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मात्र 7.65 रुपये की चोरी, कोर्ट ने 50 साल बाद अब बंद किया ये केस, कहा- जरूरत से ज्यादा समय बीत चुका

 Edited By: Dhyanendra Chauhan
 Published : Jan 18, 2026 05:03 pm IST,  Updated : Jan 18, 2026 05:12 pm IST

साल 1977 में 7.65 रुपये की चोरी हुई थी। तभी ये मामला कोर्ट में पहुंचा था। आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी किया गया था। वहीं, अब जाकर कोर्ट ने 50 साल बाद 7.65 रुपये की चोरी का मामला बंद कर दिया है।

सांकेतिक तस्वीर- India TV Hindi
सांकेतिक तस्वीर Image Source : FREEPIK

मुंबई की एक अदालत ने 7.65 रुपये की चोरी के लगभग 50 साल पहले के एक मामले को बंद कर दिया है। साल 1977 के इस अनसुलझे मामले में दो अज्ञात आरोपी और एक शिकायतकर्ता शामिल थे, जो दशकों तक पुलिस की तलाशी के बावजूद लापता रहे। यह फैसला दशकों पुराने मामलों में हाल के फैसलों में से एक है, जो लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े हैं।

आरोपियों का नहीं लगाया जा सका पता

मझगांव कोर्ट ने पुराने मामलों के निपटारे के अपने प्रयास के तहत 1977 के मामले को बंद कर दिया, जिसके आरोपियों की या तो मृत्यु हो चुकी है, अज्ञात हैं या उनका पता नहीं लगाया जा सका है। साल 1977 के चोरी के इस मामले में दो अज्ञात व्यक्तियों पर 7.65 रुपये चुराने का आरोप था, जो पांच दशक पहले एक बड़ी रकम थी। 

गैर जमानती वारंट भी हुआ था जारी

हालांकि, गैर-जमानती वारंट जारी होने के बावजूद दोनों का पता नहीं चल सका, जिसके कारण मामला ठंडे बस्ते में चला गया। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (मझगांव अदाल) आरती कुलकर्णी ने 14 जनवरी को मामले को बंद करते हुए कहा कि यह मामला लगभग 50 साल पुराना है और ‘बिना किसी प्रगति के अनावश्यक रूप से लंबित’ रहा था। 

जरूरत से समय बीत गया- कोर्ट

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, ‘जरूरत से ज्यादा समय बीत चुका है। मामले को लंबित रखने का कोई मतलब नहीं है।’ इसने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया जिनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 379 (चोरी) के तहत मामला दर्ज किया गया था और निर्देश दिया कि चोरी की गई 7.65 रुपये की राशि शिकायतकर्ता को लौटा दी जाए। 

आरोप पत्र दाखिल होने के बाद से लापता

कोर्ट ने आदेश में कहा, ‘यदि सूचना देने वाला नहीं मिलता है, तो अपील की अवधि पूरी होने के बाद यह राशि सरकारी खाते में जमा कर दी जाएगी।’ इसी तरह, 30 साल पुराने एक मामले में एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने भारतीय पासपोर्ट अधिनियम और विदेशी अधिनियम के तहत मामले के एक आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया कि 1995 में आरोप पत्र दाखिल किए जाने के बाद से वह लापता है। 

कई धाराओं में केस दर्ज

साल 2003 में लापरवाही से वाहन चलाने के एक मामले में भी मजिस्ट्रेट की अदालत में ऐसा ही हाल हुआ, क्योंकि पुलिस रिपोर्ट ने इसकी पुष्टि की कि ना केवल आरोपी, बल्कि मूल सूचना देने वाला और सभी गवाह भी अब लापता हैं। आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 279 और 338 के तहत मामला दर्ज किया गया था। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को निकट भविष्य में ढूंढे जाने की कोई संभावना नहीं है और यह भी माना कि मामले को अनिश्चितकाल तक जारी रखना अनुचित होगा। 

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