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पीएम नरेंद्र मोदी के बारे में प्रणब मुखर्जी क्या सोचते थे? अपनी किताब में किया है खुलासा

किताब में प्रणब मुखर्जी ने खुलासा किया है कि साल 2015 में रूस की उनकी यात्रा से पहले, "मुझे पीएम मोदी ने सलाह दी थी कि असैन्य परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष से लेकर रक्षा हार्डवेयर देने की प्रक्रिया, जिसमें सुखोई -30 और अन्य संवेदनशील उपकरण शामिल हैं, के साथ-साथ उच्च शिक्षा जैसे पहलुओं पर विस्तृत चर्चा (राष्ट्रपति व्लादिमीर) की जाए।"

IndiaTV Hindi Desk IndiaTV Hindi Desk
Updated on: January 07, 2021 11:09 IST

नई दिल्ली. देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी बेशक अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन इन दिनों वो अपनी किताब की वजह से फिर से सुर्खियों में हैं। बेशक प्रणब मुखर्ची लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी के वफादार रहे हों लेकिन उनके देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी बहुत अच्छे संबंध थे। प्रणव मुखर्जी ने अपने संस्मरण में बताया कि विदेश दौरे पर जाने से पहले पीएम नरेंद्र मोदी उन्हें संबंधित देश से होने वाली चर्चा पर मुख्य बिंदुओं का विवरण देने वाला डिटेल नोट भेजते थे और उनके साथ चर्चा करते थे। मुखर्जी की किताब- The Presidential Years में कहा गया है, "वह मुझे एक पत्र भेजते थे, जिसमें हमारे द्विपक्षीय संबंधों के मुख्य बिंदुओं का उल्लेख होता था। यह पीएम मोदी द्वारा शुरू की गई एक प्रथा थी।"

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किताब में प्रणब मुखर्जी ने खुलासा किया है कि साल 2015 में रूस की उनकी यात्रा से पहले, "मुझे पीएम मोदी ने सलाह दी थी कि असैन्य परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष से लेकर रक्षा हार्डवेयर देने की प्रक्रिया, जिसमें सुखोई -30 और अन्य संवेदनशील उपकरण शामिल हैं, के साथ-साथ उच्च शिक्षा जैसे पहलुओं पर विस्तृत चर्चा (राष्ट्रपति व्लादिमीर) की जाए।" मुखर्जी का यह भी मानना था कि मोदी ने अपने पूर्ववर्ती के विपरीत प्रधानमंत्री पद मेहनत से कमाया और हासिल किया था।

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किताब में कहा गया है, "मैंने जिन दो प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया, उनके लिए प्रधानमंत्री बनने का मार्ग बहुत अलग था। डॉ. मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने पद की पेशकश की थी, उन्हें कांग्रेस संसदीय दल और यूपीए के अन्य घटक दलों द्वारा प्रधान मंत्री पद के लिए चुना गया था, लेकिन उसने प्रस्ताव ठुकरा दिया। हालांकि किताब में प्रणब मुखर्जी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को "दृढ़ संकल्प", "एक मजबूत भावना" और "एक दृढ़ इच्छा शक्ति" वाला बताया है। किताब में कहा गया है कि मनमोहन सिंह ने बतौर पीएम अच्छा काम किया।

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मुखर्जी ने किताब में आगे लिखा है, "दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी साल 2014 में भाजपा का नेतृत्व करते हुए लोगों के प्रचंड समर्थन के साथ प्रधानमंत्री बने। वो पूरी तरह से एक राजनेता है और भाजपा द्वरा कैंपन मोड में जाते ही उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया था। वो तब गुजरात के सीएम थे और उन्होंने एक ऐसी छवि बनाई थी, जो जनता के बीच सटीक बैठती थी। उन्होंने प्रधानमंत्री पद अर्जित और प्राप्त किया है।

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दिलचस्प बात यह है कि मुखर्जी को साल 2014 में "त्रिशंकु संसद" की उम्मीद की, जिसमें भाजपा लगभग 195-200 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर रही थी और वह कांग्रेस को आमंत्रित करने की तैयारी कर रहे थे, भले ही उसके पास कम सीटें हों लेकिन एक स्थिर सरकार का वादा किया था। त्रिशंकु संसद की स्थिति में, मुखर्जी ने लिखा, “स्थिरता सुनिश्चित करना मेरी संवैधानिक ज़िम्मेदारी होगी। अगर कांग्रेस कम सीटों के साथ उभरती, लेकिन स्थिर सरकार का वादा करती, तो मैंने गठबंधन की सरकारों के प्रबंधन में उनके पिछले ट्रैक रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए पार्टी के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया होता। ”

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मुखर्जी ने अपनी बात में इस बात का भी उल्लेख किया है कि मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह के लिए सार्क के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करने की योजना पर मुखर्जी की सलाह भी मांगी। उन्होंने कहा कि उन्होंने इस विचार पर उनकी सराहना की और उन्हें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और श्रीलंका के नेताओं के सामने आने वाले भारी सुरक्षा जोखिमों के कारण इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख के साथ चर्चा करने की सलाह दी।

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किताब में मुखर्जी ने लिखा है, "जब नरेंद्र मोदी ने पीएम के रूप में पदभार संभाला, तो उन्हें विदेशी मामलों में कोई अनुभव नहीं था। गुजरात के सीएम के रूप में, उन्होंने कुछ देशों का दौरा किया था, लेकिन वो यात्राएं उनके राज्य की भलाई तक सीमित थीं, और उनका घरेलू या वैश्विक विदेश नीतियों से कोई लेना-देना नहीं था। इसलिए विदेश नीति उसके लिए सही मायने में पूरी तरह से नया क्षेत्र थी। लेकिन उन्होंने वो किया जो किसी पीएम ने पहले नहीं किया था: 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के शासनाध्यक्षों / राज्यों को आमंत्रित किया- और इसमें पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम, नवाज शरीफ भी शामिल थे। उनकी आउट-ऑफ-द-बॉक्स पहल ने कई विदेश नीति के दिग्गजों को आश्चर्यचकित किया।"

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मुखर्जी ने अपनी किताब में कई और मसलों पर भी पीएम मोदी की विदेश नीति की तारीफ की है। साल 2015 में पीएम मोदी के अचानक लाहौर में उतरने को लेकर उन्होंने लिखा, "यह स्पष्ट था कि कोई भी नरेंद्र मोदी से अप्रत्याशित की उम्मीद कर सकता है, क्योंकि वह किसी वैचारिक विदेश नीति का बोझ लेकर नहीं आए थे। उन्हें इन आश्चर्यों को जारी रखना था।"

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उन्होंने किताब में मोदी सरकार द्वारा बांग्लादेश के साथ लंब समय से चले आ रहे भूमि विवाद के हल होने का भी जिक्र किया है। उन्होंने किताब में कहा कि इसके अलावा, जापान, इज़रायल और मालदीव जैसे पड़ोसियों के साथ भारत के संबंधों में सुधार देखा गया। उन्होंने नेपाल का उल्लेख भी किया, जिसमें कहा गया था कि 2015 के बड़े पैमाने पर भूकंप के बाद, "पीएम मोदी ने सहायता प्रदान करने के लिए तेजी से कदम बढ़ाए, भूकंप से तबाह क्षेत्रों के लिए एक बड़ी राहत और पुनर्वास पैकेज की घोषणा की।"

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