Subhash Chandra Bose: जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस मौत के मुंह से बाहर निकल आए थे, जानें कैसा था सफर

Subhash Chandra Bose: पूरी दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की आग में जल रही थी। उस समय भारत में भी स्वतंत्रता के लिए अहिंसक और सशस्त्र आंदोलन गति पकड़ रहा था। महात्मा गांधी अहिंसक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, जबकि सशस्त्र आंदोलन की बागडोर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हाथों में थी।

Ravi Prashant Edited By: Ravi Prashant @iamraviprashant
Updated on: August 10, 2022 18:40 IST
Subhash Chandra Bose- India TV Hindi News
Image Source : TWITTER Subhash Chandra Bose

Highlights

  • बेटी डॉ अनीता बोस ने 'द अनीता डायलॉग्स' नाम के एक कार्यक्रम में किया था
  • जर्मन U-180 पनडुब्बी में सवार नेताजी और उनके ADC खतरे से खाली नहीं थे
  • जर्मन पनडुब्बी को भी दुश्मन के इलाके से होकर गुजरना पड़ा

Subhash Chandra Bose: पूरी दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की आग में जल रही थी। उस समय भारत में भी स्वतंत्रता के लिए अहिंसक और सशस्त्र आंदोलन गति पकड़ रहा था। महात्मा गांधी अहिंसक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, जबकि सशस्त्र आंदोलन की बागडोर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हाथों में थी। नेताजी ने जापान और जर्मनी की मदद से आजाद हिंद फौज की स्थापना की। इसके लिए उन्हें कई बार जर्मनी और जापान का दौरा किया था। ऐसा ही एक वाकया 1943 में हुआ था, जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस मौत के मुंह से सकुशल बाहर आ गए थे। उस घटना का जिक्र नेताजी की बेटी डॉ अनीता बोस ने 'द अनीता डायलॉग्स' नाम के एक कार्यक्रम में किया था। नेताजी अपनी पहचान बताए बिना जर्मन पनडुब्बी में सवार हो गए थे।

8 फरवरी 1943 को, एक जर्मन पनडुब्बी श्लेस्विग-होल्स्टीन की राजधानी कील से हिंद महासागर के लिए प्रस्थान करने वाली थी। इस पनडुब्बी के चालक दल को बताया गया कि उनके साथ दो आदमी भी जा रहे हैं, जो पेशे से मशीनिस्ट हैं। वे केवल इतना जानते थे कि उन्हें दो मशीनिस्टों को उत्तरी स्कैंडिनेविया ले जाना था। उनके प्रस्थान से ठीक पहले, कुछ सामान पनडुब्बी पर लाद दिया गया था। इस पनडुब्बी में मशीनिस्ट के वेश में दो आदमी कोई और नहीं बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनके एडीसी आबिद हसन सफरानी थे। उनकी पहचान गुप्त रखी गई ताकि अंग्रेजों को पता न चले कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस सुदूर पूर्व की ओर जा रही एक पनडुब्बी में सवार थे। जर्मन चालक दल को न तो अपने यात्रियों की सही पहचान पता थी और न ही उनके अंतिम गंतव्य के बारे में। 

जब दुश्मन को दिया था मात  

द्वितीय विश्व युद्ध के चरम पर जर्मन U-180 पनडुब्बी में सवार नेताजी और उनके ADC खतरे से खाली नहीं थे। उस समय मित्र देशों की पनडुब्बियां, युद्धपोत और लड़ाकू विमान जर्मनी और जापान की पनडुब्बियों और युद्धपोतों की तलाश में पूरी दुनिया को नाप रहे थे। उस समय पूरा अटलांटिक महासागर अमेरिकी और ब्रिटिश पनडुब्बियों से आच्छादित था। नेताजी को ले जा रही जर्मन पनडुब्बी को भी दुश्मन के इलाके से होकर गुजरना पड़ा। ऐसे में जब जर्मन पनडुब्बी यूरोप छोड़ रही थी तो उन्हें बताया गया कि उनकी मंजिल हिंद महासागर में अफ्रीकी महाद्वीप के पास स्थित मेडागास्कर है। जहां, इन दोनों आदमियों को रिसीव करने के लिए जापानी पनडुब्बी पहले से मौजूद थी।

पनडुब्बी चालक दल के तीन-चौथाई सदस्य मारे गए
जर्मन पनडुब्बी ने अपना रास्ता बदल लिया और ब्रिटेन के करीब से गुजरते हुए अटलांटिक महासागर में प्रवेश कर गई। उन दिनों यह इलाका अमेरिकी-ब्रिटिश युद्धपोतों और पनडुब्बियों से अटा पड़ा था। उस समय अमेरिका के नेतृत्व में मित्र राष्ट्रों की पनडुब्बी सेना इतनी मजबूत थी कि धुरी राष्ट्रों के पनडुब्बी चालक दल के तीन-चौथाई सदस्य मारे गए। सुभाष चंद्र बोस जिस पनडुब्बी में यात्रा कर रहे थे, वह भी बाद में डूब गई। यू-बोट पर सवार मुख्य मशीनिस्ट और युद्ध से बचे जर्मन नाविक हरमन विएन ने इस खतरनाक और जबरदस्त रोमांचकारी यात्रा के बारे में बताया था।

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