इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पूरे उत्तर प्रदेश में सरकारी जमीन, ग्राम समाज की भूमि और आम जनता के उपयोग के लिए आरक्षित जलाशयों पर हुए सभी अतिक्रमणों को हटाने के संबंध में निर्देश जारी किया है। न्यायालय ने यह काम 90 दिनों के भीतर पूरा करने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति पीके गिरि की एकल पीठ ने अतिक्रमण की सूचना देने या उसे हटाने में ग्राम प्रधानों, लेखपालों और राजस्व अधिकारियों की निष्क्रियता को बेहद गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने इस निष्क्रियता को आपराधिक विश्वासघात के समान बताया।
अदालत ने निर्देश दिया है कि जो अधिकारी कानून के मुताबिक कार्रवाई करने में विफल रहे हैं, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की जाए और आपराधिक मुकदमे भी दर्ज किए जाएं। न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों की यह विफलता भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 316 के तहत आपराधिक विश्वासघात है, और इस पर तुरंत आपराधिक मुकदमा शुरू किया जाना चाहिए।
यह आदेश मनोज कुमार सिंह नाम के एक शख्स की ओर से दायर जनहित याचिका पर पारित किया गया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि मिर्ज़ापुर के चुनार स्थित ग्राम चौका में एक तालाब पर ग्रामीणों ने अतिक्रमण कर लिया है, लेकिन शिकायत के बावजूद स्थानीय प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है।
6 अक्टूबर को पारित अपने आदेश में हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा, "जल ही जीवन है और बिना जल के पृथ्वी पर किसी भी प्राणी का कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए जल को किसी भी कीमत पर बचाना होगा।" न्यायालय ने कहा कि जलाशयों पर किसी भी तरह के अतिक्रमण की अनुमति नहीं दी जा सकती है और इसे भारी जुर्माने एवं दंड के साथ तुरंत हटाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
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