Tuesday, January 20, 2026
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पश्चिम बंगाल SIR मामला: सुप्रीम कोर्ट ने 1.25 करोड़ लोगों को दी राहत, चुनाव आयोग को पारदर्शिता के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि जिन भी लोगों को नोटिस भेजे गए हैं, उनकी पूरी लिस्ट पंचायत और ब्लॉक कार्यालयों में सार्वजनिक की जाए।

Reported By : Atul Bhatia Edited By : Niraj Kumar Published : Jan 19, 2026 06:21 pm IST, Updated : Jan 19, 2026 06:21 pm IST
Supreme Court- India TV Hindi
Image Source : PTI सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) से कहा है कि जिन लोगों के नाम लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी की लिस्टी में डाले गए हैं, उनकी जांच पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए ताकि आम लोगों को परेशानी और तनाव न हो। शीर्ष अदालत के इस निर्देश से उन 1.25 करोड़ लोगों को राहत मिली है जिन्हें नोटिस भेजे गए हैं। इन नोटिस में माता-पिता के नाम में फर्क, उम्र का अंतर कम होना, बच्चों की संख्या ज्यादा होना जैसी बातें बताई गई हैं।

चुनाव आयोग लिस्ट को सार्वजनिक करे

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को उन सभी लोगों की लिस्ट सार्वजनिक करनी होगी, जिन्हें लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के नाम पर नोटिस भेजा गया है। यह लिस्ट पंचायत और ब्लॉक कार्यालयों में लगाई जाएगी। जिन लोगों को नोटिस मिला है, वे अपने दस्तावेज और आपत्ति खुद या अपने प्रतिनिधि (Booth Level Agent – BLA) के जरिए जमा कर सकते हैं। इसके लिए प्रतिनिधि को एक पत्र देना होगा, जिस पर हस्ताक्षर या अंगूठा लगा हो।

पंचायत भवन या ब्लॉक ऑफिस में ही जमा होंगे दस्तावेज

इस पूरी प्रक्रिया में लोगों को दूर-दूर न जाना पड़े, लंबी यात्रा न करनी पड़े, इसलिए दस्तावेज जमा करने का केंद्र पंचायत भवन या ब्लॉक ऑफिस में ही होगा। अगर अधिकारी दस्तावेज से संतुष्ट नहीं होते, तो व्यक्ति को सुनवाई का मौका दिया जाएगा, जिसमें उसका प्रतिनिधि भी शामिल हो सकता है। इतना ही नहीं अधिकारी जब दस्तावेज लेंगे या सुनवाई करेंगे, तो उसकी रसीद भी देंगे। इतना ही नहीं राज्य सरकार को चुनाव आयोग को पर्याप्त स्टाफ भी उपलब्ध कराना होगा।

DGP को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश

शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल के DGP को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश भी दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि आम लोगों पर कितना दबाव और तनाव है। एक करोड़ से ज्यादा लोगों को नोटिस भेज दिए गए हैं। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि गांगुली, दत्ता जैसे नाम अलग-अलग तरीके से लिखे जाते हैं, इसी वजह से लोगों को नोटिस भेज दिए गए। उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में माता-पिता और बच्चे की उम्र में 15 साल से कम का अंतर होने पर भी नोटिस भेजा गया है। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि 15 साल का उम्र का अंतर कैसे तार्किक गड़बड़ी हो सकता है? हमारे देश में छोटी उम्र में शादी हो जाती है।

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