हिंदू धर्म में होली का विशेष महत्व है। खुशियों और रंगों का यह त्योहार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन होलिका दहन और उसके दूसरे दिन होली खेलने का उत्सव मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन स्नान-दान कर उपवास रखने से मनुष्य के दुखों का नाश होता है और उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। साथ ही बुराई पर अच्छाई का दिन भी है यानि कि इस दिन होलिका दहन किया जायेगा। इस बार होली 18 मार्च को मनाई जाएगी। जानिए होलिका दहन का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और होली पूजन की संपूर्ण सामग्री।
आज के दिन होलिका दहन प्रदोष काल के बाद किया जायेगा । क्योंकि आज दोपहर 1 बजकर 19 मिनट से देर रात 1 बजकर 8 मिनट तक पृथ्वी लोक की भद्रा रहेगी । जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि में होता है, तो पृथ्वी लोक की भद्रा होती है और आज चन्द्रमा सिंह राशि में है । चूंकि भद्रा काल दोपहर में ही ख़त्म हो जायेगा और होलिका दहन प्रदोष काल के बाद होता है । लिहाजा भद्रा का कोई लेना-देना इस साल होलिका दहन से नहीं होगा । इसके साथ ही 10 मार्च को शुरू हुआ होलाष्टक होलिका दहन के बाद से समाप्त हो जायेंगे, जिसके चलते विवाह आदि सभी शुभ कार्य अब फिर से शुरू हो जायेंगे ।
शास्त्रों में होली मनाने के पीछे कई पौराणिक कथा दी गई है। लेकिन इनमें सबसे ज्यादा प्रहलाद और हिरण्यकश्यप की कहानी प्रचलित है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक फाल्गुन मास की पूर्णिमा को बुराई पर अच्छाई की जीत को याद करते हुए होलिका दहन मनाया जाता है।
पौराणिक कथा के मुताबिक रण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। लेकिन, हिरण्यकश्यप को यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। बालक प्रहलाद को भगवान कि भक्ति से विमुख करने का कार्य उसने अपनी बहन होलिका को सौंपा, जिसके पास वरदान था कि अग्नि उसके शरीर को जला नहीं सकती।
भक्तराज प्रहलाद को मारने के उद्देश्य से होलिका उन्हें अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रविष्ट हो गयी, लेकिन प्रह्लाद की भक्ति के प्रताप और भगवान की कृपा के फलस्वरूप खुद होलिका ही आग में जल गई। अग्नि में प्रहलाद के शरीर को कोई नुकसान नहीं हुआ। इस प्रकार होली का यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।
होलिका दहन से पहले होली पूजन का विशेष महत्व है। इस दिन सभी कामों को करके स्नान कर लें। इसके बाद होलिका पूजन वाले स्थान में पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह करके बैठ जाएं। अब पूजन में गाय के गोबर से होलिका और प्रहलाद की मूर्ति बनाएं। साथ ही रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, हल्दी, मूंग, मीठे बताशे, गुलाल, रंग, सात प्रकार के अनाज, गेंहू की बालियां, होली पर बनने वाले पकवान, कच्चा सूत, एक लोटा जल मिष्ठान आदि के साथ होलिका का पूजा करें। साथ में भगवान नरसिंह की भी पूजा करें। पूजा के बाद होली की परिक्रमा करनी चाहिए साथ में होली में जौ या गेहूं की बाली, चना, मूंग, चावल, नारियल, गन्ना, बताशे आदि चीजे डालनी चाहिए।
होलिका दहन के समय ऐसी परंपरा भी है कि होली का जो डंडा गाडा जाता है, उसे प्रहलाद के प्रतीक स्वरुप होली जलने के बीच में ही निकाल लिया जाता है । होली की बुझी हुई राख को घर लाना चाहिए । आज लकड़ियों के ढेर के साथ ही गोबर के उपले या कंडे जलाने की भी प्रथा है । यहां गौर करने की बात ये है कि- हमारे शास्त्रों में या हमारी परम्पराओं में हर चीज़ बड़ी ही सोच-समझकर बनायी गयी है । इन सबसे हमें कहीं-न-कहीं फायदा जरूर होता है । इसी तरह से आज गोबर के उपलों को जलाने के पीछे भी हमारी ही भलाई छिपी हुई है । दरअसल इस समय ये जो मौसम चल रहा है, इसमें वायुमंडल की स्थिति कुछ ऐसी होती है कि इसमें आस-पास बहुत से कीटाणु पनपने लगते हैं और ये कीटाणु डायरेक्ट या इनडायरेक्ट रूप से हमारी सेहत को इफेक्ट करते हैं और गोबर के अंदर कुछ ऐसी प्रॉपर्टीज़ होती हैं, जिससे उन्हें जलाने पर हमारे आस-पास मौजूद कीटाणु मर जाते हैं, साथ ही हमारी सेहत भी अच्छी होती है ।
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