी वो सोच है। हमारी सोच ये नहीं है कि हमने 2 लोगों को पिस्तौल से मार दिया। 3 लोगों को ग्रेनेड से घायल कर दिया। हमारी सोच ये है कि 2050 में हम जो नारा दें वो कश्मीर में हो। यानी वो उसका थॉट प्रोसेस था। वो आतंकी इकोनॉमिक्स से मास्टर किया हुआ था सियालकोट यूनिवर्सिटी से। और उसका जो टेरर फंडिंग पर आउटलुक था, उसके बाद इंडिया के अंदर जिहाद फैलाने का जो आउटलुक था, वो बहुत ही एडवांस था। आज के 22 साल पहले वो बहुत सारी चीजें हमने उससे समझीं और सीखीं। तब हमें पता लगा कि ये तो जो टेरर मॉड्यूल को ऑपरेट करते हैं इन्होंने भारत के लिए बहुत लॉन्ग टर्म प्लान बनाया हुआ है। और इनके जो फिलोसॉफिकल आइडियाज हैं वो बहुत ही डेंजरस हैं। और वे 'To Divide India' और 'To Bleed India With Thousand Cuts' पर आधारित हैं।

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